भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पाप और पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनर्जन्मके भयसे मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्षरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ५६ ॥ योऽसौ युगसहस्रान्ते प्रदीप्तार्चिर्विभावसुः । सम्भक्षयति भूतानि तस्मै घोरात्मने नमः ॥ ५७ ॥ सृष्टिके एक हजार युग बीतनेपर प्रचण्ड ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निका रूप धारण कर जो सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करते हैं, उन घोररूपधारी परमात्माको प्रणाम है ॥ ५७ ॥ सम्भक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वा चैकार्णवं जगत् । बालः स्वपिति यश्चैकस्तस्मै मायात्मने नमः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका भक्षण करके जो इस जगत्‌के जलमय कर देते हैं और स्वयं बालकका रूप धारण कर अक्षयवटके पत्तेपर शयन करते हैं, उन मायामय बालमुकुन्दको नमस्कार है ॥ ५८ ॥ तद् यस्य नाभ्यां सम्भूतं यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् । पुष्करे पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः ॥ ५९ ॥ जिसपर यह विश्व टिका हुआ है, वह ब्रह्माण्ड-कमल जिन पुण्डरीकाक्ष भगवान्‌की नाभिसे प्रकट हुआ है, उन कमलरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ५९ ॥ सहस्रशिरसे चैव पुरुषायामितात्मने । चतुःसमुद्रपर्य्याययोगनिद्रात्मने नमः ॥ ६० ॥ जिनके हजारों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामीरूपसे सबके भीतर विराजमान हैं, जिनका स्वरूप किसी सीमामें आबद्ध नहीं है, जो चारों समुद्रोंके मिलनेसे एकार्णव हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उन योगनिद्रारूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ६० ॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ ६१ ॥ जिनके मस्तकके बालोंकी जगह मेघ हैं, शरीरकी सन्धियोंमें नदियाँ हैं और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलरूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ६१ ॥ यस्मात् सर्वाः प्रसूयन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यस्मिंश्चैव प्रलीयन्ते तस्मै हेत्वात्मने नमः ॥ ६२ ॥ सृष्टि और प्रलयरूप समस्त विकार जिनसे उत्पन्न होते हैं और जिनमें ही सबका लय होता है, उन कारणरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ६२ ॥ यो निषण्णो भवेद् रात्रौ दिवा भवति विष्ठितः । इष्टानिष्टस्य च द्रष्टा तस्मै द्रष्ट्रात्मने नमः ॥ ६३ ॥

जो रातमें भी जागते रहते हैं और दिनके समय साक्षीरूपमें स्थित रहते हैं तथा जो सदा ही सबके भले-बुरेको देखते रहते हैं, उन द्रष्टारूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ६३ ॥

अकुण्ठं सर्वकार्येषु धर्मकार्यार्थमुद्यतम् । वैकुण्ठस्य च तद् रूपं तस्मै कार्यात्मने नमः ॥ ६४ ॥ जिन्हें कोई भी काम करनेमें रुकावट नहीं होती, जो धर्मका काम करनेको सर्वदा उद्यत रहते हैं तथा जो वैकुण्ठधामके स्वरूप हैं, उन कार्यरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ६४ ॥

त्रिःसप्तकृत्वो यः क्षत्रं धर्मव्युत्क्रान्तगौरवम् । क्रुद्धो निजघ्ने समरे तस्मै क्रौर्यात्मने नमः ॥ ६५ ॥ जिन्होंने धर्मात्मा होकर भी क्रोधमें भरकर धर्मके गौरवका उल्लंघन करनेवाले क्षत्रिय-समाजका युद्धमें इक्कीस बार संहार किया, कठोरताका अभिनय करनेवाले उन भगवान् परशुरामको प्रणाम है ॥ ६५ ॥

विभज्य पञ्चधाऽऽत्मानं वायुर्भूत्वा शरीरगः । यश्चेष्टयति भूतानि तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ६६ ॥ जो प्रत्येक शरीरके भीतर वायुरूपमें स्थित हो अपनेको प्राण-अपान आदि पाँच स्वरूपोंमें विभक्त करके सम्पूर्ण प्राणियोंको क्रियाशील बनाते हैं, उन वायुरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ६६ ॥

युगेष्वावर्तते योगैर्मासर्त्वयनहायनैः । सर्गप्रलययोः कर्ता तस्मै कालात्मने नमः ॥ ६७ ॥ जो प्रत्येक युगमें योगमायाके बलसे अवतार धारण करते हैं और मास, ऋतु, अयन तथा वर्षोंके द्वारा सृष्टि और प्रलय करते रहते हैं, उन कालरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ६७ ॥

ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः । पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मै वर्णात्मने नमः ॥ ६८ ॥ ब्राह्मण जिनके मुख हैं, सम्पूर्ण क्षत्रिय-जाति भुजा है, वैश्य जंघा एवं उदर हैं और शूद्र जिनके चरणोंके आश्रित हैं, उन चातुर्वर्ण्यरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥

यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ॥ ६९ ॥ अग्नि जिनका मुख है, स्वर्ग मस्तक है, आकाश नाभि है, पृथ्वी पैर है, सूर्य नेत्र हैं और दिशाएँ कान हैं, उन लोकरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ६९ ॥

परः कालात् परो यज्ञात् परात् परतरश्च यः । अनादिरादिर्विश्वस्य तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ७० ॥ जो कालसे परे हैं, यज्ञसे भी परे हैं और परेसे भी अत्यन्त परे हैं, जो सम्पूर्ण विश्वके आदि हैं; किंतु जिनका आदि कोई भी नहीं है, उन विश्वात्मा परमेश्वरको नमस्कार

है ॥ ७० ॥
(वैद्युतो जाठरश्चैव पावकः शुचिरेव च ।
दहनः सर्वभक्षाणां तस्मै वह्नयात्मने नमः ॥)

जो मेघमें विद्युत् और उदरमें जठरानलके रूपमें स्थित हैं, जो सबको पवित्र करनेके कारण पावक तथा स्वरूपतः शुद्ध होनेसे ‘शुचि’ कहलाते हैं, समस्त भक्ष्य पदार्थोंको दग्ध करनेवाले वे अग्निदेव जिनके ही स्वरूप हैं, उन अग्निमय परमात्माको नमस्कार है ॥
विषये वर्तमानानां यं ते वैशेषिकैर्गुणैः ।
प्राहुर्विषयगोप्तारं तस्मै गोप्त्रात्मने नमः ॥ ७१ ॥

वैशेषिक दर्शनमें बताये हुए रूप, रस आदि गुणोंके द्वारा आकृष्ट हो जो लोग विषयोंके सेवनमें प्रवृत्त हो रहे हैं, उनकी उन विषयोंकी आसक्तिसे जो रक्षा करनेवाले हैं, उन रक्षकस्वरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ७१ ॥
अन्नपानेन्धनमयो रसप्राणविवर्धनः ।
यो धारयति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः ॥ ७२ ॥

