महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ग्रन्थमें बताये गये हैं ।। ६१ ।। यन्त्राणि विविधान्येव क्रियास्तेषां च वर्णिताः । अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ।। ६२ ।। नाना प्रकारके यन्त्रों और उनकी क्रियाओंका भी वर्णन किया गया है। शत्रुके राष्ट्रको कुचल देना, उसकी सेनाओंपर चोट करना और उनके निवास-स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देना—इन सब बातोंका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ।। ६२ ।। चैत्यद्रुमावमर्दश्च रोधः कर्मानुशासनम् । अपस्करोऽथ वसनं तथोपायाश्च वर्णिताः ।। ६३ ।। शत्रुकी राजधानीके चैत्य वृक्षोंका विध्वंस करा देना, उसके निवास-स्थान और नगरपर चारों ओरसे घेरा डालना आदि उपायोंका तथा कृषि एवं शिल्प आदि कर्मोंका उपदेश, रथके विभिन्न अवयवोंका निर्माण, ग्राम और नगर आदिमें निवास करनेकी विधि तथा जीवननिर्वाहके अनेक उपायोंका भी उक्त ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६३ ।। पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधिष्ठिर । उपार्जनं च द्रव्याणां परिमर्दश्च तानि षट् ।। ६४ ।। युधिष्ठिर! ढोल, नगारे, शंख, भेरी आदि रणवाद्योंको बजाने, मणि, पशु, पृथ्वी, वस्त्र, दास-दासी तथा सुवर्ण—इन छः प्रकारके द्रव्योंका अपने लिये उपार्जन करने तथा शत्रुपक्षकी इन वस्तुओंका विनाश कर देनेका भी इस शास्त्रमें उल्लेख है ।। ६४ ।। लब्धस्य च प्रशमनं सतां चैवाभिपूजनम् । विद्वद्भिरेकीभावश्च दानहोमविधिज्ञता ।। ६५ ।। मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया । आहारयोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ।। ६६ ।। अपने अधिकारमें आये हुए देशोंमें शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषोंका सत्कार करना, विद्वानोंके साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होमकी विधिको जानना, माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करना, शरीरको वस्त्र और आभूषणोंसे सजाना, भोजनकी व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना—इन सब बातोंका भी उस ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६५-६६ ।। एकेन च यथोत्थेयं सत्यत्वं मधुरा गिरः । उत्सवानां समाजानां क्रियाः केतनजास्तथा ।। ६७ ।। मनुष्य अकेला होकर भी किस प्रकार उत्थान (उन्नति) करे? इसका विचार, सत्यता, उत्सवों और समाजोंमें मधुर वाणीका प्रयोग तथा गृहसम्बन्धी क्रियाएँ—इन सबका वर्णन किया गया है ।। ६७ ।। प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च सर्वाधिकरणेष्वथ । वृत्तेर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्वेक्षणम् ।। ६८ ।।
भरतवंशके सिंह युधिष्ठिर! समस्त न्यायालयोंमें जो प्रत्यक्ष और परोक्ष विचार होते हैं तथा वहाँ जो राजकीय पुरुषोंके व्यवहार होते हैं, उन सबका प्रतिदिन निरीक्षण करना चाहिये। इसका भी उक्त शास्त्रमें उल्लेख है ॥ ६८ ॥
अदण्ड्यत्वं च विप्राणां युक्त्या दण्डनिपातनम् ।
अनुजीविस्वजातिभ्यो गुणेभ्यश्च समुद्भवः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मणोंको दण्ड न देनेका, अपराधियोंको युक्तिपूर्वक दण्ड देनेका, अपने पीछे जिनकी जीविका चलती हो उनकी, अपने जाति-भाइयोंकी तथा गुणवान् पुरुषोंकी भी उन्नति करनेका उस ग्रन्थमें उल्लेख है ॥ ६९ ॥
रक्षणं चैव पौराणां राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ।
मण्डलस्था च या चिन्ता राजन् द्वादशराजिका ॥ ७० ॥
राजन्! पुरवासियोंकी रक्षा, राज्यकी वृद्धि तथा द्वादश* राजमण्डलोंके विषयमें जो चिन्तन किया जाता है, उसका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख हुआ है ॥ ७० ॥
द्वासप्ततिविधा चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया ।
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ॥ ७१ ॥
वैद्यक शास्त्रके अनुसार बहत्तर प्रकारकी शारीरिक चिकित्सा तथा देश, जाति और कुलके धर्मोंका भी भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ ७१ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णिताः ।
उपायाश्चार्थलिप्सा च विविधा भूरिदक्षिण ॥ ७२ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर! इस ग्रन्थमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका, इनकी प्राप्तिके उपायोंका तथा नाना प्रकारकी धन-लिप्साका भी वर्णन है ॥ ७२ ॥
मूलकर्मक्रिया चात्र मायायोगश्च वर्णितः ।
दूषणं स्रोतसां चैव वर्णितं चास्थिराम्भसाम् ॥ ७३ ॥
इस ग्रन्थमें कोशकी वृद्धि करनेवाले जो कृषि, वाणिज्य आदि मूल कर्म हैं, उनके करनेका प्रकार बताया गया है। मायाके प्रयोगकी विधि समझायी गयी है। स्रोतजल और अस्थिरजलके दोषोंका वर्णन किया गया है ॥ ७३ ॥
यैर्यैरुपायैर्लोकस्तु न चलेदार्यवर्त्मनः ।
तत् सर्वं राजशार्दूल नीतिशास्त्रेऽभिवर्णितम् ॥ ७४ ॥
राजसिंह! जिन-जिन उपायोंद्वारा यह जगत् सन्मार्गसे विचलित न हो, उन सबका इस नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ७४ ॥
एतत् कृत्वा शुभं शास्त्रं ततः स भगवान् प्रभुः ।
देवानुवाच संहृष्टः सर्वान् शक्रपुरोगमान् ॥ ७५ ॥
इस शुभ शास्त्रका निर्माण करके जगत्के स्वामी भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंसे इस प्रकार बोले— ॥ ७५ ॥
उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च । नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरेषा प्रभाविता ॥ ७६ ॥ 'देवगण! सम्पूर्ण जगत्के उपकार तथा धर्म, अर्थ एवं कामकी स्थापनाके लिये वाणीका सारभूत यह विचार यहाँ प्रकट किया गया ॥ ७६ ॥ दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका । निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥ ७७ ॥ 'दण्ड-विधानके साथ रहनेवाली यह नीति सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाली है। यह दुष्टोंके निग्रह और साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रहमें तत्पर रहकर सम्पूर्ण जगत्में प्रचलित होगी ॥ ७७ ॥ दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः । दण्डनीतिरिति ख्याता त्रीँल्लोँकानभिवर्तते ॥ ७८ ॥ 'इस शास्त्रके अनुसार दण्डके द्वारा जगत्का सन्मार्गपर स्थापन किया जाता है अथवा राजा इसके अनुसार प्रजावर्गमें दण्डकी स्थापना करता है; इसलिये यह विद्या दण्डनीतिके नामसे विख्यात है। इसका तीनों लोकोंमें विस्तार होगा ॥ ७८ ॥ षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु । धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शब्दिताः ॥ ७९ ॥ 'यह विद्या संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंका सारभूत है। महात्माओंमें इसका स्थान सबसे आगे होगा। इस शास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका निरूपण किया गया है' ॥ ७९ ॥ ततस्तां भगवान् नीतिं पूर्वं जग्राह शङ्करः । बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ८० ॥ तदनन्तर सबसे पहले भगवान् शङ्करने इस नीतिशास्त्रको ग्रहण किया। वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु, उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ८० ॥ प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः । संचिक्षेप ततः शास्त्रं महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥ ८१ ॥ वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत । विशालाक्ष भगवान् शिवने प्रजावर्गकी आयुका ह्रास होता जानकर ब्रह्माजीके रचे हुए इस महान् अर्थसे भरे हुए शास्त्रको संक्षिप्त किया था; इसलिये इसका नाम 'वैशालाक्ष' हो गया। फिर इसे इन्द्रने ग्रहण किया ॥ ८१ ½ ॥ दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ ८२ ॥ भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरंदरः । सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ ८३ ॥
महातपस्वी सुब्रह्मण्य भगवान् पुरन्दरने जब इसका अध्ययन किया, उस समय इसमें दस हजार अध्याय थे। फिर उन्होंने भी इसका संक्षेप किया, जिससे यह पाँच हजार अध्यायोंका ग्रन्थ हो गया। तात! वही ग्रन्थ 'बाहुदन्तक' नामक नीतिशास्त्रके रूपमें विख्यात हुआ ।। ८२-८३ ।।
अध्यायानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव बृहस्पतिः ।
संचिक्षेपेश्वरो बुद्ध्या बार्हस्पत्यं तदुच्यते ।। ८४ ।।
इसके बाद सामर्थ्यशाली बृहस्पतिने अपनी बुद्धिसे इसका संक्षेप किया, तबसे इसमें तीन हजार अध्याय रह गये। यही 'बार्हस्पत्य' नामक नीतिशास्त्र कहलाता है ।। ८४ ।।
अध्यायानां सहस्रेण काव्यः संक्षेपमब्रवीत् ।
तच्छास्त्रममितप्रज्ञो योगाचार्यो महायशाः ।। ८५ ।।
फिर महायशस्वी, योगशास्त्रके आचार्य तथा अमित बुद्धिमान् शुक्राचार्यने एक हजार अध्यायोंमें उस शास्त्रका संक्षेप किया ।। ८५ ।।
एवं लोकानुरोधेन शास्त्रमेतन्महर्षिभिः ।
संक्षिप्तमायुर्विज्ञाय मर्त्यानां ह्रासमेव च ।। ८६ ।।
इस प्रकार मनुष्योंकी आयुका ह्रास होता जानकर जगत्के हितके लिये महर्षियोंने इस शास्त्रका संक्षेप किया है ।। ८६ ।।
अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् ।
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं वै तं समादिश ।। ८७ ।।
तदनन्तर देवताओंने प्रजापति भगवान् विष्णुके पास जाकर कहा—'भगवन्! मनुष्योंमें जो एक पुरुष सबसे श्रेष्ठ पद प्राप्त करनेका अधिकारी हो, उसका नाम बताइये' ।।
ततः संचिन्त्य भगवान् देवो नारायणः प्रभुः ।
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम् ।। ८८ ।।
तब प्रभावशाली भगवान् नारायणदेवने भलीभाँति सोच-विचारकर अपने तेजसे एक मानस पुत्रकी सृष्टि की, जो विरजाके नामसे विख्यात हुआ ।। ८८ ।।
विरजास्तु महाभागः प्रभुत्वं भुवि नैच्छत ।
न्यासायैवाभवद् बुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ।। ८९ ।।
पाण्डुनन्दन! महाभाग विरजाने पृथ्वीपर राजा होनेकी इच्छा नहीं की। उनकी बुद्धिने संन्यास लेनेका ही निश्चय किया ।। ८९ ।।
कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत् सोऽपि पञ्चातिगोऽभवत् ।
कर्दमस्तस्य तु सुतः सोऽप्यतप्यन्महत् तपः ।। ९० ।।
विरजाके कीर्तिमान् नामक एक पुत्र हुआ। वह भी पाँचों विषयोंसे ऊपर उठकर मोक्षमार्गका ही अवलम्बन करने लगा। कीर्तिमान्के पुत्र हुए कर्दम। वे भी बड़ी भारी
तपस्यामें लग गये ॥ ९० ॥
प्रजापतेः कर्दमस्य त्वनङ्गो नाम वै सुतः ।
प्रजा रक्षयिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ॥ ९१ ॥
प्रजापति कर्दमके पुत्रका नाम अनङ्ग था, जो कालक्रमसे प्रजाका संरक्षण करनेमें समर्थ, साधु तथा दण्डनीतिविद्यामें निपुण हुआ ॥ ९१ ॥
अनङ्गपुत्रोऽतिबलो नीतिमानभिगम्य वै ।
प्रतिपेदे महाराज्यमथेन्द्रियवशोऽभवत् ॥ ९२ ॥
