महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर आकाशमें सब तरहके रूप धारण करनेमें समर्थ एक विकराल राक्षस दिखायी दिया, उसकी ग्रीवा लाल थी और शरीरका रंग काला था। वह बादलोंपर आरूढ था ।। १५ ।।
स रामं प्राञ्जलिर्भूत्वा बभाषे पूर्णमानसः । स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्येऽहं यथागतम् ।। १६ ।। मोक्षितो नरकादस्माद् भवता मुनिसत्तम । भद्रं तवास्तु वन्दे त्वां प्रियं मे भवता कृतम् ।। १७ ।। उस राक्षसने पूर्णमनोरथ हो हाथ जोड़कर परशु-रामजीसे कहा—'भृगुश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। मैं जैसे आया था, वैसे लौट जाऊँगा। मुनिप्रवर! आपने इस नरकसे मुझे छुटकारा दिला दिया। आपका भला हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपने मेरा बड़ा प्रिय कार्य किया है' ।। १६-१७ ।।
तमुवाच महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान् । कस्त्वं कस्माच्च नरकं प्रतिपन्नो ब्रवीहि तत् ।। १८ ।। तब महाबाहु प्रतापी जमदग्निनन्दन परशुरामने उससे पूछा—'तू कौन है? और किस कारणसे इस नरकमें पड़ा था? बतलाओ' ।। १८ ।।