जो अन्न-जलरूपी ईंधनको पाकर शरीरके भीतर रस और प्राणशक्तिको बढ़ाते तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करते हैं, उन प्राणात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥
प्राणानां धारणार्थाय योऽन्नं भुङ्क्ते चतुर्विधम् ।
अन्तर्भूतः पचत्यग्निस्तस्मै पाकात्मने नमः ॥ ७३ ॥

प्राणोंकी रक्षाके लिये जो भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य—चार प्रकारके अन्नोंका भोग लगाते हैं और स्वयं ही पेटके भीतर अग्निरूपमें स्थित भोजनको पचाते हैं, उन पाकरूप परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ७३ ॥
पिङ्गेक्षणसटं यस्य रूपं दंष्ट्रानखायुधम् ।
दानवेन्द्रान्तकरणं तस्मै दृप्तात्मने नमः ॥ ७४ ॥

जिनका नरसिंहरूप दानवराज हिरण्यकशिपुका अन्त करनेवाला था, उस समय जिनके नेत्र और कंधेके बाल पीले दिखायी पड़ते थे, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और नख ही जिनके आयुध थे, उन दर्परूपधारी भगवान् नरसिंहको प्रणाम है ॥ ७४ ॥
यं न देवा न गन्धर्वा न दैत्या न च दानवाः ।
तत्त्वतो हि विजानन्ति तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥ ७५ ॥

जिन्हें न देवता, न गन्धर्व, न दैत्य और न दानव ही ठीक-ठीक जान पाते हैं, उन सूक्ष्मस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ७५ ॥
रसातलगतः श्रीमाननन्तो भगवान् विभुः ।
जगद् धारयते कृत्स्नं तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ७६ ॥

जो सर्वव्यापक भगवान् श्रीमान् अनन्त नामक शेषनागके रूपमें रसातलमें रहकर सम्पूर्ण जगत्के अपने मस्तकपर धारण करते हैं, उन वीर्यरूप परमेश्वरको प्रणाम

है ॥ ७६ ॥
यो मोहयति भूतानि स्नेहपाशानुबन्धनैः ।
सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै मोहात्मने नमः ॥ ७७ ॥
जो इस सृष्टि-परम्पराकी रक्षाके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंको स्नेहपाशमें बाँधकर मोहमें डाले रखते हैं, उन मोहरूप भगवान्‌को नमस्कार है ॥ ७७ ॥
आत्मज्ञानमिदं ज्ञानं ज्ञात्वा पञ्चस्ववस्थितम् ।
यं ज्ञानेनाभिगच्छन्ति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ ७८ ॥
अन्नमयादि पाँच कोषोंमें स्थित आन्तरतम आत्माका ज्ञान होनेके पश्चात् विशुद्ध बोधके द्वारा विद्वान् पुरुष जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन ज्ञानस्वरूप परब्रह्मको प्रणाम है ॥ ७८ ॥
अप्रमेयशरीराय सर्वतोबुद्धिचक्षुषे ।
अनन्तपरिमेयाय तस्मै दिव्यात्मने नमः ॥ ७९ ॥
जिनका स्वरूप किसी प्रमाणका विषय नहीं है, जिनके बुद्धिरूपी नेत्र सब ओर व्याप्त हो रहे हैं तथा जिनके भीतर अनन्त विषयोंका समावेश है, उन दिव्यात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ७९ ॥
जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे ।
कमण्डलूनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ ८० ॥
जो जटा और दण्ड धारण करते हैं, लम्बोदर शरीरवाले हैं तथा जिनका कमण्डलु ही तूणीरका काम देता है, उन ब्रह्माजीके रूपमें भगवान्‌को प्रणाम है ॥
शूलिने त्रिदशेशाय त्र्यम्बकाय महात्मने ।
भस्मदिग्धाङ्गलिङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥ ८१ ॥
जो त्रिशूल धारण करनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो महात्मा हैं तथा जिन्होंने अपने शरीरपर विभूति रमा रखी है, उन रुद्ररूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ८१ ॥
चन्द्रार्धकृतशीर्षाय व्यालयज्ञोपवीतिने ।
पिनाकशूलहस्ताय तस्मा उग्रात्मने नमः ॥ ८२ ॥
जिनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट और शरीरपर सर्पका यज्ञोपवीत शोभा दे रहा है, जो अपने हाथमें पिनाक और त्रिशूल धारण करते हैं, उन उग्ररूपधारी भगवान् शंकरको प्रणाम है ॥ ८२ ॥
सर्वभूतात्मभूताय भूतादिनिधनाय च ।
अक्रोधद्रोहमोहाय तस्मै शान्तात्मने नमः ॥ ८३ ॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा और उनकी जन्म-मृत्युके कारण हैं, जिनमें क्रोध, द्रोह और मोहका सर्वथा अभाव है, उन शान्तात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥
यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः ।

यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ८४ ॥ जिनके भीतर सब कुछ रहता है, जिनसे सब उत्पन्न होता है, जो स्वयं ही सर्वस्वरूप हैं, सदा ही सब ओर व्यापक हो रहे हैं और सर्वमय हैं, उन सर्वात्माको प्रणाम है ॥ ८४ ॥ विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । अपवर्गोऽसि भूतानां पञ्चानां परतः स्थितः ॥ ८५ ॥ इस विश्वकी रचना करनेवाले परमेश्वर! आपको प्रणाम है। विश्वके आत्मा और विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। आप पाँचों भूतोंसे परे हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंके मोक्षस्वरूप ब्रह्म हैं ॥ नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु । नमस्ते दिक्षु सर्वासु त्वं हि सर्वमयो निधिः ॥ ८६ ॥ तीनों लोकोंमें व्याप्त हुए आपको नमस्कार है, त्रिभुवनसे परे रहनेवाले आपको प्रणाम है, सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यापक आप प्रभुको नमस्कार है; क्योंकि आप सब पदार्थोंसे पूर्ण भण्डार हैं ॥ ८६ ॥ नमस्ते भगवन् विष्णो लोकानां प्रभवाप्यय । त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ॥ ८७ ॥ संसारकी उत्पत्ति करनेवाले अविनाशी भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। हृषीकेश! आप सबके जन्मदाता और संहारकर्ता हैं। आप किसीसे पराजित नहीं होते ॥ ८७ ॥ न हि पश्यामि ते भावं दिव्यं हि त्रिषु वर्त्मसु । त्वां तु पश्यामि तत्त्वेन यत् ते रूपं सनातनम् ॥ ८८ ॥ मैं तीनों लोकोंमें आपके दिव्य जन्म-कर्मका रहस्य नहीं जान पाता; मैं तो तत्त्वदृष्टिसे आपका जो सनातन रूप है, उसीकी ओर लक्ष्य रखता हूँ ॥ ८८ ॥ दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा । विक्रमेण त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ८९ ॥ स्वर्गलोक आपके मस्तकसे, पृथ्वीदेवी आपके पैरोंसे और तीनों लोक आपके तीन पगोंसे व्याप्त हैं, आप सनातन पुरुष हैं ॥ ८९ ॥ दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्यं शुक्रः प्रतिष्ठितः । सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥ ९० ॥ दिशाएँ आपकी भुजाएँ, सूर्य आपके नेत्र और प्रजापति शुक्राचार्य आपके वीर्य हैं। आपने ही अत्यन्त तेजस्वी वायुके रूपमें ऊपरके सातों मार्गोंको रोक रखा है ॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भयम् ॥ ९१ ॥ जिनकी कान्ति अलसीके फूलकी तरह साँवली है, शरीरपर पीताम्बर शोभा देता है, जो अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते, उन भगवान् गोविन्दको जो लोग नमस्कार करते हैं,