अनङ्गके पुत्रका नाम था अतिबल। वह भी नीतिशास्त्रका ज्ञाता था, उसने विशाल राज्य प्राप्त किया। राज्य पाकर वह इन्द्रियोंका गुलाम हो गया ॥ ९२ ॥
मृत्योस्तु दुहिता राजन् सुनीथा नाम मानसी ।
प्रख्याता त्रिषु लोकेषु यासौ वेनमजीजनत् ॥ ९३ ॥
राजन्! मृत्युकी एक मानसिक कन्या थी, जिसका नाम था सुनीथा। जो अपने रूप और गुणके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात थी। उसीने वेनको जन्म दिया था ॥ ९३ ॥
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् ।
मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुर्ऋषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९४ ॥
वेन राग-द्वेषके वशीभूत हो प्रजाओंपर अत्याचार करने लगा। तब वेदवादी ऋषियोंने मन्त्रपूत कुशोंद्वारा उसे मार डाला ॥ ९४ ॥
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषयस्तस्य मन्त्रतः ।
ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि ॥ ९५ ॥
फिर वे ही ऋषि मन्त्रोच्चारणपूर्वक वेनकी दाहिनी जङ्घाका मन्थन करने लगे। उससे इस पृथ्वीपर एक नाटे कदका मनुष्य उत्पन्न हुआ, जिसकी आकृति बेडौल थी ॥
दग्धस्थूणाप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः ।
निषीदेत्येवमूचुस्तमृषयो ब्रह्मवादिनः ॥ ९६ ॥
वह जले हुए खम्भेके समान जान पड़ता था। उसकी आँखें लाल और काले बाल थे। वेदवादी महर्षियोंने उसे देखकर कहा— 'निषीद' बैठ जाओ ॥ ९६ ॥
तस्मान्निषादाः सम्भूताः क्रूराः शैलवनाश्रयाः ।
ये चान्ये विन्ध्यनिलया म्लेच्छाः शतसहस्रशः ॥ ९७ ॥
उसीसे पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले क्रूर निषादोंकी उत्पत्ति हुई तथा दूसरे जो विन्ध्यगिरिके निवासी लाखों म्लेच्छ थे, उनका भी प्रादुर्भाव हुआ ॥ ९७ ॥
भूयोऽस्य दक्षिणं पाणिं ममन्थुस्ते महर्षयः ।
ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ॥ ९८ ॥
इसके बाद फिर महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथका मन्थन किया। उससे एक दूसरे पुरुषका प्राकट्य हुआ, जो रूपमें देवराज इन्द्रके समान थे ॥ ९८ ॥
कवची बद्धनिस्त्रिंशः सशरः सशरासनः ।
वेदवेदाङ्गविच्चैव धनुर्वेदे च पारगः ॥ ९९ ॥
वे कवच धारण किये, कमरमें तलवार बाँधे तथा धनुष और बाण लिये प्रकट हुए थे। उन्हें वेदों और वेदान्तोंका पूर्ण ज्ञान था। वे धनुर्वेदके भी पारङ्गत विद्वान् थे ॥ ९९ ॥
तं दण्डनीतिः सकला श्रिता राजन् नरोत्तमम् ।
ततस्तु प्राञ्जलिर्वैन्यो महर्षींस्तानुवाच ह ॥ १०० ॥
राजन्! नरश्रेष्ठ वेनकुमारको सारी दण्डनीतिका स्वतः ज्ञान हो गया। तब उन्होंने हाथ जोड़कर उन महर्षियोंसे कहा— ॥ १०० ॥
सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना बुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी ।
अनया किं मया कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत ॥ १०१ ॥
‘महात्माओ! धर्म और अर्थका दर्शन करानेवाली अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि मुझे स्वतः प्राप्त हो गयी है। मुझे इस बुद्धिके द्वारा आपलोगोंकी कौन-सी सेवा करनी है, यह मुझे यथार्थ रूपसे बताइये ॥ १०१ ॥
यन्मां भवन्तो वक्ष्यन्ति कार्यमर्थसमन्वितम् ।
तदहं वै करिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ॥ १०२ ॥
‘आपलोग मुझे जिस किसी भी प्रयोजनपूर्ण कार्यके लिये आज्ञा देंगे, उसे मैं अवश्य पूरा करूँगा। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १०२ ॥
तमूचुस्तत्र देवास्ते ते चैव परमर्षयः ।
नियतो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर ॥ १०३ ॥
तब वहाँ देवताओं और उन महर्षियोंने उनसे कहा—‘वेननन्दन! जिस कार्यमें नियमपूर्वक धर्मकी सिद्धि होती हो, उसे निर्भय होकर करो ॥ १०३ ॥
प्रियाप्रिये परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु ।
कामं क्रोधं च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ॥ १०४ ॥
‘प्रिय और अप्रियका विचार छोड़कर काम, क्रोध, लोभ और मानको दूर हटाकर समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखो ॥ १०४ ॥
यश्च धर्मात् प्रविचलेल्लोके कश्चन मानवः ।
निग्राह्यस्ते स्वबाहुभ्यां शश्वद् धर्ममवेक्षता ॥ १०५ ॥
‘लोकमें जो कोई भी मनुष्य धर्मसे विचलित हो, उसे सनातन धर्मपर दृष्टि रखते हुए अपने बाहुबलसे परास्त करके दण्ड दो ॥ १०५ ॥
प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा ।
पालयिष्याम्यहं भौमं ब्रह्म इत्येव चासकृत् ॥ १०६ ॥
‘साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि ‘मैं मन, वाणी और क्रियाद्वारा भूतलवर्ती ब्रह्म (वेद) का निरन्तर पालन करूँगा’ ॥ १०६ ॥
यश्चात्र धर्मो नित्योक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रयः । तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ।। १०७ ।। ‘वेदमें दण्डनीतिसे सम्बन्ध रखनेवाला जो नित्य धर्म बताया गया है, उसका मैं निःशंक होकर पालन करूँगा। कभी स्वच्छन्द नहीं होऊँगा’ ।। १०७ ।। अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीहि हे विभो । लोकं च संकरात्कृत्स्नं त्रातास्मीति परंतप ।। १०८ ।।
अध्याय (पृष्ठ 405)
राजा वेनके बाहु-मन्थनसे महाराज पृथुका प्राकट्य
