भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

महाराज! सभी मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है; उस समय वेनकुमार पृथुने धनुषकी कोटिद्वारा चारों ओरसे शिलासमूहोंको उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थानपर संचित कर दिया; इसीलिये पर्वतोंकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी ॥ ११५ १/२ ॥ स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह ॥ ११६ ॥ ऋषिभिश्च प्रजापालैर्ब्राह्मणैश्चाभिषेचितः । भगवान् विष्णु, देवताओंसहित इन्द्र, ऋषिसमूह, प्रजापतिगण तथा ब्राह्मणोंने पृथुका राजाके पदपर अभिषेक किया ॥ ११६ १/२ ॥ तं साक्षात् पृथिवी भेजे रत्नान्यादाय पाण्डव ॥ ११७ ॥ सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः । शक्रश्च धनमक्षय्यं प्रादात् तस्मै युधिष्ठिर ॥ ११८ ॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! उस समय साक्षात् पृथिवी देवी रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुई थी। सरिताओंके स्वामी समुद्र, पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमवान् तथा देवराज इन्द्रने अक्षय धन समर्पित किया ॥ ११७-११८ ॥ रुक्मं चापि महामेरुः स्वयं कनकपर्वतः । यक्षराक्षसभर्ता च भगवान् नरवाहनः ॥ ११९ ॥ धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् । सुवर्णमय पर्वत महामेरुने स्वयं आकर उन्हें सुवर्णकी राशि भेंट की। मनुष्योंपर सवारी करनेवाले यक्षराक्षसराज भगवान् कुबेरने भी उन्हें इतना धन दिया, जो उनके धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह करनेके लिये पर्याप्त हो ॥ ११९ १/२ ॥ हया रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा ॥ १२० ॥ प्रादुर्बभूवुर्वैन्यस्य चिन्तनादेव पाण्डव । पाण्डुनन्दन! वेनपुत्र पृथुके चिन्तन करते ही उनकी सेवामें घोड़े, रथ, हाथी और करोड़ों मनुष्य प्रकट हो गये ॥ १२० १/२ ॥ न जरा न च दुर्भिक्षं नाधयो व्याधयस्तथा ॥ १२१ ॥ सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्योन्यात् कदाचन । भयमुत्पद्यते तत्र तस्य राज्ञोऽभिरक्षणात् ॥ १२२ ॥ उनके राज्यमें किसीको बुढ़ापा, दुर्भिक्ष तथा आधि-व्याधिका कष्ट नहीं था। राजाकी ओरसे रक्षाकी समुचित व्यवस्था होनेके कारण वहाँ कभी किसीको सर्पों, चोरों तथा आपसके लोगोंसे भय नहीं प्राप्त होता था ॥ आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः । पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १२३ ॥ जिस समय वे समुद्रमें होकर चलते थे, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें रास्ता दे देते थे, उनके रथकी ध्वजा कभी टूटी नहीं ॥ १२३ ॥