उन्हें कभी भय नहीं होता ।। ९१ ।। एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भावाय ।। ९२ ।। भगवान् श्रीकृष्णको एक बार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेध यज्ञोंके अन्तमें किये गये स्नानके समान फल देनेवाला होता है। इसके सिवा प्रणाममें एक विशेषता है—दस अश्वमेध करनेवालेका तो पुनः इस संसारमें जन्म होता है, किंतु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला मनुष्य फिर भव-बन्धनमें नहीं पड़ता ।। ९२ ।। कृष्णव्रताः कृष्णमनुस्मरन्तो रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये । ते कृष्णदेहाः प्रविशन्ति कृष्ण- माज्यं यथा मन्त्रहुतं हुताशे ।। ९३ ।। जिन्होंने श्रीकृष्ण-भजनका ही व्रत ले रखा है, जो श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण करते हुए ही रातको सोते हैं और उन्हींका स्मरण करते हुए सबेरे उठते हैं, वे श्रीकृष्णस्वरूप होकर उनमें इस तरह मिल जाते हैं, जैसे मन्त्र पढ़कर हवन किया हुआ घी अग्निमें मिल जाता है ।। नमो नरकसंत्रासरक्षामण्डलकारिणे । संसारनिम्नगावर्ततरिकाष्ठाय विष्णवे ।। ९४ ।। जो नरकके भयसे बचानेके लिये रक्षामण्डलका निर्माण करनेवाले और संसाररूपी सरिताकी भँवरसे पार उतारनेके लिये काठकी नावके समान हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। ९४ ।। नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।। ९५ ।। जो ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा गौ और ब्राह्मणोंके हितकारी हैं, जिनसे समस्त विश्वका कल्याण होता है, उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् गोविन्दको प्रणाम है ।। प्राणकान्तारपाथेयं संसारोच्छेदभेषजम् । दुःखशोकपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।। ९६ ।। 'हरि' ये दो अक्षर दुर्गम पथमें संकटके समय प्राणोंके लिये राह-खर्चके समान हैं, संसाररूपी रोगसे छुटकारा दिलानेके लिये औषधके तुल्य हैं तथा सब प्रकारके दुःख-शोकसे उद्धार करनेवाले हैं ।। ९६ ।। यथा विष्णुमयं सत्यं यथा विष्णुमयं जगत् । यथा विष्णुमयं सर्वं पाप्मा मे नश्यतां तथा ।। ९७ ।।

जैसे सत्य विष्णुमय है, जैसे सारा संसार विष्णुमय है, जिस प्रकार सब कुछ विष्णुमय है, उस प्रकार इस सत्यके प्रभावसे मेरे सारे पाप नष्ट हो जायँ ।। ९७ ।। त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद् ध्यायस्व सुरोत्तम ।। ९८ ।। देवताओंमें श्रेष्ठ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण! मैं आपका शरणागत भक्त हूँ और अभीष्ट गतिको प्राप्त करना चाहता हूँ; जिसमें मेरा कल्याण हो, वह आप ही सोचिये ।। ९८ ।। इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः । वाग्यज्ञेनार्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ।। ९९ ।। जो विद्या और तपके जन्मस्थान हैं, जिनको दूसरा कोई जन्म देनेवाला नहीं है, उन भगवान् विष्णुका मैंने इस प्रकार वाणीरूप यज्ञसे पूजन किया है। इससे वे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों ।। ९९ ।। नारायणः परं ब्रह्म नारायणपरं तपः । नारायणः परो देवः सर्वं नारायणः सदा ।। १०० ।। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं। नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सदा सब कुछ हैं ।। १०० ।।

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा वचनं भीष्मस्तद्गतमानसः । नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत् तदा ।। १०१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय भीष्मजीका मन भगवान् श्रीकृष्णमें लगा हुआ था, उन्होंने ऊपर बतायी हुई स्तुति करनेके पश्चात् ‘नमः श्रीकृष्णाय’ कहकर उन्हें प्रणाम किया ।। १०१ ।। अभिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः । त्रैलोक्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दत्त्वा ययौ हरिः ।। १०२ ।। भगवान् भी अपने योगबलसे भीष्मजीकी भक्तिको जानकर उनके निकट गये और उन्हें तीनों लोकोंकी बातोंका बोध करानेवाला दिव्य ज्ञान देकर लौट आये ।। १०२ ।। (यं योगिनः प्राप्तवियोगकाले यत्नेन चित्ते विनिवेशयन्ति । स तं पुरस्ताद्धरिमीक्षमाणः प्राणाञ्जहौ प्राप्तफलो हि भीष्मः ॥) योगी पुरुष प्राणत्यागके समय जिन्हें बड़े यत्नसे अपने हृदयमें स्थापित करते हैं, उन्हीं श्रीहरिको अपने सामने देखते हुए भीष्मजीने जीवनका फल प्राप्त करके अपने प्राणोंका

परित्याग किया था ।। तस्मिन्नुपरते शब्दे ततस्ते ब्रह्मवादिनः । भीष्मं वाग्भिर्बाष्पकण्ठास्तमानर्चुर्महामतिम् ॥ १०३ ॥ जब भीष्मजीका बोलना बंद हो गया, तब वहाँ बैठे हुए ब्रह्मवादी महर्षियोंने आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे परम बुद्धिमान् भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १०३ ॥

ते स्तुवन्तश्च विप्राग्र्याः केशवं पुरुषोत्तमम् । भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशंसुः पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ वे ब्राह्मणशिरोमणि सभी महर्षि पुरुषोत्तम भगवान् केशवकी स्तुति करते हुए धीरे-धीरे भीष्मजीकी बारंबार सराहना करने लगे ॥ १०४ ॥

विदित्वा भक्तियोगं तु भीष्मस्य पुरुषोत्तमः । सहसोत्थाय संहृष्टो यानमेवान्वपद्यत ॥ १०५ ॥ इधर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीष्मजीके भक्तियोगको जानकर सहसा उठे और बड़े हर्षके साथ रथपर जा बैठे ॥ १०५ ॥

केशवः सात्यकिश्चापि रथेनैकेन जग्मतुः । अपरेण महात्मानौ युधिष्ठिरधनंजयौ ॥ १०६ ॥ एक रथसे सात्यकि और श्रीकृष्ण चले तथा दूसरे रथसे महामना युधिष्ठिर और अर्जुन ॥ १०६ ॥

