महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च । यक्षराक्षसनागैश्चापीप्सितं यस्य यस्य यत् ॥ १२४ ॥ उन्होंने इस पृथ्वीसे सत्रह प्रकारके धान्योंका दोहन किया था, यक्षों, राक्षसों और नागोंमेंसे जिसको जो वस्तु अभीष्ट थी, वह उन्होंने पृथ्वीसे दुह ली थी ॥ १२४ ॥
तेन धर्मोत्तरश्चायं कृतो लोको महात्मना । रंजिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥ १२५ ॥ उन महात्माने सम्पूर्ण जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित कर दी थी। उन्होंने समस्त प्रजाओंका रंजन किया था; इसलिये वे ‘राजा’ कहलाते थे ॥ १२५ ॥
ब्राह्मणानां क्षतत्राणात् ततः क्षत्रिय उच्यते । प्रथिता धर्मतश्चेयं पृथिवी बहुभिः स्मृता ॥ १२६ ॥ ब्राह्मणोंको क्षतिसे बचानेके कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। उन्होंने धर्मके द्वारा इस भूमिको प्रथित किया—इसकी ख्याति बढ़ायी; इसलिये बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा यह ‘पृथ्वी’ कहलायी ॥ १२६ ॥
स्थापनं चाकरोद् विष्णुः स्वयमेव सनातनः । नातिवर्तिष्यते कश्चिद् राजंस्त्वामिति भारत ॥ १२७ ॥ भरतनन्दन! स्वयं सनातन भगवान् विष्णुने उनके लिये यह मर्यादा स्थापित की कि ‘राजन्! कोई भी तुम्हारी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकेगा’ ॥ १२७ ॥
तपसा भगवान् विष्णुराविवेश च भूमिपम् । देववन्नरदेवानां नमते यं जगन्नृपम् ॥ १२८ ॥ राजा पृथुकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् विष्णुने स्वयं उनके भीतर प्रवेश किया था। समस्त नरेशोंमेंसे राजा पृथुको ही यह सारा जगत् देवताके समान मस्तक झुकाता था ॥ १२८ ॥
दण्डनीत्या च सततं रक्षितव्यं नरेश्वर । नाधर्षयेत् तथा कश्चिच्चारनिष्पन्ददर्शनात् ॥ १२९ ॥ नरेश्वर! इसलिये तुम्हें गुप्तचर नियुक्त करके राज्यकी अवस्थापर दृष्टिपात करते हुए सदा दण्डनीतिके द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे कोई इसपर आक्रमण करनेका साहस न कर सके ॥ १२९ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते । आत्मना कारणैश्चैव समस्येह महीक्षितः ॥ १३० ॥ को हेतुर्यद् वशे तिष्ठेल्लोको दैवादृते गुणात् । राजेन्द्र! चित्त और क्रियाद्वारा समभाव रखनेवाले राजाका किया हुआ शुभ कर्म प्रजाके भलेके लिये ही होता है। उसके दैवी गुणके सिवा और क्या कारण हो सकता है, जिससे सारा देश उस एक ही व्यक्तिके अधीन रहे? ॥ १३० १/२ ॥