भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 392

इस प्रकार जब वेद और धर्मका नाश होने लगा, तब देवताओंके मनमें भय समा गया। पुरुषसिंह! वे भयभीत होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ २२ ॥ प्रसाद्य भगवन्तं ते देवं लोकपितामहम् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःखवेगसमाहताः ॥ २३ ॥ लोकपितामह भगवान् ब्रह्माको प्रसन्न करके दुःखके वेगसे पीड़ित हुए समस्त देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ २३ ॥ भगवन् नरलोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् । लोभमोहादिभिर्भावैस्ततो नो भयमाविशत् ॥ २४ ॥ ‘भगवन्! मनुष्यलोकमें लोभ, मोह आदि दूषित भावोंने सनातन वैदिक ज्ञानको विलुप्त कर डाला है; इसलिये हमें बड़ा भय हो रहा है ॥ २४ ॥ ब्रह्मणश्च प्रणाशेन धर्मो व्यनशदीश्वर । ततः स्म समतां याता मर्त्यैस्त्रिभुवनेश्वर ॥ २५ ॥ ‘ईश्वर! तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर! वैदिक ज्ञानका लोप होनेसे यज्ञ-धर्म नष्ट हो गया। इससे हम सब देवता मनुष्योंके समान हो गये हैं ॥ २५ ॥ अधो हि वर्षमस्माकं नरास्तूर्ध्वप्रवर्षिणः। क्रियाव्युपरमात् तेषां ततो गच्छाम संशयम् ॥ २६ ॥ ‘मनुष्य यज्ञ आदिमें घीकी आहुति देकर हमारे लिये ऊपरकी ओर वर्षा करते थे और हम उनके लिये नीचेकी ओर पानी बरसाते थे; परंतु अब उनके यज्ञकर्मका लोप हो जानेसे हमारा जीवन संशयमें पड़ गया है ॥ अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद् ध्यायस्व पितामह । त्वत्प्रभावसमुत्थोऽसौ स्वभावो नो विनश्यति ॥ २७ ॥ ‘पितामह! अब जिस उपायसे हमारा कल्याण हो सके, वह सोचिये। आपके प्रभावसे हमें जो दैवस्वभाव प्राप्त हुआ था, वह नष्ट हो रहा है’ ॥ २७ ॥ तानुवाच सुरान् सर्वान् स्वयम्भूर्भगवांस्ततः । श्रेयोऽहं चिन्तयिष्यामि व्येतु वो भीःसुरर्षभाः ॥ २८ ॥ तब भगवान् ब्रह्माने उन सब देवताओंसे कहा—‘सुरश्रेष्ठगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। मैं तुम्हारे कल्याणका उपाय सोचूँगा’ ॥ २८ ॥ ततोऽध्यायसहस्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम् । यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः ॥ २९ ॥ त्रिवर्ग इति विख्यातो गण एष स्वयम्भुवा । तदनन्तर ब्रह्माजीने अपनी बुद्धिसे एक लाख अध्यायोंका एक ऐसा नीतिशास्त्र रचा, जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विस्तारपूर्वक वर्णन है। जिसमें इन वर्गोंका वर्णन हुआ है, वह प्रकरण ‘त्रिवर्ग’ नामसे विख्यात है ॥