भीमसेनो यमौ चोभौ रथमेकं समाश्रिताः । कृपो युयुत्सुः सूतश्च संजयश्च परंतपः ॥ १०७ ॥ भीमसेन और नकुल-सहदेव तीसरे रथपर सवार हुए। चौथे रथसे कृपाचार्य, युयुत्सु और शत्रुओंको तपानेवाला सारथि संजय—ये तीनों चल दिये ॥ १०७ ॥

ते रथैर्नगराकारैः प्रयाताः पुरुषर्षभाः । नेमिघोषेण महता कम्पयन्तो वसुन्धराम् ॥ १०८ ॥ वे पुरुषप्रवर पाण्डव और श्रीकृष्ण नगराकार रथोंद्वारा उनके पहियोंके गम्भीर घोषसे पृथ्वीको कँपाते हुए बड़े वेगसे गये ॥ १०८ ॥

ततो गिरः पुरुषवरस्तवन्विता द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे । कृताञ्जलिं प्रणतमथापरं जनं स केशिहा मुदितमनाभ्यनन्दत ॥ १०९ ॥ उस समय बहुत-से ब्राह्मण मार्गमें पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी स्तुति करते और भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न-मनसे उसे सुनते थे। दूसरे बहुत-से लोग हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम करते और केशिहन्ता केशव मन ही-मन आनन्दित हो उन लोगोंका अभिनन्दन करते थे ॥ १०९ ॥

(इति स्मरन् पठति च शार्ङ्गधन्वनः शृणोति वा यदुकुलनन्दनस्तवम् । स चक्रभृत्प्रतिहतसर्वकिल्बिषो जनार्दनं प्रविशति देहसंक्षये ॥ जो मनुष्य शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले यदुकुलनन्दन श्रीकृष्णकी इस स्तुतिको याद करते, पढ़ते अथवा सुनते हैं, वे इस शरीरका अन्त होनेपर भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवेश कर जाते हैं। चक्रधारी श्रीहरि उनके सारे पापोंका नाश कर डालते हैं ।। स्तवराजः समाप्तोऽयं विष्णोरद्भुतकर्मणः । गाङ्गेयेन पुरा गीतो महापातकनाशनः ॥ गङ्गानन्दन भीष्मने पूर्वकालमें जिसका गान किया था, अद्भुतकर्मा विष्णुका वही यह स्तवराज पूरा हुआ। यह बड़े बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है ।। इमं नरः स्तवराजं मुमुक्षुः पठन् शुचिः कलुषितकल्मषापहम् । अतीत्य लोकानमलान् सनातनान् पदं स गच्छत्यमृतं महात्मनः ॥) यह स्तोत्रराज पापियोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला जो मनुष्य इसका पवित्रभावसे पाठ करता है, वह निर्मल सनातन लोकोंको भी लाँघकर परमात्मा श्रीकृष्णके अमृतमय धामको चला जाता है ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीष्मस्तवराजे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीष्मस्तवराजविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल १४२ श्लोक हैं)


१. सामान्यतः कर्ममात्रको प्रकाशित करनेवाले मन्त्रोंको 'वाक' कहते हैं। २. मन्त्रोंके अर्थको खोलकर बतानेवाले ब्राह्मणग्रन्थोंके जो वाक्य हैं, उनका नाम 'अनुवाक' है। ३. कर्मके अंग आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले देवता आदिका ज्ञान करानेवाले वचन 'निषद' कहलाते हैं। ४. विशुद्ध आत्मा एवं परमात्माका ज्ञान करानेवाले वचनोंकी 'उपनिषद्' संज्ञा है। १. आश्रावय। २. अस्तु श्रौषट्। ३. यज। ४. ये यजामहे। ५. वषट्।

अध्याय (पृष्ठ 320)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

परशुरामजीद्वारा होनेवाले क्षत्रियसंहारके विषयमें राजा युधिष्ठिरका प्रश्न

वैशम्पायन उवाच

ततः स च हृषीकेशः स च राजा युधिष्ठिरः ।
कृपादयश्च ते सर्वे चत्वारः पाण्डवाश्च ते ॥ १ ॥
रथैस्तैर्नगरप्रख्यैः पताकाध्वजशोभितैः ।
ययुराशु कुरुक्षेत्रं वाजिभिः शीघ्रगामिभिः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण, राजा युधिष्ठिर, कृपाचार्य आदि सब लोग तथा शेष चारों पाण्डव ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित एवं शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा संचालित नगराकार विशाल रथोंसे शीघ्रतापूर्वक कुरुक्षेत्रकी ओर बढ़े॥ १-२ ॥

तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रं केशमज्जास्थिसंकुलम् ।
देहन्यासः कृतो यत्र क्षत्रियैस्तैर्महात्मभिः ॥ ३ ॥

वे सब लोग केश, मज्जा और हड्डियोंसे भरे हुए कुरुक्षेत्रमें उतरे, जहाँ महामनस्वी क्षत्रियवीरोंने अपने शरीरका त्याग किया था॥ ३ ॥

गजाश्वदेहास्थिचयैः पर्वतैरिव संचितम् ।
नरशीर्षकपालैश्च शंखैरिव च सर्वशः ॥ ४ ॥

वहाँ हाथियों और घोड़ोंके शरीरों तथा हड्डियोंके अनेकानेक पहाड़ों-जैसे ढेर लगे हुए थे। सब ओर शंखके समान सफेद नरमुण्डोंकी खोपड़ियाँ फैली हुई थीं॥ ४ ॥

चितासहस्रप्रचितं वर्मशस्त्रसमाकुलम् ।
आपानभूमिं कालस्य तथा भुक्तोज्झितामिव ॥ ५ ॥

उस भूमिमें सहस्रों चिताएँ जली थीं, कवच और अस्त्र-शस्त्रोंसे वह स्थान ढका हुआ था। देखनेपर ऐसा जान पड़ता था, मानो वह कालके खान-पानकी भूमि हो और कालने वहाँ खान-पान करके उच्छिष्ट करके छोड़ दिया हो॥ ५ ॥

भूतसंघानुचरितं रक्षोगणनिषेवितम् ।
पश्यन्तस्ते कुरुक्षेत्रं ययुराशु महारथाः ॥ ६ ॥

जहाँ झुंड-के-झुंड भूत विचर रहे थे और राक्षसगण निवास करते थे, उस कुरुक्षेत्रको देखते हुए वे सभी महारथी शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ रहे थे॥ ६ ॥

गच्छन्नेव महाबाहुः स वै यादवनन्दनः ।

युधिष्ठिराय प्रोवाच जामदग्न्यस्य विक्रमम् ।। ७ ।। रास्तेमें चलते-चलते ही महाबाहु भगवान् यादवनन्दन श्रीकृष्ण युधिष्ठिरको जमदग्निकुमार परशुरामजीका पराक्रम सुनाने लगे— ।। ७ ।।

