भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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था ।। ४०-४१ ।।

कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम ।
सादृश्यहेतुमन्विच्छन् पृथायास्तस्य चैव ह ।। ४२ ।।
कारणं नाधिगच्छामि कथंचिदपि चिन्तयन् ।
मेरा विश्वास है कि कर्णके दोनों पैर माता कुन्तीके चरणोंके सदृश थे। कुन्ती और कर्णके पैरोंमें इतनी समानता क्यों है? इसका कारण ढूँढ़ता हुआ मैं बहुत सोचता-विचारता; परंतु किसी तरह कोई कारण नहीं समझ पाता था ।। ४२ ½ ।।

कथं नु तस्य संग्रामे पृथिवी चक्रमग्रसत् ।। ४३ ।।
कथं नु शप्तो भ्राता मे तत्त्वं वक्तुमिहार्हसि ।
नारदजी! संग्राममें कर्णके पहियेको पृथ्वी क्यों निगल गयी और मेरे बड़े भाई कर्णको कैसे यह शाप प्राप्त हुआ? इसे आप ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें ।। ४३ ½ ।।

श्रोतुमिच्छामि भगवंस्त्वत्तः सर्वं यथातथम् ।
भवान् हि सर्वविद् विद्वान् लोके वेद कृताकृतम् ।। ४४ ।।
भगवन्! मैं आपसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ विद्वान् हैं और लोकमें जो भूत और भविष्य कालकी घटनाएँ हैं, उन सबको जानते हैं ।। ४४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णाभिज्ञाने प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णकी पहचानविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।