महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः
नारदजीका कर्णको शाप प्राप्त होनेका प्रसंग सुनाना
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तस्तु मुनिर्नारदो वदतां वरः ।
कथयामास तत् सर्वं यथा शप्तः स सूतजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदमुनिने सूतपुत्र कर्णको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ था, वह सब प्रसंग कह सुनाया ॥ १ ॥
नारद उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
न कर्णार्जुनयोः किंचिदविसह्यं भवेद् रणे ॥ २ ॥
नारदजीने कहा— महाबाहु भरतनन्दन! तुम जैसा कह रहे हो, ठीक ऐसी ही बात है। वास्तवमें कर्ण और अर्जुनके लिये युद्धमें कुछ भी असाध्य नहीं हो सकता था ॥ २ ॥
गुह्यमेतत् तु देवानां कथयिष्यामि तेऽनघ ।
तन्निबोध महाबाहो यथा वृत्तमिदं पुरा ॥ ३ ॥
अनघ! यह देवताओंकी गुप्त बात है जिसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ। महाबाहो! पूर्वकालके इस यथावत् वृत्तान्तको तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ३ ॥
क्षत्रं स्वर्गं कथं गच्छेदच्छस्त्रपूतमिति प्रभो ।
संघर्षजननस्तस्मात् कन्यागर्भो विनिर्मितः ॥ ४ ॥
प्रभो! एक समय देवताओंने यह विचार किया कि कौन-सा ऐसा उपाय हो, जिससे भूमण्डलका सारा क्षत्रिय-समुदाय शस्त्रोंके आघातसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाय। यह सोचकर उन्होंने सूर्यद्वारा कुमारी कुन्तीके गर्भसे एक तेजस्वी बालक उत्पन्न कराया, जो संघर्षका जनक हुआ ॥ ४ ॥
स बालस्तेजसा युक्तः सूतपुत्रत्वमागतः ।
चकाराङ्गिरसां श्रेष्ठाद् धनुर्वेदं गुरोस्तदा ॥ ५ ॥
वही तेजस्वी बालक सूतपुत्रके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। उसने अंगिरागोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की ॥ ५ ॥
स बलं भीमसेनस्य फाल्गुनस्य च लाघवम् ।
बुद्धिं च तव राजेन्द्र यमयोर्विनयं तदा ॥ ६ ॥
सख्यं च वासुदेवेन बाल्ये गाण्डीवधन्वनः ।