अमी रामह्रदाः पञ्च दृश्यन्ते पार्थ दूरतः । तेषु संतर्पयामास पितॄन् क्षत्रियशोणितैः ।। ८ ।। ‘कुन्तीनन्दन! ये जो पाँच सरोवर कुछ दूरसे दिखायी देते हैं, ‘राम-ह्रद’ के नामसे प्रसिद्ध हैं। इन्हींमें उन्होंने क्षत्रियोंके रक्तसे अपने पितरोंका तर्पण किया था ।। ८ ।।

त्रिःसप्तकृत्वो वसुधां कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः । इहेदानीं ततो रामः कर्मणो विरराम ह ।। ९ ।। ‘शक्तिशाली परशुरामजी इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य करके यहीं आनेके पश्चात् अब उस कर्मसे विरत हो गये हैं’ ।। ९ ।।

युधिष्ठिर उवाच

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । रामेणेति तथाऽऽत्थ त्वमत्र मे संशयो महान् ।। १० ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**प्रभो! आपने यह बताया है कि पहले परशुरामजीने इक्कीस बार यह पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी थी, इस विषयमें मुझे बहुत बड़ा संदेह हो गया है ।। १० ।।

क्षत्रबीजं यथा दग्धं रामेण यदुपुङ्गव । कथं भूयः समुत्पत्तिः क्षत्रस्यामितविक्रम ।। ११ ।। अमित पराक्रमी यदुनाथ! जब परशुरामजीने क्षत्रियोंका बीजतक दग्ध कर दिया, तब फिर क्षत्रिय-जातिकी उत्पत्ति कैसे हुई? ।। ११ ।।

महात्मना भगवता रामेण यदुपुङ्गव । कथमुत्सादितं क्षत्रं कथं वृद्धिमुपागतम् ।। १२ ।। यदुपुङ्गव! महात्मा भगवान् परशुरामने क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया और उसके बाद इस जातिकी वृद्धि कैसे हुई? ।। १२ ।।

महता रथयुद्धेन कोटिशः क्षत्रिया हताः । तथाभूच्च मही कीर्णा क्षत्रियैर्वदतां वर ।। १३ ।। वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण! महारथयुद्धके द्वारा जब करोड़ों क्षत्रिय मारे गये होंगे, उस समय उनकी लाशोंसे यह सारी पृथ्वी ढक गयी होगी ।। १३ ।।

किमर्थं भार्गवेणेदं क्षत्रमुत्सादितं पुरा । रामेण यदुशार्दूल कुरुक्षेत्रे महात्मना ।। १४ ।। यदुसिंह! भृगुवंशी महात्मा परशुरामने पूर्वकालमें कुरुक्षेत्रमें यह क्षत्रियोंका संहार किसलिये किया? ।। १४ ।।

एतन्मे छिन्धि वार्ष्णेय संशयं तार्क्ष्यकेतन ।
आगमो हि परः कृष्ण त्वत्तो नो वासवानुज ॥ १५ ॥
गरुडध्वज श्रीकृष्ण! इन्द्रके छोटे भाई उपेन्द्र! आप मेरे संदेहका निवारण कीजिये; क्योंकि कोई भी शास्त्र आपसे बढ़कर नहीं है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो यथावत् स गदाग्रजः प्रभुः
शशंस तस्मै निखिलेन तत्त्वतः ।
युधिष्ठिरायाप्रतिमौजसे तदा
यथाभवत् क्षत्रियसंकुला मही ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने अप्रतिम तेजस्वी युधिष्ठिरसे वह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया कि किस प्रकार यह सारी पृथ्वी क्षत्रियोंकी लाशोंसे ढक गयी थी ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि
रामोपाख्यानेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें परशुरामके
उपाख्यानका आरम्भविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥

परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुनः उत्पन्न होनेकी कथा

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुनः उत्पन्न होनेकी कथा

वासुदेव उवाच

शृणु कौन्तेय रामस्य प्रभावो यो मया श्रुतः ।
महर्षीणां कथयतां विक्रमं तस्य जन्म च ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—कुन्तीनन्दन! मैंने महर्षियोंके मुखसे परशुरामजीके प्रभाव, पराक्रम तथा जन्मकी कथा जिस प्रकार सुनी है, वह सब आपको बताता हूँ, सुनिये ॥ १ ॥

यथा च जामदग्न्येन कोटिशः क्षत्रिया हताः ।
उद्भूता राजवंशेषु ये भूयो भारते हताः ॥ २ ॥
जिस प्रकार जगदग्निनन्दन परशुरामने करोड़ों क्षत्रियोंका संहार किया था, पुनः जो क्षत्रिय राजवंशोंमें उत्पन्न हुए, वे अब फिर भारतयुद्धमें मारे गये ॥ २ ॥

जह्रोरजस्तु तनयो बलाकाश्वस्तु तत्सुतः ।
कुशिको नाम धर्मज्ञस्तस्य पुत्रो महीपते ॥ ३ ॥
प्राचीनकालमें जह्नुनामक एक राजा हो गये हैं, उनके पुत्रका नाम था अज। पृथ्वीनाथ! अजसे बलाकाश्व नामक पुत्रका जन्म हुआ। बलाकाश्वके कुशिक नामक पुत्र हुआ। कुशिक बड़े धर्मज्ञ थे ॥ ३ ॥

अग्र्यं तपः समातिष्ठत् सहस्राक्षसमो भुवि ।
पुत्रं लभेयमजितं त्रिलोकेश्वरमित्युत ॥ ४ ॥
वे इस भूतलपर सहस्रनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने यह सोचकर कि मैं एक ऐसा पुत्र प्राप्त करूँ, जो तीनों लोकोंका शासक होनेके साथ ही किसीसे पराजित न हो, उत्तम तपस्या आरम्भ की ॥ ४ ॥

तमुग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः ।
समर्थं पुत्रजनने स्वयमेवान्वपद्यत ॥ ५ ॥
पुत्रत्वमगमद् राजंस्तस्य लोकेश्वरेश्वरः ।
गाधिर्नामाभवत् पुत्रः कौशिकः पाकशासनः ॥ ६ ॥
उनकी भयंकर तपस्या देखकर और उन्हें शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न करनेमें समर्थ जानकर लोकपालोंके स्वामी सहस्र नेत्रोंवाले पाकशासन इन्द्र स्वयं ही उनके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए। राजन्! कुशिकका वह पुत्र गाधिनामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ५-६ ॥