'परंतप प्रभो! साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि 'ब्राह्मण मेरे लिये अदण्डनीय होंगे तथा मैं सम्पूर्ण जगत्के वर्णसंकरता और धर्मसंकरतासे बचाऊँगा' ।। १०८ ।। वैन्यस्ततस्तानुवाच देवानृषिपुरोगमान् । ब्राह्मणा मे महाभागा नमस्याः पुरुषर्षभाः ।। १०९ ।। तब वेनकुमारने उन देवताओं तथा उन अग्रवर्ती ऋषियोंसे कहा—'नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिये सदा वन्दनीय होंगे' ।। १०९ ।। एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो ब्रह्मवादिभिः । पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्नो ब्रह्ममयो निधिः ।। ११० ।। उनके ऐसा कहनेपर उन वेदवादी महर्षियोंने उनसे इस प्रकार कहा, 'एवमस्तु'। फिर शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए, जो वैदिक ज्ञानके भण्डार हैं ।। ११० ।। मन्त्रिणो वालखिल्याश्च सारस्वत्यो गणस्तथा । महर्षिर्भगवान् गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ।। १११ ।। वालखिल्यगण तथा सरस्वतीतटवर्ती महर्षियोंके समुदायने उनके मन्त्रीका कार्य सँभाला। महर्षि भगवान् गर्ग उनके दरबारके ज्योतिषी हुए ।। १११ ।। आत्मनाष्टम इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु । उत्पन्नौ बन्दिनौ चास्य तत्पूर्वो सूतमागधौ ।। ११२ ।। मनुष्योंमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि स्वयं राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें थे*। उनके जन्मसे पहले ही सूत और मागध नामक दो बन्दी (स्तुतिपाठक) उत्पन्न हुए थे ।। ११२ ।। तयोः प्रीतो ददौ राजा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । अनूपदेशं सूताय मगधं मागधाय च ।। ११३ ।। वेनके पुत्र प्रतापी राजा पृथुने उन दोनोंको प्रसन्न होकर पुरस्कार दिया। सूतको अनूप देश सागरतटवर्ती प्राप्त) और मागधको मगध देश प्रदान किया ।। ११३ ।। समतां वसुधायाश्च स सम्यगुदपादयत् । वैषम्यं हि परं भूमेरासीदिति च नः श्रुतम् ।। ११४ ।। सुना जाता है कि पृथुके समय यह पृथ्वी बहुत ऊँची-नीची थी। उन्होंने ही इसे भलीभाँति समतल बनाया था ।। ११४ ।। मन्वन्तरेषु सर्वेषु विषमा जायते मही । उज्जहार ततो वैन्यः शिलाजालान् समन्ततः ।। ११५ ।। धनुष्कोट्या महाराज तेन शैला विवर्धिताः ।
महाराज! सभी मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है; उस समय वेनकुमार पृथुने धनुषकी कोटिद्वारा चारों ओरसे शिलासमूहोंको उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थानपर संचित कर दिया; इसीलिये पर्वतोंकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी ॥ ११५ १/२ ॥ स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह ॥ ११६ ॥ ऋषिभिश्च प्रजापालैर्ब्राह्मणैश्चाभिषेचितः । भगवान् विष्णु, देवताओंसहित इन्द्र, ऋषिसमूह, प्रजापतिगण तथा ब्राह्मणोंने पृथुका राजाके पदपर अभिषेक किया ॥ ११६ १/२ ॥ तं साक्षात् पृथिवी भेजे रत्नान्यादाय पाण्डव ॥ ११७ ॥ सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः । शक्रश्च धनमक्षय्यं प्रादात् तस्मै युधिष्ठिर ॥ ११८ ॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! उस समय साक्षात् पृथिवी देवी रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुई थी। सरिताओंके स्वामी समुद्र, पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमवान् तथा देवराज इन्द्रने अक्षय धन समर्पित किया ॥ ११७-११८ ॥ रुक्मं चापि महामेरुः स्वयं कनकपर्वतः । यक्षराक्षसभर्ता च भगवान् नरवाहनः ॥ ११९ ॥ धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् । सुवर्णमय पर्वत महामेरुने स्वयं आकर उन्हें सुवर्णकी राशि भेंट की। मनुष्योंपर सवारी करनेवाले यक्षराक्षसराज भगवान् कुबेरने भी उन्हें इतना धन दिया, जो उनके धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह करनेके लिये पर्याप्त हो ॥ ११९ १/२ ॥ हया रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा ॥ १२० ॥ प्रादुर्बभूवुर्वैन्यस्य चिन्तनादेव पाण्डव । पाण्डुनन्दन! वेनपुत्र पृथुके चिन्तन करते ही उनकी सेवामें घोड़े, रथ, हाथी और करोड़ों मनुष्य प्रकट हो गये ॥ १२० १/२ ॥ न जरा न च दुर्भिक्षं नाधयो व्याधयस्तथा ॥ १२१ ॥ सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्योन्यात् कदाचन । भयमुत्पद्यते तत्र तस्य राज्ञोऽभिरक्षणात् ॥ १२२ ॥ उनके राज्यमें किसीको बुढ़ापा, दुर्भिक्ष तथा आधि-व्याधिका कष्ट नहीं था। राजाकी ओरसे रक्षाकी समुचित व्यवस्था होनेके कारण वहाँ कभी किसीको सर्पों, चोरों तथा आपसके लोगोंसे भय नहीं प्राप्त होता था ॥ आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १२३ ॥ जिस समय वे समुद्रमें होकर चलते थे, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें रास्ता दे देते थे, उनके रथकी ध्वजा कभी टूटी नहीं ॥ १२३ ॥
तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च । यक्षराक्षसनागैश्चापीप्सितं यस्य यस्य यत् ॥ १२४ ॥ उन्होंने इस पृथ्वीसे सत्रह प्रकारके धान्योंका दोहन किया था, यक्षों, राक्षसों और नागोंमेंसे जिसको जो वस्तु अभीष्ट थी, वह उन्होंने पृथ्वीसे दुह ली थी ॥ १२४ ॥
तेन धर्मोत्तरश्चायं कृतो लोको महात्मना । रंजिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥ १२५ ॥ उन महात्माने सम्पूर्ण जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित कर दी थी। उन्होंने समस्त प्रजाओंका रंजन किया था; इसलिये वे ‘राजा’ कहलाते थे ॥ १२५ ॥
