महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः शूद्राश्च वैश्याश्च यथा स्वैरप्रचारिणः ॥ ६८ ॥ अवर्तन्त द्विजाग्र्याणां दारेषु भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! फिर तो स्वेच्छाचारी वैश्य और शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंकी स्त्रियोंके साथ अनाचार करने लगे ॥ ६८ १/२ ॥ अराजके जीवलोके दुर्बला बलवत्तरैः ॥ ६९ ॥ पीड्यन्ते न हि विप्रेषु प्रभुत्वं कस्यचित् तदा । सारे जीवजगत्में अराजकता फैल गयी। बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको पीड़ा देने लगे। उस समय ब्राह्मणोंमेंसे किसीकी प्रभुता कायम न रही ॥ ६९ १/२ ॥ ततः कालेन पृथिवी पीड्यमाना दुरात्मभिः ॥ ७० ॥ विपर्ययेण तेनाशु प्रविवेश रसातलम् । अरक्ष्यमाणा विधिवत् क्षत्रियैर्धर्मरक्षिभिः ॥ ७१ ॥ कालक्रमसे दुरात्मा मनुष्य अपने अत्याचारोंसे पृथ्वीको पीड़ित करने लगे। इस उलट-फेरसे पृथ्वी शीघ्र ही रसातलमें प्रवेश करने लगी; क्योंकि उस समय धर्मरक्षक क्षत्रियोंद्वारा विधिपूर्वक पृथ्वीकी रक्षा नहीं की जा रही थी ॥ ७०-७१ ॥ तां दृष्ट्वा द्रवन्तीं तत्र संत्रासात् स महामनाः । ऊरुणा धारयामास कश्यपः पृथिवीं ततः ॥ ७२ ॥ भयके मारे पृथ्वीको रसातलकी ओर भागती देख महामनस्वी कश्यपने अपने ऊरुओंका सहारा देकर उसे रोक दिया ॥ ७२ ॥ धृता तेनोरुणा येन तेनोर्वीति मही स्मृता । रक्षणार्थं समुद्दिश्य ययाचे पृथिवी तदा ॥ ७३ ॥ प्रसाद्य कश्यपं देवी वरयामास भूमिपम् । कश्यपजीने ऊरुसे इस पृथ्वीको धारण किया था; इसलिये यह उर्वी नामसे प्रसिद्ध हुई। उस समय पृथ्वीदेवीने कश्यपजीको प्रसन्न करके अपनी रक्षाके लिये यह वर माँगा कि मुझे भूपाल दीजिये ॥ ७३ १/२ ॥
पृथिव्युवाच
सन्ति ब्रह्मन् मया गुप्ताः स्त्रीषु क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ ७४ ॥ हैहयानां कुले जातास्ते संरक्षन्तु मां मुने । पृथ्वी बोली—ब्रह्मन्! मैंने स्त्रियोंमें कई क्षत्रियशिरोमणियोंको छिपा रखा है। मुने! वे सब हैहयकुलमें उत्पन्न हुए हैं, जो मेरी रक्षा कर सकते हैं ॥ ७४ १/२ ॥ अस्ति पौरवदायादो विदूरथसुतः प्रभो ॥ ७५ ॥ ऋक्षैः संवर्धितो विप्र ऋक्षवत्यथ पर्वते ।