भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 306

परमात्माको प्रणाम है ॥ ४३ ॥ चतुर्भिborder चतुर्भिborder द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥ ४४ ॥ चार¹, चार², दो³, पाँच⁴ और दो⁵—इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे जिन्हें हविष्य अर्पण किया जाता है, उन होमस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ यः सुपर्णा यजुर्नामच्छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः । रथन्तरं बृहत् साम तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ॥ ४५ ॥ जो 'यजुः' नाम धारण करनेवाले वेदरूपी पुरुष हैं, गायत्री आदि छन्द जिनके हाथ-पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा 'रथन्तर' और 'बृहत्' नामक साम ही जिनकी सान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्तोत्ररूपी भगवान्‌को प्रणाम है ॥ ४५ ॥ यः सहस्रसमे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः । हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै हंसात्मने नमः ॥ ४६ ॥ जो ऋषि हजार वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले प्रजापतियोंके यज्ञमें सोनेकी पाँखोंवाले पक्षीके रूपमें प्रकट हुए थे, उन हंसरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ४६ ॥ पादाङ्गं संधिपर्वाणं स्वरव्यञ्जनभूषणम् । यमाहुरक्षरं दिव्यं तस्मै वागात्मने नमः ॥ ४७ ॥ पदोंके समूह जिनके अंग हैं, सन्धि जिनके शरीरकी जोड़ हैं, स्वर और व्यंजन जिनके लिये आभूषणका काम देते हैं तथा जिन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वरको वाणीके रूपमें नमस्कार है ॥ ४७ ॥ यज्ञाङ्गो यो वराहो वै भूत्वा गामुज्जहार ह । लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ४८ ॥ जिन्होंने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये यज्ञमय वराहका स्वरूप धारण करके इस पृथ्वीको रसातलसे ऊपर उठाया था, उन वीर्यस्वरूप भगवान्‌को प्रणाम है ॥ यः शेते योगमास्थाय पर्यङ्के नागभूषिते । फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ ४९ ॥ जो अपनी योगमायाका आश्रय लेकर शेषनागके हजार फनोंसे बने हुए पलंगपर शयन करते हैं, उन निद्रास्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ४९ ॥ (विश्वे च मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्विनावपि । वसवः सिद्धसाध्याश्च तस्मै देवात्मने नमः ॥ विश्वेदेव, मरुद्गण, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वसु, सिद्ध और साध्य—ये सब जिनकी विभूतियाँ हैं, उन देवस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ अव्यक्तबुद्ध्यहंकारमनोबुद्धीन्द्रियाणि च । तन्मात्राणि विशेषाश्च तस्मै तत्त्वात्मने नमः ॥