तस्य कन्याभवद् राजन् नाम्ना सत्यवती प्रभो ।
तां गाधिर्भृगुपुत्राय सर्चीकाय ददौ प्रभुः ॥ ७ ॥
प्रभो! गाधिके एक कन्या थी, जिसका नाम था सत्यवती। राजा गाधिने अपनी इस कन्याका विवाह भृगुपुत्र ऋचीकके साथ कर दिया ॥ ७ ॥
तस्याः प्रीतः स शौचेन भार्गवः कुरुनन्दन ।
पुत्रार्थं श्रपयामास चरुं गाधेस्तथैव च ॥ ८ ॥
कुरुनन्दन! सत्यवती बड़े शुद्ध आचार-विचारसे रहती थी। उसकी शुद्धतासे प्रसन्न हो ऋचीक मुनिने उसे तथा राजा गाधिको भी पुत्र देनेके लिये चरु तैयार किया ॥
आहूयोवाच तां भार्यां सर्चीको भार्गवस्तदा ।
उपयोज्यश्चरुरयं त्वया मात्राप्ययं तव ॥ ९ ॥
भृगुवंशी ऋचीकने उस समय अपनी पत्नी सत्यवतीको बुलाकर कहा—'यह चरु तो तुम खा लेना और यह दूसरा अपनी माँको खिला देना ॥ ९ ॥
तस्या जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः ।
अजय्यः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥ १० ॥
'तुम्हारी माताके जो पुत्र होगा, वह अत्यन्त तेजस्वी एवं क्षत्रियशिरोमणि होगा। इस जगत्के क्षत्रिय उसे जीत नहीं सकेंगे। वह बड़े-बड़े क्षत्रियोंका संहार करनेवाला होगा ॥ १० ॥
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं शमात्मकम् ।
तपोऽन्वितं द्विजश्रेष्ठं चरुरेष विधास्यति ॥ ११ ॥
'कल्याणि! तुम्हारे लिये जो यह चरु तैयार किया है, यह तुम्हे धैर्यवान्, शान्त एवं तपस्यापरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण पुत्र प्रदान करेगा' ॥ ११ ॥
इत्येवमुक्त्वा तां भार्यां सर्चीको भृगुनन्दनः ।
तपस्यभिरतः श्रीमाञ्जगामारण्यमेव हि ॥ १२ ॥
अपनी पत्नीसे ऐसा कहकर भृगुनन्दन श्रीमान् ऋचीक मुनि तपस्यामें तत्पर हो जंगलमें चले गये ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु तीर्थयात्रापरो नृपः ।
गाधिः सदारः सम्प्राप्तः सर्चीकस्याश्रमं प्रति ॥ १३ ॥
इसी समय तीर्थयात्रा करते हुए राजा गाधि अपनी पत्नीके साथ ऋचीक मुनिके आश्रमपर आये ॥ १३ ॥
चरुद्वयं गृहीत्वा च राजन् सत्यवती तदा ।
भर्तुर्वाक्यं तदाव्यग्रा मात्रे हृष्टा न्यवेदयत् ॥ १४ ॥
राजन्! उस समय सत्यवती वह दोनों चरु लेकर शान्तभावसे माताके पास गयी और बड़े हर्षके साथ पतिकी कही हुई बातको उससे निवेदित किया ॥ १४ ॥

माता तु तस्याः कौन्तेय दुहित्रे स्वं चरुं ददौ ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ १५ ॥
कुन्तीकुमार! सत्यवतीकी माताने अज्ञानवश अपना चरु तो पुत्रीको दे दिया और उसका चरु लेकर भोजनद्वारा अपनेमें स्थित कर लिया ॥ १५ ॥
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा ।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर सत्यवतीने अपने तेजस्वी शरीरसे एक ऐसा गर्भ धारण किया, जो क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला था और देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १६ ॥
तामृचीकस्तदा दृष्ट्वा तस्या गर्भगतं द्विजम् ।
अब्रवीद् भृगुशार्दूलः स्वां भार्यां देवरूपिणीम् ॥ १७ ॥
मात्रासि व्यंसिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना ।
भविष्यति हि ते पुत्रः क्रूरकर्मात्यमर्षणः ॥ १८ ॥
सत्यवतीके गर्भगत बालकको देखकर भृगुश्रेष्ठ ऋचीकने अपनी उस देवरूपिणी पत्नीसे कहा—'भद्रे! तुम्हारी माताने चरु बदलकर तुम्हें ठग लिया। तुम्हारा पुत्र अत्यन्त क्रोधी और क्रूरकर्म करनेवाला होगा ॥
उत्पत्स्यति च ते भ्राता ब्रह्मभूतस्तपोरतः ।
विश्वं हि ब्रह्म सुमहच्चरौ तव समाहितम् ॥ १९ ॥
क्षत्रवीर्यं च सकलं तव मात्रे समर्पितम् ।
विपर्ययेण ते भद्रे नैतदेवं भविष्यति ॥ २० ॥
मातुस्ते ब्राह्मणो भूयात् तव च क्षत्रियः सुतः ।
'परंतु तुम्हारा भाई ब्राह्मणस्वरूप एवं तपस्यापरायण होगा। तुम्हारे चरुमें मैंने सम्पूर्ण महान् तेज ब्रह्मकी प्रतिष्ठा की थी और तुम्हारी माताके लिये जो चरु था, उसमें सम्पूर्ण क्षत्रियोचित बल-पराक्रमका समावेश किया गया था, परंतु कल्याणि! चरुके बदल देनेसे अब ऐसा नहीं होगा। तुम्हारी माताका पुत्र तो ब्राह्मण होगा और तुम्हारा क्षत्रिय' ॥ १९-२० १/२ ॥
सैवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा ॥ २१ ॥
पपात शिरसा तस्मै वेपन्ती चाब्रवीदिदम् ।
नार्होऽसि भगवन्नद्य वक्तुमेवंविधं वचः ।
ब्राह्मणापसदं पुत्रं प्राप्स्यसीति हि मां प्रभो ॥ २२ ॥
पतिके ऐसा कहनेपर महाभागा सत्यवती उनके चरणोंमें सिर रखकर गिर पड़ी और काँपती हुई बोली—'प्रभो! भगवन्! आज आप मुझसे ऐसी बात न कहें कि तुम ब्राह्मणाधम पुत्र उत्पन्न करोगी' ॥ २१-२२ ॥

ऋचीक उवाच नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वयि । उग्रकर्मा समुत्पन्नश्चरुव्यत्यासहेतुना ॥ २३ ॥ **ऋचीक बोले—**कल्याणि! मैंने यह संकल्प नहीं किया था कि तुम्हारे गर्भसे ऐसा पुत्र उत्पन्न हो। परंतु चरु बदल जानेके कारण तुम्हें भयंकर कर्म करनेवाले पुत्रको जन्म देना पड़ रहा है ॥ २३ ॥

सत्यवत्युवाच इच्छँल्लोँकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम् । शमात्मकमृजुं पुत्रं दातुमर्हसि मे प्रभो ॥ २४ ॥ **सत्यवती बोली—**मुने! आप चाहें तो सम्पूर्ण लोकोंकी नयी सृष्टि कर सकते हैं; फिर इच्छानुसार पुत्र उत्पन्न करनेकी तो बात ही क्या है? अतः प्रभो! मुझे तो शान्त एवं सरल स्वभाववाला पुत्र ही प्रदान कीजिये ॥ २४ ॥

