महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थो मोक्ष इत्येव पृथगर्थः पृथग्गुणः ॥ ३० ॥ चौथा वर्ग मोक्ष है; उसके प्रयोजन और गुण इन तीनों वर्गोंसे भिन्न हैं ॥ ३० ॥ मोक्षस्यास्ति त्रिवर्गोऽन्यः प्रोक्तः सत्त्वं रजस्तमः । स्थानं वृद्धिः क्षयश्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डजः ॥ ३१ ॥ मोक्षका त्रिवर्ग दूसरा बताया गया है। उसमें सत्त्व, रज और तमकी गणना है। दण्डजनित त्रिवर्ग उससे भिन्न है। स्थान, वृद्धि और क्षय—ये ही उसके भेद हैं (अर्थात् दण्डसे धनियोंकी स्थिति, धर्मात्माओंकी वृद्धि और दुष्टोंका विनाश होता है) ॥ ३१ ॥ आत्मा देशश्च कालश्चाप्युपायाः कृत्यमेव च । सहायाः कारणं चैव षड्वर्गो नीतिजः स्मृतः ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रमें आत्मा, देश, काल, उपाय, कार्य और सहायक—इन छः वर्गोंका वर्णन है। ये छहों नीतिद्वारा संचालित होनेपर उन्नतिके कारण होते हैं ॥ ३२ ॥ त्रयी चान्वीक्षिकी चैव वार्ता च भरतर्षभ । दण्डनीतिश्च विपुला विद्यास्तत्र निदर्शिताः ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस ग्रन्थमें वेदत्रयी (कर्मकाण्ड), आन्वीक्षिकी (ज्ञानकाण्ड), वार्ता (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) और दण्डनीति—इन विपुल विद्याओंका निरूपण किया गया है ॥ ३३ ॥ अमात्यरक्षा प्रणिधी राजपुत्रस्य लक्षणम् । चारश्च विविधोपायः प्रणिधेयः पृथग्विधः ॥ ३४ ॥ साम भेदः प्रदानं च ततो दण्डश्च पार्थिव । उपेक्षा पञ्चमी चात्र कात्स्न्येन समुदाहृता ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजीके उस नीतिशास्त्रमें मन्त्रियोंकी रक्षा (उन्हें कोई फोड़ न ले, इसके लिये सतर्कता), प्रणिधि (राजदूत), राजपुत्रके लक्षण, गुप्तचरोंके विचरणके विविध उपाय, विभिन्न स्थानोंमें विभिन्न प्रकारके गुप्तचरोंकी नियुक्ति, साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा—इन पाँचों उपायोंका पूर्णरूपसे प्रतिपादन किया गया है ॥ ३४-३५ ॥ मन्त्रश्च वर्णितः कृत्स्नस्तथा भेदार्थ एव च । विभ्रमश्चैव मन्त्रस्य सिद्ध्यसिद्धोश्च यत् फलम् ॥ ३६ ॥ सब प्रकारकी मन्त्रणा, भेदनीतिके प्रयोगके प्रयोजन, मन्त्रणामें होनेवाले भ्रम या उसके फूटनेके भय तथा मन्त्रणाकी सिद्धि और असिद्धिके फलका भी इस शास्त्रमें वर्णन है ॥ ३६ ॥ संधिश्च त्रिविधाभिख्यो हीनो मध्यस्तथोत्तमः । भयसत्कारवित्ताख्यं कात्स्न्येन परिवर्णितम् ॥ ३७ ॥ संधिके तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम, इनकी क्रमशः वित्तसंधि, सत्कारसंधि और भयसंधि—ये तीन संज्ञाएँ हैं। धन लेकर जो संधि की जाती है, वह वित्तसंधि उत्तम है।