भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 330

विक्रम्य निजघानाशु पुत्रान् पौत्रांश्च सर्वशः ।
भृगुकुलके सिंह पराक्रमी परशुरामने पराक्रम प्रकट करके कार्तवीर्यके सभी पुत्रों तथा पौत्रोंका शीघ्र ही संहार कर डाला ॥ ५२ १/२ ॥
स हैहयसहस्राणि हत्वा परममन्युमान् ॥ ५३ ॥
चकार भार्गवो राजन् महीं शोणितकर्दमाम् ।
राजन्! परम क्रोधी परशुरामने सहस्रों हैहयोंका वध करके इस पृथ्वीपर रक्तकी कीच मचा दी ॥ ५३ १/२ ॥
स तथाऽऽशु महातेजाः कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ॥ ५४ ॥
कृपया परयाऽऽविष्टो वनमेव जगाम ह ।
इस प्रकार शीघ्र ही पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके महातेजस्वी परशुराम अत्यन्त दयासे द्रवित हो वनमें ही चले गये ॥ ५४ १/२ ॥
ततो वर्षसहस्रेषु समतीतेषु केषुचित् ॥ ५५ ॥
क्षेपं सम्प्राप्तवांस्तत्र प्रकृत्या कोपनः प्रभुः ।
तदनन्तर कई हजार वर्ष बीत जानेपर एक दिन वहाँ स्वभावतः क्रोधी परशुरामपर आक्षेप किया गया ॥ ५५ १/२ ॥
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाः ॥ ५६ ॥
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि ।
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्तः समागताः ॥ ५७ ॥
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते ।
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि ॥ ५८ ॥
भयात् क्षत्रियवीराणां पर्वत सम्मुपाश्रितः ।
सा पुनः क्षत्रियशतैः पृथिवी सर्वतः स्तृता ॥ ५९ ॥
महाराज! विश्वामित्रके पौत्र तथा रैभ्यके पुत्र महातेजस्वी परावसुने भरी सभामें आक्षेप करते हुए कहा—‘राम! राजा ययातिके स्वर्गसे गिरनेके समय जो प्रतर्दन आदि सज्जन पुरुष यज्ञमें एकत्र हुए थे, क्या वे क्षत्रिय नहीं थे? तुम्हारी प्रतिज्ञा झूठी है। तुम व्यर्थ ही जनताकी सभामें डींग हाँका करते हो कि मैंने क्षत्रियोंका अन्त कर दिया। मैं तो समझता हूँ कि तुमने क्षत्रिय वीरोंके भयसे ही पर्वतकी शरण ली है। इस समय पृथ्वीपर सब ओर पुनः सैकड़ों क्षत्रिय भर गये हैं’ ॥ ५६—५९ ॥
परावसोर्वचः श्रुत्वा शस्त्रं जग्राह भार्गवः ।
ततो ये क्षत्रिया राजन् शतशस्तेन वर्जिताः ॥ ६० ॥
ते विवृद्धा महावीर्याः पृथिवीपतयोऽभवन् ।