भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 309

जो सृष्टिकी रक्षाके लिये दानवोंको अपने अधीन करके पुनः बुद्धभावको प्राप्त हो गये, उन बुद्धस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥
हनिष्यति कलौ प्राप्ते म्लेच्छांस्तुरगवाहनः ।
धर्मसंस्थापको यस्तु तस्मै कल्क्यात्मने नमः ॥
जो कलियुग आनेपर घोड़ेपर सवार हो धर्मकी स्थापनाके लिये म्लेच्छोंका वध करेंगे, उन कल्किरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥
तारामये कालनेमिं हत्वा दानवपुङ्गवम् ।
ददौ राज्यं महेन्द्राय तस्मै मुख्यात्मने नमः ॥
जिन्होंने तारामय संग्राममें दानवराज कालनेमिका वध करके देवराज इन्द्रको सारा राज्य दे दिया था, उन मुख्यात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ॥
यः सर्वप्राणिनां देहे साक्षिभूतो ह्यवस्थितः ।
अक्षरः क्षरमाणानां तस्मै साक्ष्यात्मने नमः ॥
जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें साक्षीरूपसे स्थित हैं तथा सम्पूर्ण क्षर (नाशवान्) भूतोंमें अक्षर (अविनाशी) स्वरूपसे विराजमान हैं, उन साक्षी परमात्माको नमस्कार है ॥
नमोऽस्तु ते महादेव नमस्ते भक्तवत्सल ।
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु प्रसीद परमेश्वर ॥
अव्यक्तव्यक्तरूपेण व्याप्तं सर्वं त्वया विभो ।
महादेव! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य (विष्णु)! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आप मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! आपने अव्यक्त और व्यक्तरूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त कर रखा है ॥
नारायणं सहस्राक्षं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥
हिरण्यनाभं यज्ञाङ्गममृतं विश्वतोमुखम् ।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षं प्रपद्ये पुरुषोत्तमम् ॥
मैं सहस्रों नेत्र धारण करनेवाले, सर्वलोकमहेश्वर, हिरण्यनाभ, यज्ञाङ्गस्वरूप, अमृतमय, सब ओर मुखवाले और कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ ॥
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो देवेशो मङ्गलायतनं हरिः ॥
जिनके हृदयमें मंगलभवन देवेश्वर श्रीहरि विराजमान हैं, उनका सभी कार्योंमें सदा मंगल ही होता है—कभी किसी भी कार्यमें अमंगल नहीं होता ॥
मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं मधुसूदनः ।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलं गरुडध्वजः ॥)