ऋचीक उवाच नोक्तपूर्वानृतं भद्रे स्वैरेष्वपि कदाचन । किमुताग्निं समाधाय मन्त्रवच्चरुसाधने ॥ २५ ॥ **ऋचीक बोले—**भद्रे! मैंने कभी हास-परिहासमें भी झूठी बात नहीं कही है; फिर अग्निकी स्थापना करके मन्त्रयुक्त चरु तैयार करते समय मैंने जो संकल्प किया है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है? ॥ २५ ॥ दृष्टमेतत् पुरा भद्रे ज्ञातं च तपसा मया । ब्रह्मभूतं हि सकलं पितुस्तव कुलं भवेत् ॥ २६ ॥ कल्याणि! मैंने तपस्याद्वारा पहले ही यह बात देख और जान ली है कि तुम्हारे पिताका समस्त कुल ब्राह्मण होगा ॥ २६ ॥

सत्यवत्युवाच काममेवं भवेत् पौत्रो ममेह तव च प्रभो । शमात्मकमहं पुत्रं लभेयं जपतां वर ॥ २७ ॥ **सत्यवती बोली—**प्रभो! आप जप करनेवाले ब्राह्मणोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, आपका और मेरा पौत्र भले ही उग्र स्वभावका हो जाय; परंतु पुत्र तो मुझे शान्तस्वभावका ही मिलना चाहिये ॥ २७ ॥

ऋचीक उवाच पुत्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि । यथा त्वयोक्तं वचनं तथा भद्रे भविष्यति ॥ २८ ॥

**ऋचीक बोले—**सुन्दरी! मेरे लिये पुत्र और पौत्रमें कोई अन्तर नहीं है। भद्रे! तुमने जैसा कहा है, वैसा ही होगा ॥ २८ ॥

वासुदेव उवाच

ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम् ।
तपस्यभिरतं शान्तं जमदग्निं यतव्रतम् ॥ २९ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**राजन्! तदनन्तर सत्यवतीने शान्त, संयमपरायण और तपस्वी भृगुवंशी जमदग्निको पुत्रके रूपमें उत्पन्न किया ॥ २९ ॥
विश्वामित्रं च दायादं गाधिः कुशिकनन्दनः ।
यः प्राप ब्रह्मसमितं विश्वैर्ब्रह्मगुणैर्युतम् ॥ ३० ॥
कुशिकनन्दन गाधिने विश्वामित्र नामक पुत्र प्राप्त किया, जो सम्पूर्ण ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न थे और ब्रह्मर्षि पदवीको प्राप्त हुए ॥ ३० ॥
ऋचीको जनयामास जमदग्निं तपोनिधिम् ।
सोऽपि पुत्रं ह्यजनयज्जमदग्निः सुदारुणम् ॥ ३१ ॥
सर्वविद्यान्तगं श्रेष्ठं धनुर्वेदस्य पारगम् ।
रामं क्षत्रियहन्तारं प्रदीप्तमिव पावकम् ॥ ३२ ॥
ऋचीकने तपस्याके भंडार जमदग्निको जन्म दिया और जमदग्निने अत्यन्त उग्र स्वभाववाले जिस पुत्रको उत्पन्न किया, वही ये सम्पूर्ण विद्याओं तथा धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी क्षत्रियहन्ता परशुरामजी हैं ॥ ३१-३२ ॥
तोषयित्वा महादेवं पर्वते गन्धमादने ।
अस्त्राणि वरयामास परशुं चातितेजसम् ॥ ३३ ॥
परशुरामजीने गन्धमादन पर्वतपर महादेवजीको संतुष्ट करके उनसे अनेक प्रकारके अस्त्र और अत्यन्त तेजस्वी कुठार प्राप्त किये ॥ ३३ ॥
स तेनाकुण्ठधारेण ज्वलितानलवर्चसा ।
कुठारेणाप्रमेयेण लोकेष्वप्रतिमोऽभवत् ॥ ३४ ॥
उस कुठारकी धार कभी कुण्ठित नहीं होती थी। वह जलती हुई आगके समान उद्दीप्त दिखायी देता था। उस अप्रमेय शक्तिशाली कुठारके कारण परशुरामजी सम्पूर्ण लोकोंमें अप्रतिम वीर हो गये ॥ ३४ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु कृतवीर्यात्मजो बली ।
अर्जुनो नाम तेजस्वी क्षत्रियो हैहयाधिपः ॥ ३५ ॥
इसी समय राजा कृतवीर्यका बलवान् पुत्र अर्जुन हैहयवंशका राजा हुआ, जो एक तेजस्वी क्षत्रिय था ॥ ३५ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन राजा बाहुसहस्रवान् ।

चक्रवर्ती महातेजा विप्राणामाश्वमेधिके ॥ ३६ ॥ ददौ स पृथिवीं सर्वां सप्तद्वीपां सपर्वताम् । स्वबाहुस्वबलेनाजौ जित्वा परमधर्मवित् ॥ ३७ ॥ दत्तात्रेयजीकी कृपासे राजा अर्जुनने एक हजार भुजाएँ प्राप्त की थीं। वह महातेजस्वी चक्रवर्ती नरेश था। उस परम धर्मज्ञ नरेशने अपने बाहुबलसे पर्वतों और द्वीपोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीको युद्धमें जीतकर अश्वमेध यज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दिया था ॥ ३६-३७ ॥

तृषितेन च कौन्तेय भिक्षितश्चित्रभानुना । सहस्रबाहुर्विक्रान्तः प्रादाद् भिक्षामथाग्नये ॥ ३८ ॥ कुन्तीनन्दन! एक समय भूखे-प्यासे हुए अग्निदेवने पराक्रमी सहस्रबाहु अर्जुनसे भिक्षा माँगी और अर्जुनने अग्निको वह भिक्षा दे दी ॥ ३८ ॥

ग्रामान् पुराणि राष्ट्राणि घोषांश्चैव तु वीर्यवान् । जज्वाल तस्य बाणाग्राच्चित्रभानुर्दिधक्षया ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् बलशाली अग्निदेव कार्तवीर्य अर्जुनके बाणोंके अग्रभागसे गाँवों, गोष्ठों, नगरों और राष्ट्रोंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३९ ॥

स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महौजसः । ददाह कार्तवीर्यस्य शैलानथ वनस्पतीन् ॥ ४० ॥ उन्होंने उस महापराक्रमी नरेश कार्तवीर्यके प्रभावसे पर्वतों और वनस्पतियोंको जलाना आरम्भ किया ॥ ४० ॥

स शून्यमाश्रमं रम्यमापवस्य महात्मनः । ददाह पवनेनेद्धश्चित्रभानुः सहैहयः ॥ ४१ ॥ हवाका सहारा पाकर उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते हुए अग्निदेवने हैहयराजको साथ लेकर महात्मा आपवके सूने एवं सुरम्य आश्रमको जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४१ ॥

