महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाप और पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनर्जन्मके भयसे मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्षरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ५६ ॥ योऽसौ युगसहस्रान्ते प्रदीप्तार्चिर्विभावसुः । सम्भक्षयति भूतानि तस्मै घोरात्मने नमः ॥ ५७ ॥ सृष्टिके एक हजार युग बीतनेपर प्रचण्ड ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निका रूप धारण कर जो सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करते हैं, उन घोररूपधारी परमात्माको प्रणाम है ॥ ५७ ॥ सम्भक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वा चैकार्णवं जगत् । बालः स्वपिति यश्चैकस्तस्मै मायात्मने नमः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका भक्षण करके जो इस जगत्के जलमय कर देते हैं और स्वयं बालकका रूप धारण कर अक्षयवटके पत्तेपर शयन करते हैं, उन मायामय बालमुकुन्दको नमस्कार है ॥ ५८ ॥ तद् यस्य नाभ्यां सम्भूतं यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् । पुष्करे पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः ॥ ५९ ॥ जिसपर यह विश्व टिका हुआ है, वह ब्रह्माण्ड-कमल जिन पुण्डरीकाक्ष भगवान्की नाभिसे प्रकट हुआ है, उन कमलरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ५९ ॥ सहस्रशिरसे चैव पुरुषायामितात्मने । चतुःसमुद्रपर्य्याययोगनिद्रात्मने नमः ॥ ६० ॥ जिनके हजारों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामीरूपसे सबके भीतर विराजमान हैं, जिनका स्वरूप किसी सीमामें आबद्ध नहीं है, जो चारों समुद्रोंके मिलनेसे एकार्णव हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उन योगनिद्रारूप भगवान्को नमस्कार है ॥ ६० ॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ ६१ ॥ जिनके मस्तकके बालोंकी जगह मेघ हैं, शरीरकी सन्धियोंमें नदियाँ हैं और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलरूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ६१ ॥ यस्मात् सर्वाः प्रसूयन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यस्मिंश्चैव प्रलीयन्ते तस्मै हेत्वात्मने नमः ॥ ६२ ॥ सृष्टि और प्रलयरूप समस्त विकार जिनसे उत्पन्न होते हैं और जिनमें ही सबका लय होता है, उन कारणरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ६२ ॥ यो निषण्णो भवेद् रात्रौ दिवा भवति विष्ठितः । इष्टानिष्टस्य च द्रष्टा तस्मै द्रष्ट्रात्मने नमः ॥ ६३ ॥