भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

जैसे सत्य विष्णुमय है, जैसे सारा संसार विष्णुमय है, जिस प्रकार सब कुछ विष्णुमय है, उस प्रकार इस सत्यके प्रभावसे मेरे सारे पाप नष्ट हो जायँ ।। ९७ ।। त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद् ध्यायस्व सुरोत्तम ।। ९८ ।। देवताओंमें श्रेष्ठ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण! मैं आपका शरणागत भक्त हूँ और अभीष्ट गतिको प्राप्त करना चाहता हूँ; जिसमें मेरा कल्याण हो, वह आप ही सोचिये ।। ९८ ।। इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः । वाग्यज्ञेनार्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ।। ९९ ।। जो विद्या और तपके जन्मस्थान हैं, जिनको दूसरा कोई जन्म देनेवाला नहीं है, उन भगवान् विष्णुका मैंने इस प्रकार वाणीरूप यज्ञसे पूजन किया है। इससे वे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों ।। ९९ ।। नारायणः परं ब्रह्म नारायणपरं तपः । नारायणः परो देवः सर्वं नारायणः सदा ।। १०० ।। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं। नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सदा सब कुछ हैं ।। १०० ।।

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा वचनं भीष्मस्तद्गतमानसः । नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत् तदा ।। १०१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय भीष्मजीका मन भगवान् श्रीकृष्णमें लगा हुआ था, उन्होंने ऊपर बतायी हुई स्तुति करनेके पश्चात् ‘नमः श्रीकृष्णाय’ कहकर उन्हें प्रणाम किया ।। १०१ ।। अभिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः । त्रैलोक्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दत्त्वा ययौ हरिः ।। १०२ ।। भगवान् भी अपने योगबलसे भीष्मजीकी भक्तिको जानकर उनके निकट गये और उन्हें तीनों लोकोंकी बातोंका बोध करानेवाला दिव्य ज्ञान देकर लौट आये ।। १०२ ।। (यं योगिनः प्राप्तवियोगकाले यत्नेन चित्ते विनिवेशयन्ति । स तं पुरस्ताद्धरिमीक्षमाणः प्राणाञ्जहौ प्राप्तफलो हि भीष्मः ॥) योगी पुरुष प्राणत्यागके समय जिन्हें बड़े यत्नसे अपने हृदयमें स्थापित करते हैं, उन्हीं श्रीहरिको अपने सामने देखते हुए भीष्मजीने जीवनका फल प्राप्त करके अपने प्राणोंका