महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'परंतप प्रभो! साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि 'ब्राह्मण मेरे लिये अदण्डनीय होंगे तथा मैं सम्पूर्ण जगत्के वर्णसंकरता और धर्मसंकरतासे बचाऊँगा' ।। १०८ ।। वैन्यस्ततस्तानुवाच देवानृषिपुरोगमान् । ब्राह्मणा मे महाभागा नमस्याः पुरुषर्षभाः ।। १०९ ।। तब वेनकुमारने उन देवताओं तथा उन अग्रवर्ती ऋषियोंसे कहा—'नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिये सदा वन्दनीय होंगे' ।। १०९ ।। एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो ब्रह्मवादिभिः । पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्नो ब्रह्ममयो निधिः ।। ११० ।। उनके ऐसा कहनेपर उन वेदवादी महर्षियोंने उनसे इस प्रकार कहा, 'एवमस्तु'। फिर शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए, जो वैदिक ज्ञानके भण्डार हैं ।। ११० ।। मन्त्रिणो वालखिल्याश्च सारस्वत्यो गणस्तथा । महर्षिर्भगवान् गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ।। १११ ।। वालखिल्यगण तथा सरस्वतीतटवर्ती महर्षियोंके समुदायने उनके मन्त्रीका कार्य सँभाला। महर्षि भगवान् गर्ग उनके दरबारके ज्योतिषी हुए ।। १११ ।। आत्मनाष्टम इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु । उत्पन्नौ बन्दिनौ चास्य तत्पूर्वो सूतमागधौ ।। ११२ ।। मनुष्योंमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि स्वयं राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें थे*। उनके जन्मसे पहले ही सूत और मागध नामक दो बन्दी (स्तुतिपाठक) उत्पन्न हुए थे ।। ११२ ।। तयोः प्रीतो ददौ राजा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । अनूपदेशं सूताय मगधं मागधाय च ।। ११३ ।। वेनके पुत्र प्रतापी राजा पृथुने उन दोनोंको प्रसन्न होकर पुरस्कार दिया। सूतको अनूप देश सागरतटवर्ती प्राप्त) और मागधको मगध देश प्रदान किया ।। ११३ ।। समतां वसुधायाश्च स सम्यगुदपादयत् । वैषम्यं हि परं भूमेरासीदिति च नः श्रुतम् ।। ११४ ।। सुना जाता है कि पृथुके समय यह पृथ्वी बहुत ऊँची-नीची थी। उन्होंने ही इसे भलीभाँति समतल बनाया था ।। ११४ ।। मन्वन्तरेषु सर्वेषु विषमा जायते मही । उज्जहार ततो वैन्यः शिलाजालान् समन्ततः ।। ११५ ।। धनुष्कोट्या महाराज तेन शैला विवर्धिताः ।