भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 38

उस रक्त पीनेवाले कीड़ेने कर्णकी जाँघके पास पहुँचकर उसे छेद दिया; परंतु गुरुजीके जागनेके भयसे कर्ण न तो उसे फेंक सका और न मार ही सका॥ संदश्यमानस्तु तथा कृमिणा तेन भारत। गुरोः प्रबोधनाशङ्की तमुपैक्षत सूर्यजः॥ ८॥ भरतनन्दन! वह कीड़ा उसे बारंबार डँसता रहा तो भी सूर्यपुत्र कर्णने कहीं गुरुजी जाग न उठें, इस आशंकासे उसकी उपेक्षा कर दी॥ ८॥ कर्णस्तु वेदनां धैर्यादसह्यां विनिगृह्य ताम्। अकम्पयन्नव्यथयन् धारयामास भार्गवम्॥ ९॥ यद्यपि कर्णको असह्य वेदना हो रही थी तो भी वह धैर्यपूर्वक उसे सहन करके कम्पित और व्यथित न होता हुआ परशुरामजीको गोदमें लिये रहा॥ ९॥ यदास्य रुधिरेणाङ्गं परिस्पृष्टं भृगूद्वहः। तदाबुध्यत तेजस्वी संत्रस्तश्चेदमब्रवीत्॥ १०॥ जब उसका रक्त परशुरामजीके शरीरमें लग गया, तब वे तेजस्वी भार्गव जाग उठे और भयभीत होकर इस प्रकार बोले—॥ १०॥ अहोऽस्म्यशुचितां प्राप्तः किमिदं क्रियते त्वया। कथयस्व भयं त्यक्त्वा याथातथ्यमिदं मम॥ ११॥ ‘अरे! मैं तो अशुद्ध हो गया! तू यह क्या कर रहा है? भय छोड़कर मुझे इस विषयमें ठीक-ठीक बता'॥ तस्य कर्णस्तदाऽऽचष्ट कृमिणा परिभक्षणम्। ददर्श रामस्तं चापि कृमिं सूकरसंनिभम्॥ १२॥ तब कर्णने उनसे कीड़ेके काटनेकी बात बतायी। परशुरामजीने भी उस कीड़ेको देखा, वह सूअरके समान जान पड़ता था॥ १२॥ अष्टपादं तीक्ष्णदंष्ट्रं सूचीभिरिव संवृतम्। रोमभिः संनिरुद्धाङ्गमलर्कं नाम नामतः॥ १३॥ उसके आठ पैर थे और तीखी दाढ़ें। सूई-जैसी चुभनेवाली रोमावलियोंसे उसका सारा शरीर भरा तथा रुँधा हुआ था। वह 'अलर्क' नामसे प्रसिद्ध कीड़ा था॥ स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत्। तस्मिन्नेवासृजि क्लिन्नस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ १४॥ परशुरामजीकी दृष्टि पड़ते ही उसी रक्तसे भीगे हुए उस कीड़ेने प्राण त्याग दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ १४॥ ततोऽन्तरिक्षे ददृशे विश्वरूपः करालवान्। राक्षसो लोहितग्रीवः कृष्णाङ्गो मेघवाहनः॥ १५॥