भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

ग्रन्थमें बताये गये हैं ।। ६१ ।। यन्त्राणि विविधान्येव क्रियास्तेषां च वर्णिताः । अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ।। ६२ ।। नाना प्रकारके यन्त्रों और उनकी क्रियाओंका भी वर्णन किया गया है। शत्रुके राष्ट्रको कुचल देना, उसकी सेनाओंपर चोट करना और उनके निवास-स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देना—इन सब बातोंका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ।। ६२ ।। चैत्यद्रुमावमर्दश्च रोधः कर्मानुशासनम् । अपस्करोऽथ वसनं तथोपायाश्च वर्णिताः ।। ६३ ।। शत्रुकी राजधानीके चैत्य वृक्षोंका विध्वंस करा देना, उसके निवास-स्थान और नगरपर चारों ओरसे घेरा डालना आदि उपायोंका तथा कृषि एवं शिल्प आदि कर्मोंका उपदेश, रथके विभिन्न अवयवोंका निर्माण, ग्राम और नगर आदिमें निवास करनेकी विधि तथा जीवननिर्वाहके अनेक उपायोंका भी उक्त ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६३ ।। पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधिष्ठिर । उपार्जनं च द्रव्याणां परिमर्दश्च तानि षट् ।। ६४ ।। युधिष्ठिर! ढोल, नगारे, शंख, भेरी आदि रणवाद्योंको बजाने, मणि, पशु, पृथ्वी, वस्त्र, दास-दासी तथा सुवर्ण—इन छः प्रकारके द्रव्योंका अपने लिये उपार्जन करने तथा शत्रुपक्षकी इन वस्तुओंका विनाश कर देनेका भी इस शास्त्रमें उल्लेख है ।। ६४ ।। लब्धस्य च प्रशमनं सतां चैवाभिपूजनम् । विद्वद्भिरेकीभावश्च दानहोमविधिज्ञता ।। ६५ ।। मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया । आहारयोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ।। ६६ ।। अपने अधिकारमें आये हुए देशोंमें शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषोंका सत्कार करना, विद्वानोंके साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होमकी विधिको जानना, माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करना, शरीरको वस्त्र और आभूषणोंसे सजाना, भोजनकी व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना—इन सब बातोंका भी उस ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६५-६६ ।। एकेन च यथोत्थेयं सत्यत्वं मधुरा गिरः । उत्सवानां समाजानां क्रियाः केतनजास्तथा ।। ६७ ।। मनुष्य अकेला होकर भी किस प्रकार उत्थान (उन्नति) करे? इसका विचार, सत्यता, उत्सवों और समाजोंमें मधुर वाणीका प्रयोग तथा गृहसम्बन्धी क्रियाएँ—इन सबका वर्णन किया गया है ।। ६७ ।। प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च सर्वाधिकरणेष्वथ । वृत्तेर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्वेक्षणम् ।। ६८ ।।