भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

दूरादेव तमालोक्य कृष्णो राजा च धर्मजः । चत्वारः पाण्डवाश्चैव ते च शारद्वतादयः ॥ ८ ॥ अवस्कन्द्याथ वाहेभ्यः संयम्य प्रचलं मनः । एकीकृत्येन्द्रियग्राममुपतस्थुर्महामुनीन् ॥ ९ ॥ श्रीकृष्ण, धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर, अन्य चारों पाण्डव तथा कृपाचार्य आदि सब लोग दूरसे ही उन्हें देखकर अपने-अपने रथसे उतर गये और चंचल मनको काबूमें करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको एकाग्र कर वहाँ बैठे हुए महामुनियोंकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ८-९ ॥ अभिवाद्य तु गोविन्दः सात्यकिस्ते च पार्थिवाः । व्यासादीनृषिमुख्यांश्च गाङ्गेयमुपतस्थिरे ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा अन्य राजाओंने व्यास आदि महर्षियोंको प्रणाम करके गङ्गानन्दन भीष्मको मस्तक झुकाया ॥ १० ॥ ततो वृद्धं तथा दृष्ट्वा गाङ्गेयं यदुकौरवाः । परिवार्य ततः सर्वे निषेदुः पुरुषर्षभाः ॥ ११ ॥ तदनन्तर वे सभी यदुवंशी और कौरव नरश्रेष्ठ बूढ़े गङ्गानन्दन भीष्मजीका दर्शन करके उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ११ ॥ ततो निशाम्य गाङ्गेयं शाम्यमानमिवानलम् । किंचिद् दीनमना भीष्ममिति होवाच केशवः ॥ १२ ॥ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मन-ही-मन कुछ दुखी हो बुझती हुई आगके समान दिखायी देनेवाले गङ्गानन्दन भीष्मको सुनाकर इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥ कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि यथा पुरा । कच्चिन्न व्याकुला चैव बुद्धिस्ते वदतां वर ॥ १३ ॥ 'वक्ताओंमें श्रेष्ठ भीष्मजी! क्या आपकी सारी ज्ञानेन्द्रियाँ पहलेकी ही भाँति प्रसन्न हैं? आपकी बुद्धि व्याकुल तो नहीं हुई है? ॥ १३ ॥ शराभिघातदुःखात् ते कच्चिद् गात्रं न दूयते । मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं बलवत्तरम् ॥ १४ ॥ 'आपको बाणोंकी चोट सहनेका जो कष्ट उठाना पड़ा है उससे आपके शरीरमें विशेष पीड़ा तो नहीं हो रही है? क्योंकि मानसिक दुःखसे शारीरिक दुःख अधिक प्रबल होता है—उसे सहना कठिन हो जाता है ॥ १४ ॥ वरदानात् पितुः कामं छन्दमृत्युरसि प्रभो । शान्तनोर्धर्मनित्यस्य न त्वेतन्मम कारणम् ॥ १५ ॥ 'प्रभो! आपने निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले पिता शान्तनुके वरदानसे मृत्युको अपने अधीन कर लिया है। जब आपकी इच्छा हो तभी मृत्यु हो सकती है अन्यथा नहीं। यह आपके पिताके वरदानका ही प्रभाव है, मेरा नहीं ॥ १५ ॥