ब्राह्मणानां क्षतत्राणात् ततः क्षत्रिय उच्यते । प्रथिता धर्मतश्चेयं पृथिवी बहुभिः स्मृता ॥ १२६ ॥ ब्राह्मणोंको क्षतिसे बचानेके कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। उन्होंने धर्मके द्वारा इस भूमिको प्रथित किया—इसकी ख्याति बढ़ायी; इसलिये बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा यह ‘पृथ्वी’ कहलायी ॥ १२६ ॥
स्थापनं चाकरोद् विष्णुः स्वयमेव सनातनः । नातिवर्तिष्यते कश्चिद् राजंस्त्वामिति भारत ॥ १२७ ॥ भरतनन्दन! स्वयं सनातन भगवान् विष्णुने उनके लिये यह मर्यादा स्थापित की कि ‘राजन्! कोई भी तुम्हारी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकेगा’ ॥ १२७ ॥
तपसा भगवान् विष्णुराविवेश च भूमिपम् । देववन्नरदेवानां नमते यं जगन्नृपम् ॥ १२८ ॥ राजा पृथुकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् विष्णुने स्वयं उनके भीतर प्रवेश किया था। समस्त नरेशोंमेंसे राजा पृथुको ही यह सारा जगत् देवताके समान मस्तक झुकाता था ॥ १२८ ॥
दण्डनीत्या च सततं रक्षितव्यं नरेश्वर । नाधर्षयेत् तथा कश्चिच्चारनिष्पन्ददर्शनात् ॥ १२९ ॥ नरेश्वर! इसलिये तुम्हें गुप्तचर नियुक्त करके राज्यकी अवस्थापर दृष्टिपात करते हुए सदा दण्डनीतिके द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे कोई इसपर आक्रमण करनेका साहस न कर सके ॥ १२९ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते । आत्मना कारणैश्चैव समस्येह महीक्षितः ॥ १३० ॥ को हेतुर्यद् वशे तिष्ठेल्लोको दैवादृते गुणात् । राजेन्द्र! चित्त और क्रियाद्वारा समभाव रखनेवाले राजाका किया हुआ शुभ कर्म प्रजाके भलेके लिये ही होता है। उसके दैवी गुणके सिवा और क्या कारण हो सकता है, जिससे सारा देश उस एक ही व्यक्तिके अधीन रहे? ॥ १३० १/२ ॥
विष्णोर्ललाटात् कमलं सौवर्णमभवत् तदा ॥ १३१ ॥
श्रीः सम्भूता यतो देवी पत्नी धर्मस्य धीमतः ।
उस समय भगवान् विष्णुके ललाटसे एक सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ, जिससे बुद्धिमान् धर्मकी पत्नी श्रीदेवीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १३१ १/२ ॥
श्रियः सकाशादर्थश्च जातो धर्मेण पाण्डव ॥ १३२ ॥
अथ धर्मस्तथैवार्थः श्रीश्च राज्ये प्रतिष्ठिता ।
पाण्डुनन्दन! धर्मके द्वारा श्रीदेवीसे अर्थकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर धर्म, अर्थ और श्री—तीनों ही राज्यमें प्रतिष्ठित हुए ॥ १३२ १/२ ॥
सुकृतस्य क्षयाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् ॥ १३३ ॥
पार्थिवो जायते तात दण्डनीतिविशारदः ।
तात! पुण्यका क्षय होनेपर मनुष्य स्वर्गलोकसे पृथिवीपर आता और दण्डनीतिविशारद राजाके रूपमें जन्म लेता है ॥ १३३ १/२ ॥
महत्त्वेन च संयुक्तो वैष्णवेन नरो भुवि ॥ १३४ ॥
बुद्ध्या भवति संयुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ।
वह मनुष्य इस भूतलपर भगवान् विष्णुकी महत्तासे युक्त तथा बुद्धिसम्पन्न हो विशेष माहात्म्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३४ १/२ ॥
स्थापितं च ततो देवैर्न कश्चिदतिवर्तते ।
तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चेदं न विधीयते ॥ १३५ ॥
तदनन्तर उसे देवताओंद्वारा राजाके पदपर स्थापित हुआ मानकर कोई भी उसकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करता। यह सारा जगत् उस एक ही व्यक्तिके वशमें स्थित रहता है, उसके ऊपर यह जगत् अपना शासन नहीं चला सकता ॥ १३५ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते ।
तुल्यस्यैकस्य यस्यायं लोको वचसि तिष्ठते ॥ १३६ ॥
राजेन्द्र! शुभ कर्मका परिणाम शुभ ही होता है, कभी तो अन्य मनुष्योंके समान होनेपर भी एक-मात्र राजाकी आज्ञामें यह सारा जगत् स्थित रहता है ॥ १३६ ॥
योऽस्य वै मुखमद्राक्षीत् सौम्यं सोऽस्य वशानुगः ।
सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ॥ १३७ ॥
जिसने राजाका सौम्य मुख देख लिया, वह उसके अधीन हो गया। प्रत्येक मनुष्य राजाको सौभाग्यशाली, धनवान् और रूपवान् देखता है ॥ १३७ ॥
महत्त्वात् तस्य दण्डस्य नीतिर्विस्पष्टलक्षणा ।
नयचारश्च विपुलॊ येन सर्वमिदं ततम् ॥ १३८ ॥
पूर्वोक्त दण्डकी महत्तासे ही स्पष्ट लक्षणोंवाली नीति तथा न्यायोचित आचारका अधिक प्रचार होता है, जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ १३८ ॥
आगमश्च पुराणानां महर्षीणां च सम्भवः ।
तीर्थवंशश्च वंशश्च नक्षत्राणां युधिष्ठिर ॥ १३९ ॥
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च ।
चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्विद्यं च कीर्तितम् ॥ १४० ॥
युधिष्ठिर! पुराणशास्त्र, महर्षियोंकी उत्पत्ति, तीर्थ-समूह, नक्षत्रसमुदाय, ब्रह्मचर्य आदि चार आश्रम, होता आदि चार प्रकारके ऋत्विजोंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्म, चारों वर्ण और चारों विद्याओंका पूर्वोक्त नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ १३९-१४० ॥
इतिहासाश्च वेदाश्च न्यायः कृत्स्नश्च वर्णितः ।
तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यासत्येन यः परः ॥ १४१ ॥
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च ।
सर्वभूतानुकम्पा च सर्वमत्रोपवर्णितम् ॥ १४२ ॥
इतिहास, वेद, न्याय—इन सबका उसमें पूरा-पूरा वर्णन है। तप, ज्ञान, अहिंसाका तथा जो सत्य, असत्यसे परे है उसका और वृद्धजनोंकी सेवा, दान, शौच, उत्थान तथा समस्त प्राणियोंपर दया आदि सभी विषयोंका उस ग्रन्थमें वर्णन है ॥ १४१-१४२ ॥
