महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 319, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें(इति स्मरन् पठति च शार्ङ्गधन्वनः शृणोति वा यदुकुलनन्दनस्तवम् । स चक्रभृत्प्रतिहतसर्वकिल्बिषो जनार्दनं प्रविशति देहसंक्षये ॥ जो मनुष्य शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले यदुकुलनन्दन श्रीकृष्णकी इस स्तुतिको याद करते, पढ़ते अथवा सुनते हैं, वे इस शरीरका अन्त होनेपर भगवान् श्रीकृष्णमें प्रवेश कर जाते हैं। चक्रधारी श्रीहरि उनके सारे पापोंका नाश कर डालते हैं ।। स्तवराजः समाप्तोऽयं विष्णोरद्भुतकर्मणः । गाङ्गेयेन पुरा गीतो महापातकनाशनः ॥ गङ्गानन्दन भीष्मने पूर्वकालमें जिसका गान किया था, अद्भुतकर्मा विष्णुका वही यह स्तवराज पूरा हुआ। यह बड़े बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है ।। इमं नरः स्तवराजं मुमुक्षुः पठन् शुचिः कलुषितकल्मषापहम् । अतीत्य लोकानमलान् सनातनान् पदं स गच्छत्यमृतं महात्मनः ॥) यह स्तोत्रराज पापियोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, संसार-बन्धनसे छूटनेकी इच्छावाला जो मनुष्य इसका पवित्रभावसे पाठ करता है, वह निर्मल सनातन लोकोंको भी लाँघकर परमात्मा श्रीकृष्णके अमृतमय धामको चला जाता है ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीष्मस्तवराजे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीष्मस्तवराजविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४७ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल १४२ श्लोक हैं)
१. सामान्यतः कर्ममात्रको प्रकाशित करनेवाले मन्त्रोंको 'वाक' कहते हैं। २. मन्त्रोंके अर्थको खोलकर बतानेवाले ब्राह्मणग्रन्थोंके जो वाक्य हैं, उनका नाम 'अनुवाक' है। ३. कर्मके अंग आदिसे सम्बन्ध रखनेवाले देवता आदिका ज्ञान करानेवाले वचन 'निषद' कहलाते हैं। ४. विशुद्ध आत्मा एवं परमात्माका ज्ञान करानेवाले वचनोंकी 'उपनिषद्' संज्ञा है। १. आश्रावय। २. अस्तु श्रौषट्। ३. यज। ४. ये यजामहे। ५. वषट्।