भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 308

जिन्होंने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निकुमार परशुरामका रूप धारण करके इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन कर दिया, उन परशुरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। त्रिःसप्तकृत्वो यश्चैको धर्मे व्युत्क्रान्तगौरवान् । जघान क्षत्रियान् संख्ये तस्मै क्रोधात्मने नमः ॥ जिन्होंने अकेले ही धर्मके प्रति गौरवका उल्लंघन करनेवाले क्षत्रियोंका युद्धमें इक्कीस बार संहार किया, उन क्रोधात्मा परशुरामको नमस्कार है ।। रामो दाशरथिर्भूत्वा पुलस्त्यकुलनन्दनम् । जघान रावणं संख्ये तस्मै क्षत्रात्मने नमः ॥ जिन्होंने दशरथनन्दन श्रीरामका रूप धारण करके युद्धमें पुलस्त्यकुलनन्दन रावणका वध किया था, उन क्षत्रियात्मा श्रीरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। यो हली मुसली श्रीमान् नीलाम्बरधरः स्थितः । रामाय रौहिणेयाय तस्मै भोगात्मने नमः ॥ जो सदा हल, मूसल धारण किये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हो रहे हैं, जिनके श्रीअंगोंपर नील वस्त्र शोभा पाता है, उन शेषावतार रोहिणीनन्दन रामको नमस्कार है ।। शङ्खिने चक्रिणे नित्यं शार्ङ्गिणे पीतवाससे । वनमालाधरायैव तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥ जो शंख, चक्र, शार्ङ्गधनुष, पीताम्बर और वनमाला धारण करते हैं, उन श्रीकृष्णस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। वसुदेवसुतः श्रीमान् क्रीडितो नन्दगोकुले । कंसस्य निधनार्थाय तस्मै क्रीडात्मने नमः ॥ जो कंसवधके लिये वसुदेवके शोभाशाली पुत्रके रूपमें प्रकट हुए और नन्दके गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते रहे, उन लीलामय श्रीकृष्णको नमस्कार है ।। वासुदेवत्वमागम्य यदोर्वंशसमुद्भवः । भूभारहरणं चक्रे तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥ जिन्होंने यदुवंशमें प्रकट हो वासुदेवके रूपमें आकर पृथ्वीका भार उतारा है, उन श्रीकृष्णात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ।। सारथ्यमर्जुनस्याजौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ । लोकत्रयोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ जिन्होंने अर्जुनका सारथित्व करते समय तीनों लोकोंके उपकारके लिये गीता-ज्ञानमय अमृत प्रदान किया था, उन ब्रह्मात्मा श्रीकृष्णको नमस्कार है ।। दानवांस्तु वशे कृत्वा पुनर्बुद्धत्वमागतः । सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै बुद्धात्मने नमः ॥