भुवि चाधोगतं यच्च तच्च सर्वं समर्पितम् ।
तस्मिन् पैतामहे शास्त्रे पाण्डवैतन्न संशयः ॥ १४३ ॥
पाण्डुनन्दन! अधिक क्या कहा जाय? जो कुछ इस पृथ्वीपर है और जो इसके नीचे है, उस सबका ब्रह्माजीके पूर्वोक्त शास्त्रमें समावेश किया गया है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४३ ॥
ततो जगति राजेन्द्र सततं शब्दितं बुधैः ।
देवाश्च नरदेवाश्च तुल्या इति विशाम्पते ॥ १४४ ॥
राजेन्द्र! प्रजानाथ! तबसे जगत्में विद्वानोंने सदाके लिये यह घोषणा कर दी है कि 'देव और नरदेव (राजा) दोनों समान हैं' ॥ १४४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं महत्त्वं प्रति राजसु ।
कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तते ॥ १४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार राजाओंका जो कुछ महत्त्व है, वह सब मैंने सम्पूर्ण रूपसे तुम्हें बता दिया। अब इस विषयमें तुम्हारे लिये और क्या जानना शेष रह गया है? ॥ १४५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सूत्राध्याये एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सूत्राध्यायविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
* शत्रुपर चढ़ाई करनेके चार अवसर ये हैं—(१) अपने मित्रोंकी वृद्धि। (२) अपने कोशका भरपूर संग्रह। (३) शत्रुके मित्रोंका नाश। (४) शत्रुके कोशकी हानि।
* पहला शत्रु राजा, दूसरा मित्र राजा, तीसरा शत्रु का मित्र राजा, चौथा मित्रका मित्र राजा, पाँचवाँ शत्रुके मित्रका मित्र राजा, छठा अपने पृष्ठभागकी रक्षाके लिये स्वयं उपस्थित हुआ राजा, सातवाँ शत्रु की सहायता एवं पृष्ठपोषणके लिये स्वयं उपस्थित राजा, आठवाँ अपने पक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, नवाँ शत्रुपक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, दसवाँ स्वयं विजयाभिलाषी नरेश, ग्यारहवाँ अपने और शत्रु दोनोंकी ओरसे मध्यस्थ राजा, बारहवाँ सबसे अधिक शक्तिशाली एवं उदासीन राजा—ये द्वादश राजमण्डल कहे गये हैं।
१-विष्णु, २-विरजा, ३-कीर्तिमान्, ४-कर्दम, ५-अनङ्ग, ६-अतिबल, ७-वेन, ८-पृथु। इस प्रकार गणना करनेपर राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें ज्ञात होते हैं।
वर्ण-धर्मका वर्णन
षष्टितमोऽध्यायः
वर्ण-धर्मका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
ततः पुनः स गाङ्गेयमभिवाद्य पितामहम् ।
प्राञ्जलिर्नियतो भूत्वा पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मनको वशमें करके गङ्गानन्दन पितामह भीष्मको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा— ॥ १ ॥
के धर्माः सर्ववर्णानां चातुर्वर्ण्यस्य के पृथक् ।
चातुर्वर्ण्याश्रमाणां च राजधर्मांश्च के मताः ॥ २ ॥
‘पितामह! कौन-से ऐसे धर्म हैं, जो सभी वर्णोंके लिये उपयोगी हो सकते हैं। चारों वर्णोंके पृथक्-पृथक् धर्म कौन-से हैं? चारों वर्णोंके साथ ही चारों आश्रमोंके भी धर्म कौन हैं तथा राजाके द्वारा पालन करने योग्य कौन-कौन-से धर्म माने गये हैं? ॥ २ ॥
केन वै वर्धते राष्ट्रं राजा केन विवर्धते ।
केन पौराश्च भृत्याश्च वर्धन्ते भरतर्षभ ॥ ३ ॥
‘राष्ट्रकी वृद्धि कैसे होती है, राजाका अभ्युदय किस उपायसे होता है? भरतश्रेष्ठ! पुरवासियों और भरण-पोषण करने योग्य सेवकोंकी उन्नति भी किस उपायसे होती है? ॥ ३ ॥
कोशं दण्डं च दुर्गं च सहायान् मन्त्रिणस्तथा ।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् कीदृशान् वर्जयेन्नृपः ॥ ४ ॥
‘राजाको किस प्रकारके कोश, दण्ड, दुर्ग, सहायक, मन्त्री, ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्योंका त्याग कर देना चाहिये? ॥ ४ ॥
केषु विश्वसितव्यं स्याद् राज्ञा कस्याञ्चिदापदि ।
कुतो वाऽऽत्मा दृढं रक्ष्यस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥
‘पितामह! किसी आपत्तिके आनेपर राजाको किन लोगोंपर विश्वास करना चाहिये और किन लोगोंसे अपने शरीरकी दृढ़तापूर्वक रक्षा करनी चाहिये? यह मुझे बताइये’ ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
नमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।
ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महान् धर्मको नमस्कार है, विश्वविधाता श्रीकृष्णको नमस्कार है। अब मैं उपस्थित ब्राह्मणोंको नमस्कार करके सनातन धर्मका वर्णन आरम्भ करता हूँ॥ ६॥
अक्रोधः सत्यवचनं संविभागः क्षमा तथा ।
प्रजनः स्वेषु दारेषु शौचमद्रोह एव च ॥ ७ ॥
आर्जवं भृत्यभरणं नवैते सार्ववर्णिकाः ।
ब्राह्मणस्य तु यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि केवलम् ॥ ८ ॥
किसीपर क्रोध न करना, सत्य बोलना, धनको बाँटकर भोगना, क्षमाभाव रखना, अपनी ही पत्नीके गर्भसे संतान पैदा करना, बाहर-भीतरसे पवित्र रहना, किसीसे द्रोह न करना, सरलभाव रखना और भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंका पालन करना—ये नौ सभी वर्णोंके लिये उपयोगी धर्म हैं। अब मैं केवल ब्राह्मणका जो धर्म है, उसे बता रहा हूँ॥ ७-८॥
दममेव महाराज धर्ममाहुः पुरातनम् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव तत्र कर्म समाप्यते ॥ ९ ॥
महाराज! इन्द्रिय-संयमको ब्राह्मणोंका प्राचीन धर्म बताया गया है। इसके सिवा, उन्हें सदा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करना चाहिये; क्योंकि इसीसे उनके सब कर्मोंकी पूर्ति हो जाती है ॥ ९ ॥
