महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 318, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरित्याग किया था ।। तस्मिन्नुपरते शब्दे ततस्ते ब्रह्मवादिनः । भीष्मं वाग्भिर्बाष्पकण्ठास्तमानर्चुर्महामतिम् ॥ १०३ ॥ जब भीष्मजीका बोलना बंद हो गया, तब वहाँ बैठे हुए ब्रह्मवादी महर्षियोंने आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे परम बुद्धिमान् भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १०३ ॥
ते स्तुवन्तश्च विप्राग्र्याः केशवं पुरुषोत्तमम् । भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशंसुः पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ वे ब्राह्मणशिरोमणि सभी महर्षि पुरुषोत्तम भगवान् केशवकी स्तुति करते हुए धीरे-धीरे भीष्मजीकी बारंबार सराहना करने लगे ॥ १०४ ॥
विदित्वा भक्तियोगं तु भीष्मस्य पुरुषोत्तमः । सहसोत्थाय संहृष्टो यानमेवान्वपद्यत ॥ १०५ ॥ इधर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीष्मजीके भक्तियोगको जानकर सहसा उठे और बड़े हर्षके साथ रथपर जा बैठे ॥ १०५ ॥
केशवः सात्यकिश्चापि रथेनैकेन जग्मतुः । अपरेण महात्मानौ युधिष्ठिरधनंजयौ ॥ १०६ ॥ एक रथसे सात्यकि और श्रीकृष्ण चले तथा दूसरे रथसे महामना युधिष्ठिर और अर्जुन ॥ १०६ ॥
भीमसेनो यमौ चोभौ रथमेकं समाश्रिताः । कृपो युयुत्सुः सूतश्च संजयश्च परंतपः ॥ १०७ ॥ भीमसेन और नकुल-सहदेव तीसरे रथपर सवार हुए। चौथे रथसे कृपाचार्य, युयुत्सु और शत्रुओंको तपानेवाला सारथि संजय—ये तीनों चल दिये ॥ १०७ ॥
ते रथैर्नगराकारैः प्रयाताः पुरुषर्षभाः । नेमिघोषेण महता कम्पयन्तो वसुन्धराम् ॥ १०८ ॥ वे पुरुषप्रवर पाण्डव और श्रीकृष्ण नगराकार रथोंद्वारा उनके पहियोंके गम्भीर घोषसे पृथ्वीको कँपाते हुए बड़े वेगसे गये ॥ १०८ ॥
ततो गिरः पुरुषवरस्तवन्विता द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे । कृताञ्जलिं प्रणतमथापरं जनं स केशिहा मुदितमनाभ्यनन्दत ॥ १०९ ॥ उस समय बहुत-से ब्राह्मण मार्गमें पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी स्तुति करते और भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न-मनसे उसे सुनते थे। दूसरे बहुत-से लोग हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम करते और केशिहन्ता केशव मन ही-मन आनन्दित हो उन लोगोंका अभिनन्दन करते थे ॥ १०९ ॥