भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 304

किया था॥ २९॥ यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् । दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ३० ॥ अतिवाग्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् । अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥ ३१ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३०-३१॥ पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु । क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥ ३२ ॥ पुराणोंमें जिनका 'पुरुष' नामसे वर्णन किया गया है, जो युगोंके आरम्भमें 'ब्रह्म' और युगान्तमें 'संकर्षण' कहे गये हैं, उन उपास्य परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं॥ ३२॥ यमेकं बहुधाऽऽत्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् । नान्यभक्ताः क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम् ॥ ३३ ॥ यमाहुर्जगतः कोशं यस्मिन् संनिहिताः प्रजाः । यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्तीमे जले शकुनयो यथा ॥ ३४ ॥ ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत् तत् सदसतः परम् । अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ॥ ३५ ॥ यं सुरासुरगन्धर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः । प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुःखभेषजम् ॥ ३६ ॥ अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् । अप्रेक्ष्यमनभिज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३७ ॥ जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण 'अधोक्षज' कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्‌का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगत्‌की चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्‌से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक-ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े-बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म-