महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 338, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुसूक्ष्मोऽपि तु देहे वै शल्यो जनयते रुजम् । किं पुनः शरसंघातैश्चितस्य तव पार्थिव ॥ १६ ॥ ‘राजन्! यदि शरीरमें कोई महीन-से-महीन भी काँटा गड़ जाय तो वह भारी वेदना पैदा करता है। फिर जो बाणोंके समूहसे चुन दिया गया है, उस आपके शरीरकी पीड़ाके विषयमें तो कहना ही क्या? ॥ १६ ॥
कामं नैतत् तवाख्येयं प्राणिनां प्रभवाप्ययौ । उपदेष्टुं भवान् शक्तो देवानामपि भारत ॥ १७ ॥ ‘भरतनन्दन! अवश्य ही आपके सामने यह कहना उचित न होगा कि ‘सभी प्राणियोंके जन्म और मरण प्रारब्धके अनुसार नियत हैं। अतः आपको दैवका विधान समझकर अपने मनमें कोई दुःख नहीं मानना चाहिये।' आपको कोई क्या उपदेश देगा? आप तो देवताओंको भी उपदेश देनेमें समर्थ हैं ॥ १७ ॥
यच्च भूतं भविष्यं च भवच्च पुरुषर्षभ । सर्वं तज्ज्ञानवृद्धस्य तव भीष्म प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥ ‘पुरुषप्रवर भीष्म! आप ज्ञानमें सबसे बढ़े-चढ़े हैं। आपकी बुद्धिमें भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ प्रतिष्ठित है ॥ १८ ॥
संहारश्चैव भूतानां धर्मस्य च फलोदयः । विदितस्ते महाप्राज्ञ त्वं हि धर्ममयो निधिः ॥ १९ ॥ ‘महामते! प्राणियोंका संहार कब होता है? धर्मका क्या फल है? और उसका उदय कब होता है? ये सारी बातें आपको ज्ञात हैं; क्योंकि आप धर्मके प्रचुर भण्डार हैं ॥ १९ ॥
त्वां हि राज्ये स्थितं स्फीते समग्राङ्गमरोगिणम् । स्त्रीसहस्रैः परिवृतं पश्यामीवोर्ध्वरेतसम् ॥ २० ॥ ‘आप एक समृद्धिशाली राज्यके अधिकारी थे, आपके संपूर्ण अङ्ग ठीक थे, किसी अङ्गमें कोई न्यूनता नहीं थी; आपको कोई रोग भी नहीं था और आप हजारों स्त्रियोंके बीचमें रहते थे, तो भी मैं आपको ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न) ही देखता हूँ ॥ २० ॥
ऋते शान्तनवाद् भीष्मात् त्रिषु लोकेषु पार्थिव । सत्यधर्मान्महावीर्याच्छूराद् धर्मैकतत्परात् ॥ २१ ॥ मृत्युमावार्य तपसा शरसंस्तरशायिनः । निसर्गप्रभवं किंचिन्न च तातानुशुश्रुम ॥ २२ ॥ ‘तात! पृथ्वीनाथ! मैंने तीनों लोकोंमें सत्यवादी, एकमात्र धर्ममें तत्पर, शूरवीर, महापराक्रमी तथा बाण-शय्यापर शयन करनेवाले आप शान्तनुनन्दन भीष्मके सिवा दूसरे किसी ऐसे प्राणीको ऐसा नहीं सुना है, जिसने शरीरके लिये स्वभावसिद्ध मृत्युको अपनी तपस्यासे रोक दिया हो ॥ २१-२२ ॥