भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 307

अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और उनका कार्य—वे सब जिनके ही स्वरूप हैं, उन तत्त्वमय परमात्माको नमस्कार है ।।
भूतं भव्यं भविष्यच्च भूतादिप्रभवाप्ययः ।
योऽग्रजः सर्वभूतानां तस्मै भूतात्मने नमः ।।
जो भूत, वर्तमान और भविष्य—कालरूप हैं, जो भूत आदिकी उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण प्राणियोंका अग्रज बताया गया है, उन भूतात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ।।
यं हि सूक्ष्मं विचिन्वन्ति परं सूक्ष्मविदो जनाः ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मं च यद् ब्रह्म तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ।।
सूक्ष्म तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष जिस परम सूक्ष्म तत्त्वका अनुसंधान करते रहते हैं, जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, वह ब्रह्म जिनका स्वरूप है, उन सूक्ष्मात्माको नमस्कार है ।।
मत्स्यो भूत्वा विरिञ्चाय येन वेदाः समाहृताः ।
रसातलगतः शीघ्रं तस्मै मत्स्यात्मने नमः ।।
जिन्होंने मत्स्य-शरीर धारण करके रसातलमें जाकर नष्ट हुए सम्पूर्ण वेदोंको ब्रह्माजीके लिये शीघ्र ला दिया था, उन मत्स्यरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ।।
मन्दराद्रिर्धृतो येन प्राप्ते ह्यमृतमन्थने ।
अतिकर्कशदेहाय तस्मै कूर्मात्मने नमः ।।
जिन्होंने अमृतके लिये समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल पर्वतको धारण किया था, उन अत्यन्त कठोर देहधारी कच्छपरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ।।
वाराहं रूपमास्थाय महीं सवनपर्वताम् ।
उद्धृत्यैकदंष्ट्रेण तस्मै क्रोडात्मने नमः ।।
जिन्होंने वाराहरूप धारण करके अपने एक दाँतसे वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीका उद्धार किया था, उन वाराहरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है ।।
नारसिंहवपुः कृत्वा सर्वलोकभयंकरम् ।
हिरण्यकशिपुं जघ्ने तस्मै सिंहात्मने नमः ।।
जिन्होंने नृसिंहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्‌के लिये भयंकर हिरण्यकशिपु नामक राक्षसका वध किया था, उन नृसिंहस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।।
वामनं रूपमास्थाय बलिं संयम्य मायया ।
त्रैलोक्यं क्रान्तवान् यस्तु तस्मै क्रान्तात्मने नमः ।।
जिन्होंने वामनरूप धारण करके मायाद्वारा बलिको बाँधकर सारी त्रिलोकीको अपने पैरोंसे नाप लिया था, उन क्रान्तिकारी वामनरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम है ।।
जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः ।
महीं निःक्षत्रियां चक्रे तस्मै रामात्मने नमः ।।