तं चेद् द्विजमुपागच्छेद् वर्तमानं स्वकर्मणि ।
अकुर्वाणं विकर्माणि शान्तं प्रज्ञानतर्पितम् ॥ १० ॥
कुर्वीतापत्यसंतानमथो दद्याद् यजेत च ।
संविभज्य च भोक्तव्यं धनं सद्भिरीर्यते ॥ ११ ॥
यदि अपने वर्णोचित कर्ममें स्थित, शान्त और ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त ब्राह्मणको किसी प्रकारके असत् कर्मका आश्रय लिये बिना ही धन प्राप्त हो जाय तो वह उस धनसे विवाह करके संतानकी उत्पत्ति करे अथवा उस धनको दान और यज्ञमें लगा दे। धनको बाँटकर ही भोगना चाहिये, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है ॥
परिनिष्ठितकार्यस्तु स्वाध्यायेनैव ब्राह्मणः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ १२ ॥
ब्राह्मण केवल वेदोंके स्वाध्यायसे ही कृतकृत्य हो जाता है। वह दूसरा कर्म करे या न करे। सब जीवोंके प्रति मैत्रीभाव रखनेके कारण वह मैत्र कहलाता है ॥
क्षत्रियस्यापि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत ।
दद्याद् राजन् न याचेत यजेत न च याजयेत् ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! क्षत्रियका भी जो धर्म है, वह तुम्हें बता रहा हूँ। राजन्! क्षत्रिय दान तो करे, किंतु किसीसे याचना न करे; स्वयं यज्ञ करे, किंतु पुरोहित बनकर दूसरोंका यज्ञ न
करावे ॥ १३ ॥ नाध्यापयेदधीयीत प्रजाश्च परिपालयेत् । नित्योद्युक्तो दस्युवधे रणे कुर्यात् पराक्रमम् ॥ १४ ॥ वह अध्ययन करे, किंतु अध्यापक न बने, प्रजाजनोंका सब प्रकारसे पालन करता रहे। लुटेरों और डाकुओंका वध करनेके लिये सदा तैयार रहे। रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करे ॥ १४ ॥
ये तु क्रतुभिरीजानाः श्रुतवन्तश्च भूमिपाः । य एवाहवजेतारस्त एषां लोकजित्तमाः ॥ १५ ॥ इन राजाओंमें जो भूपाल बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले तथा वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं और जो युद्धमें विजय प्राप्त करनेवाले हैं, वे ही पुण्यलोकोंपर विजय प्राप्त करनेवालोंमें उत्तम हैं ॥ १५ ॥
अविक्षतेन देहेन समराद् यो निवर्तते । क्षत्रियो नास्य तत् कर्म प्रशंसन्ति पुराविदः ॥ १६ ॥ जो क्षत्रिय शरीरपर घाव हुए बिना ही समर-भूमिसे लौट आता है, उसके इस कर्मकी पुरातन धर्मको जाननेवाले विद्वान् प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १६ ॥
एवं हि क्षत्रबन्धूनां मार्गमाहुः प्रधानतः । नास्य कृत्यतमं किंचिदन्यद् दस्युनिबर्हणात् ॥ १७ ॥ दानमध्ययनं यज्ञो राज्ञां क्षेमो विधीयते । तस्माद् राज्ञा विशेषेण योद्धव्यं धर्ममीप्सता ॥ १८ ॥ इस प्रकार युद्धको ही क्षत्रियोंके लिये प्रधान मार्ग बताया गया है, उसके लिये लुटेरोंके संहारसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठतम कर्म नहीं है। यद्यपि दान, अध्ययन और यज्ञ—इनके अनुष्ठानसे भी राजाओंका कल्याण होता है, तथापि युद्ध उनके लिये सबसे बढ़कर है; अतः विशेषरूपसे धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको सदा ही युद्धके लिये उद्यत रहना चाहिये ॥ १७-१८ ॥
स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः । धर्मेण सर्वकृत्यानि शमनिष्ठानि कारयेत् ॥ १९ ॥ राजा समस्त प्रजाओंको अपने-अपने धर्मोंमें स्थापित करके उनके द्वारा शान्तिपूर्ण समस्त कर्मोंका धर्मके अनुसार अनुष्ठान करावे ॥ १९ ॥
परिनिष्ठितकार्यस्तु नृपतिः परिपालनात् । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यादैन्द्रो राजन्य उच्यते ॥ २० ॥ राजा दूसरा कर्म करे या न करे, प्रजाकी रक्षा करने-मात्रसे वह कृतकृत्य हो जाता है। उसमें इन्द्र देवता-सम्बन्धी बलकी प्रधानता होनेसे राजा ‘ऐन्द्र’ कहलाता है ॥
वैश्यस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि शाश्वतम् ।
दानमध्ययनं यज्ञः शौचेन धनसंचयः ॥ २१ ॥ अब वैश्यका जो सनातन धर्म है, वह तुम्हें बता रहा हूँ। दान, अध्ययन, यज्ञ और पवित्रतापूर्वक धनका संग्रह ये वैश्यके कर्म हैं ॥ २१ ॥ पितृवत् पालयेद् वैश्यो युक्तः सर्वान् पशूनिह । विकर्म तद् भवेदन्यत् कर्म यत् स समाचरेत् ॥ २२ ॥ वैश्य सदा उद्योगशील रहकर पुत्रोंकी रक्षा करनेवाले पिताके समान सब प्रकारके पशुओंका पालन करे। इन कर्मोंके सिवा वह और जो कुछ भी करेगा, वह उसके लिये विपरीत कर्म होगा ॥ २२ ॥ रक्षया स हि तेषां वै महत् सुखमवाप्नुयात् । प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददौ पशून् ॥ २३ ॥ पशुओंके पालनसे वैश्यको महान् सुखकी प्राप्ति हो सकती है। प्रजापतिने पशुओंकी सृष्टि करके उनके पालनका भार वैश्यको सौंप दिया था ॥ २३ ॥ ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः । तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥ २४ ॥ ब्राह्मण और राजाको उन्होंने सारी प्रजाके पोषणका भार सौंपा था। अब मैं वैश्यकी उस वृत्तिका वर्णन करूँगा, जिससे उसका जीवन-निर्वाह हो ॥ २४ ॥ षण्णामेकां पिबेद् धेनुं शताच्च मिथुनं हरेत् । लब्धाच्च सप्तमं भागं तथा शृङ्गे कलां खुरे ॥ २५ ॥ वैश्य यदि राजा या किसी दूसरेकी छः दुधारू गौओंका एक वर्षतक पालन करे तो उनमेंसे एक गौका दूध वह स्वयं पीये (यही उसके लिये वेतन है)। यदि दूसरेकी एक सौ गौओंका वह पालन करे तो सालभरमें एक गाय और एक बैल मालिकसे वेतनके रूपमें ले ले। यदि उन पशुओंके दूध आदि बेचनेसे धन प्राप्त हो तो उसमें सातवाँ भाग वह अपने वेतनके रूपमें ग्रहण करे। सींग बेचनेसे जो धन मिले, उसमेंसे भी वह सातवाँ भाग ही ले; परंतु पशुविशेषका बहुमूल्य खुर बेचनेसे जो धन प्राप्त हो, उसका सोलहवाँ भाग ही उसे ग्रहण करना चाहिये ॥ २५ ॥ सस्यानां सर्वबीजानामेषा सांवत्सरी भृतिः । न च वैश्यस्य कामः स्यान्न रक्षेयं पशूनिति ॥ २६ ॥ दूसरेके अनाजकी फसलों तथा सब प्रकारके बीजोंकी रक्षा करनेपर वैश्यको उपजका सातवाँ भाग वेतनके रूपमें ग्रहण करना चाहिये। यह उसके लिये वार्षिक वेतन है। वैश्यके मनमें कभी यह संकल्प नहीं उठना चाहिये कि 'मैं पशुओंका पालन नहीं करूँगा' ॥ २६ ॥ वैश्ये चेच्छति नान्येन रक्षितव्याः कथंचन । शूद्रस्यापि हि यो धर्मस्तं ते वक्ष्यामि भारत ॥ २७ ॥
जबतक वैश्य पशुपालनका कार्य करना चाहे, तबतक मालिकको दूसरे किसीके द्वारा किसी तरह भी वह कार्य नहीं कराना चाहिये, भारत! अब मैं शूद्रका भी धर्म तुम्हें बता रहा हूँ॥ २७ ॥
प्रजापतिर्हि वर्णानां दासं शूद्रमकल्पयत् ।
तस्माच्छूद्रस्य वर्णानां परिचर्या विधीयते ॥ २८ ॥
प्रजापतिने अन्य तीनों वर्णोंके सेवकके रूपमें शूद्रकी सृष्टि की है; अतः शूद्रके लिये तीनों वर्णोंकी सेवा ही शास्त्र-विहित कर्म है ॥ २८ ॥
तेषां शुश्रूषणाच्चैव महत् सुखमवाप्नुयात् ।
शूद्र एतान् परिचरेत् त्रीन् वर्णाननुपूर्वशः ॥ २९ ॥
वह उन तीनों वर्णोंकी सेवासे ही महान् सुखका भागी हो सकता है। अतः शूद्र इन तीनों वर्णोंकी क्रमशः सेवा करे ॥ २९ ॥
संचयांश्च न कुर्वीत जातु शूद्रः कथंचन ।
पापीयान् हि धनं लब्ध्वा वशे कुर्याद् गरीयसः ॥ ३० ॥
शूद्रको कभी किसी प्रकार भी धनका संग्रह नहीं करना चाहिये; क्योंकि धन पाकर वह महान् पापमें प्रवृत्त हो जाता है और अपनेसे श्रेष्ठतम पुरुषोंको भी अपने अधीन रखने लगता है ॥ ३० ॥
राज्ञा वा समनुज्ञातः कामं कुर्वीत धार्मिकः ।
तस्य वृत्तिं प्रवक्ष्यामि यच्च तस्योपजीवनम् ॥ ३१ ॥
धर्मात्मा शूद्र राजाकी आज्ञा लेकर अपनी इच्छाके अनुसार कोई धार्मिक कृत्य कर सकता है। अब मैं उसकी वृत्तिका वर्णन करूँगा, जिससे उसकी आजीविका चल सकती है ॥ ३१ ॥
अवश्यं भरणीयो हि वर्णानां शूद्र उच्यते ।
छत्रं वेष्टनमौशीरमुपानद् व्यजनानि च ॥ ३२ ॥
यातयामानि देयानि शूद्राय परिचारिणे ।
तीनों वर्णोंको शूद्रका भरण-पोषण अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वह भरण-पोषण करने योग्य कहा गया है। अपनी सेवामें रहनेवाले शूद्रको उपभोगमें लाये हुए छाते, पगड़ी, अनुलेपन, जूते और पंखे देने चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥
अधार्याणि विशीर्णानि वसनानि द्विजातिभिः ॥ ३३ ॥
शूद्रायैव प्रदेयानि तस्य धर्मधनं हि तत् ।
फटे-पुराने कपड़े, जो अपने धारण करने योग्य न रहें, वे द्विजातियोंद्वारा शूद्रको ही दे देने योग्य हैं; क्योंकि धर्मतः वे सब वस्तुएँ शूद्रकी ही सम्पत्ति हैं ॥ ३३ १/२ ॥
यं च कञ्चिद् द्विजातीनां शूद्रः शुश्रूषुराव्रजेत् ॥ ३४ ॥
कल्प्यां तेन तु ते प्राहुर्वृत्तिं धर्मविदो जनाः ।
द्विजातियोंमेंसे जिस किसीकी सेवा करनेके लिये कोई शूद्र आवे, उसीको उसकी जीविकाकी व्यवस्था करनी चाहिये; ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन है ॥ ३४½ ॥
देयः पिण्डोऽनपत्याय भर्त्तव्यो वृद्धदुर्बलौ ॥ ३५ ॥
शूद्रेण तु न हातव्यो भर्ता कस्याञ्चिदापदि ।
अतिरेकेण भर्त्तव्यो भर्ता द्रव्यपरिक्षये ॥ ३६ ॥
यदि स्वामी संतानहीन हो तो सेवा करनेवाले शूद्रको ही उसके लिये पिण्डदान करना चाहिये। यदि स्वामी बूढ़ा या दुर्बल हो तो उसका सब प्रकारसे भरण-पोषण करना चाहिये। किसी आपत्तिमें भी शूद्रको अपने स्वामीका परित्याग नहीं करना चाहिये। यदि स्वामीके धनका नाश हो जाय तो शूद्रको अपने कुटुम्बके पालनसे बचे हुए धनके द्वारा उसका भरण-पोषण करना चाहिये ॥ ३५-३६ ॥
न हि स्वमस्ति शूद्रस्य भर्तृहार्यधनो हि सः ।
उक्तस्त्रयाणां वर्णानां यज्ञस्तस्य च भारत ।
स्वाहाकारवषट्कारौ मन्त्रः शूद्रे न विद्यते ॥ ३७ ॥
शूद्रका अपना कोई धन नहीं होता। उसके सारे धनपर उसके स्वामीका ही अधिकार होता है। भरतनन्दन! यज्ञका अनुष्ठान तीनों वर्णों तथा शूद्रके लिये भी आवश्यक बताया गया है। शूद्रके यज्ञमें स्वाहाकार, वषट्कार तथा वैदिक मन्त्रोंका प्रयोग नहीं होता है ॥ ३७ ॥
तस्माच्छूद्रः पाकयज्ञैर्यजेताव्रतवान् स्वयम् ।
पूर्णपात्रमयीमाहुः पाकयज्ञस्य दक्षिणाम् ॥ ३८ ॥
अतः शूद्र स्वयं वैदिक व्रतोंकी दीक्षा न लेकर पाकयज्ञों (बलिवैश्वदेव आदि) द्वारा यजन करे। पाकयज्ञकी दक्षिणा पूर्णपात्रमयी* बतायी गयी है ॥ ३८ ॥
शूद्रः पैजवनो नाम सहस्राणां शतं ददौ ।
ऐन्द्राग्नेन विधानेन दक्षिणामिति नः श्रुतम् ॥ ३९ ॥
हमने सुना है कि पैजवन नामक शूद्रने ऐन्द्राग्न यज्ञकी विधिसे मन्त्रहीन यज्ञका अनुष्ठान करके उसकी दक्षिणाके रूपमें एक लाख पूर्णपात्र दान किये थे ॥ ३९ ॥
यतो हि सर्ववर्णानां यज्ञस्तस्यैव भारत ।
अग्रे सर्वेषु यज्ञेषु श्रद्धायज्ञो विधीयते ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंका जो यज्ञ है वह सब सेवाकार्य करनेके कारण शूद्रका भी है ही (उसे भी उसका फल मिलता ही है; अतः उसे पृथक् यज्ञ करनेकी आवश्यकता नहीं है)। सम्पूर्ण यज्ञोंमें पहले श्रद्धारूप यज्ञका ही विधान है ॥ ४० ॥
दैवतं हि महच्छ्रद्धा पवित्रं यजतां च यत् ।
दैवतं हि परं विप्राः स्वेन स्वेन परस्परम् ॥ ४१ ॥