आपवस्तु ततो रोषाच्छापार्जुनमच्युत । दग्धेऽश्रमे महाबाहो कार्तवीर्येण वीर्यवान् ॥ ४२ ॥ महाबाहु अच्युत! कार्तवीर्यके द्वारा अपने आश्रमके जला दिये जानेपर शक्तिशाली आपव मुनिको बड़ा रोष हुआ। उन्होंने कृतवीर्यपुत्र अर्जुनको शाप देते हुए कहा — ॥ ४२ ॥

त्वया न वर्जितं यस्मान्ममेदं हि महत् वनम् । दग्धं तस्माद् रणे रामो बाहूंस्ते छेत्स्यतेऽर्जुन ॥ ४३ ॥ 'अर्जुन! तुमने मेरे इस विशाल वनको भी जलाये बिना नहीं छोड़ा, इसलिये संग्राममें तुम्हारी इन भुजाओंको परशुरामजी काट डालेंगे' ॥ ४३ ॥

अर्जुनस्तु महातेजा बली नित्यं शमात्मकः । ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दाता शूरश्च भारत ॥ ४४ ॥

भारत! अर्जुन महातेजस्वी, बलवान्, नित्य शान्ति-परायण, ब्राह्मण-भक्त शरणागतोंको शरण देनेवाला, दानी और शूरवीर था ॥ ४४ ॥
नाचिन्तयत् तदा शापं तेन दत्तं महात्मना ।
तस्य पुत्रास्तु बलिनः शापेनासन् पितुर्वधे ॥ ४५ ॥
अतः उसने उस समय उन महात्माके दिये हुए शापपर कोई ध्यान नहीं दिया। शापवश उसके बलवान् पुत्र ही पिताके वधमें कारण बन गये ॥ ४५ ॥
निमित्तादवलिप्ता वै नृशंसाश्चैव सर्वदा ।
जमदग्निधेन्वास्ते वत्समानिन्युर्भरतर्षभ ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस शापके ही कारण सदा क्रूरकर्म करनेवाले वे घमंडी राजकुमार एक दिन जमदग्नि मुनिकी होमधेनुके बछड़ेको चुरा ले आये ॥ ४६ ॥
अज्ञातं कार्तवीर्येण हैहयेन्द्रेण धीमता ।
तन्निमित्तमभूद् युद्धं जामदग्नेर्महात्मनः ॥ ४७ ॥
उस बछड़ेके लाये जानेकी बात बुद्धिमान् हैहय-राज कार्तवीर्यको मालूम नहीं थी, तथापि उसीके लिये महात्मा परशुरामका उसके साथ घोर युद्ध छिड़ गया ॥ ४७ ॥
ततोऽर्जुनस्य बाहुंस्तांश्छित्त्वा रामो रुषान्वितः ।
तं भ्रमन्तं ततो वत्सं जामदग्न्यः स्वमाश्रमम् ॥ ४८ ॥
प्रत्यानयत राजेन्द्र तेषामन्तःपुरात् प्रभुः ।
राजेन्द्र! तब रोषमें भरे हुए प्रभावशाली जमदग्निनन्दन परशुरामने अर्जुनकी उन भुजाओंको काट डाला और इधर-उधर घूमते हुए उस बछड़ेको वे हैहयोंके अन्तःपुरसे निकालकर अपने आश्रममें ले आये ॥ ४८ १/२ ॥
अर्जुनस्य सुतास्ते तु सम्भूयाबुद्धयस्तदा ॥ ४९ ॥
गत्वाऽऽश्रममसम्बुद्धा जमदग्नेर्महात्मनः ।
अपातयन्त भल्लाग्रैः शिरः कायान्नराधिप ॥ ५० ॥
समित्कुशार्थं रामस्य निर्यातस्य यशस्विनः ।
नरेश्वर! अर्जुनके पुत्र बुद्धिहीन और मूर्ख थे। उन्होंने संगठित हो महात्मा जमदग्निके आश्रमपर जाकर भल्लोंके अग्रभागसे उनके मस्तकको धड़से काट गिराया। उस समय यशस्वी परशुरामजी समिधा और कुशा लानेके लिये आश्रमसे दूर चले गये थे ॥ ४९-५० १/२ ॥
ततः पितृवधामर्षाद् रामः परममन्युमान् ॥ ५१ ॥
निःक्षत्रियां प्रतिश्रुत्य महीं शस्त्रमगृह्णत ।
पिताके इस प्रकार मारे जानेसे परशुरामके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे सूनी कर देनेकी भीषण प्रतिज्ञा करके हथियार उठाया ॥ ५१ १/२ ॥
ततः स भृगुशार्दूलः कार्तवीर्यस्य वीर्यवान् ॥ ५२ ॥

विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान् पौत्रांश्च सर्वशः ।
भृगुकुलके सिंह पराक्रमी परशुरामने पराक्रम प्रकट करके कार्तवीर्यके सभी पुत्रों तथा पौत्रोंका शीघ्र ही संहार कर डाला ॥ ५२ १/२ ॥
स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान् ॥ ५३ ॥
चकार भार्गवो राजन् महीं शोणितकर्दमाम् ।
राजन्! परम क्रोधी परशुरामने सहस्रों हैहयोंका वध करके इस पृथ्वीपर रक्तकी कीच मचा दी ॥ ५३ १/२ ॥
स तथाऽऽशु महातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ॥ ५४ ॥
कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह ।
इस प्रकार शीघ्र ही पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके महातेजस्वी परशुराम अत्यन्त दयासे द्रवित हो वनमें ही चले गये ॥ ५४ १/२ ॥
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् ॥ ५५ ॥
क्षेपं सम्प्राप्तवांस्तत्र प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ।
तदनन्तर कई हजार वर्ष बीत जानेपर एक दिन वहाँ स्वभावतः क्रोधी परशुरामपर आक्षेप किया गया ॥ ५५ १/२ ॥
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाः ॥ ५६ ॥
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि ।
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः ॥ ५७ ॥
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते ।
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि ॥ ५८ ॥
भयात् क्षत्रियवीराणां पर्वत सम्मुपाश्रितः ।
सा पुनः क्षत्रियशतैः पृथिवी सर्वतः स्तृता ॥ ५९ ॥
महाराज! विश्वामित्रके पौत्र तथा रैभ्यके पुत्र महातेजस्वी परावसुने भरी सभामें आक्षेप करते हुए कहा—‘राम! राजा ययातिके स्वर्गसे गिरनेके समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरुष यज्ञमें एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही जनताकी सभामें डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियोंका अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरोंके भयसे ही पर्वतकी शरण ली है। इस समय पृथ्वीपर सब ओर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं’ ॥ ५६—५९ ॥
परावसोर्वचः श्रुत्वा शस्त्रं जग्राह भार्गवः ।
ततो ये क्षत्रिया राजन् शतशस्तेन वर्जिताः ॥ ६० ॥
ते विवृद्धा महावीर्याः पृथिवीपतयोऽभवन् ।