महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 331, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! परावसुकी बात सुनकर भृगुवंशी परशुरामने पुनः शस्त्र उठा लिया। पहले उन्होंने जिन सैकड़ों क्षत्रियोंको छोड़ दिया था, वे ही बढ़कर महापराक्रमी भूपाल बन बैठे थे॥ ६० १/२ ॥
स पुनस्ताञ्जघानाशु बालानपि नराधिप ॥ ६१ ॥
गर्भस्थैस्तु मही व्याप्ता पुनरेवाभवत् तदा ।
जातं जातं स गर्भं तु पुनरेव जघान ह ॥ ६२ ॥
अरक्षंश्च सुतान् कांश्चित् तदा क्षत्रिययोषितः ।
नरेश्वर! उन्होंने पुनः उन सबके छोटे-छोटे बच्चों-तकको शीघ्र ही मार डाला। जो बच्चे गर्भमें रह गये थे, उन्हींसे पुनः यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी। परशुरामजी एक-एक गर्भके उत्पन्न होनेपर पुनः उसका वध कर डालते थे। उस समय क्षत्राणियाँ कुछ ही पुत्रोंको बचा सकी थीं॥ ६१-६२ १/२ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ॥ ६३ ॥
दक्षिणामश्वमेधान्ते कश्यपायाददत् ततः ।
इस प्रकार शक्तिशाली परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे हीन करके अश्वमेध यज्ञ किया और उसकी समाप्ति होनेपर दक्षिणाके रूपमें यह सारी पृथ्वी उन्होंने कश्यपजीको दे दी॥ ६३ १/२ ॥
स क्षत्रियाणां शेषार्थं करेणोद्दिश्य कश्यपः ॥ ६४ ॥
स्रुक्प्रग्रहवता राजंस्ततो वाक्यमथाब्रवीत् ।
गच्छ तीरं समुद्रस्य दक्षिणस्य महामुने ॥ ६५ ॥
न ते मद् विषये राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् ।
राजन्! तदनन्तर कुछ क्षत्रियोंको बचाये रखनेकी इच्छासे कश्यपजीने स्रुक् लिये हुए हाथसे संकेत करते हुए यह बात कही—‘महामुने! अब तुम दक्षिण समुद्रके तटपर चले जाओ। अब कभी मेरे राज्यमें निवास न करना’॥ ६४-६५ १/२ ॥
ततः शूर्पारकं देशं सागरस्तस्य निर्ममे ॥ ६६ ॥
सहसा जामदग्न्यस्य सोऽपरान्तमहीतलम् ।
(यह सुनकर परशुरामजी चले गये) समुद्रने सहसा जमदग्निकुमार परशुरामजीके लिये जगह खाली करके शूर्पारक देशका निर्माण किया; जिसे अपरान्तभूमि भी कहते हैं॥ ६६ १/२ ॥
कश्यपस्तां महाराज प्रतिगृह्य वसुन्धराम् ॥ ६७ ॥
कृत्वा ब्राह्मणसंस्थां वै प्रविष्टः सुमहद् वनम् ।
महाराज! कश्यपने पृथ्वीको दानमें लेकर उसे ब्राह्मणोंके अधीन कर दिया और वे स्वयं विशाल वनके भीतर चले गये॥ ६७ १/२ ॥