महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततो रामस्य तत् कर्म श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रत्युवाच जनार्दनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! परशुरामजीका वह अलौकिक कर्म सुनकर राजा युधिष्ठिरको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ॥ १ ॥
अहो रामस्य वार्ष्णेय शक्रस्येव महात्मनः ।
विक्रमो वसुधा येन क्रोधान्निःक्षत्रिया कृता ॥ २ ॥
‘वृष्णिनन्दन! महात्मा परशुरामका पराक्रम तो इन्द्रके समान अत्यन्त अद्भुत है, जिन्होंने क्रोध करके यह सारी पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी ॥ २ ॥
गोभिः समुद्रेण तथा गोलाङ्गूलर्क्षवानरैः ।
गुप्ता रामभयोद्विग्नाः क्षत्रियाणां कुलोद्वहाः ॥ ३ ॥
‘क्षत्रियोंके कुलका भार वहन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष परशुरामजीके भयसे उद्विग्न हो छिपे हुए थे और गाय, समुद्र, लंगूर, रीछ तथा वानरोंद्वारा उनकी रक्षा हुई थी ॥ ३ ॥
अहो धन्यो नृलोकोऽयं सभाग्याश्च नरा भुवि ।
यत्र कर्मेदृशं धर्म्यं द्विजेन कृतमित्युत ॥ ४ ॥
‘अहो! यह मनुष्यलोक धन्य है और इस भूतलके मनुष्य बड़े भाग्यवान् हैं, जहाँ द्विजवर परशुरामजीने ऐसा धर्मसंगत कार्य किया’ ॥ ४ ॥
तथावृत्तौ कथां तात तावच्युतयुधिष्ठिरौ ।
जग्मतुर्यत्र गाङ्गेयः शरतल्पगतः प्रभुः ॥ ५ ॥
तात! युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण इस प्रकार बातचीत करते हुए उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ प्रभावशाली गङ्गानन्दन भीष्म बाणशय्यापर सोये हुए थे ॥ ५ ॥
ततस्ते ददृशुर्भीष्मं शरप्रस्तरशायिनम् ।
स्वरश्मिजालसंवीतं सायंसूर्यसमप्रभम् ॥ ६ ॥
उन्होंने देखा कि भीष्मजी शरशय्यापर सो रहे हैं और अपनी किरणोंसे घिरे हुए सायंकालिक सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ६ ॥
उपास्यमानं मुनिभिर्देवैरिव शतक्रतुम् ।
देशे परमधर्मिष्ठे नदीमोघवतीमनु ॥ ७ ॥
जैसे देवता इन्द्रकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार बहुत-से महर्षि ओघवती नदीके तटपर परम धर्ममय स्थानमें उनके पास बैठे हुए थे ॥ ७ ॥