भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 430

लोके चेदं सर्वलोकस्य न स्या- च्चातुर्वर्ण्यं वेदवादाश्च न स्युः । सर्वाश्चेज्याः सर्वलोकक्रियाश्च सद्यः सर्वे चाश्रमस्था न वै स्युः ॥ १० ॥ यदि भगवान् विष्णु यथायोग्य विधान न करें तो लोकमें जो सब लोगोंको यह सुख आदि उपलब्ध है, वह न रह जाय। चारों वर्ण तथा वेदोंके सिद्धान्त टिक न सकें। सम्पूर्ण यज्ञ तथा समस्त लोककी क्रियाएँ बंद हो जायँ तथा आश्रमोंमें रहनेवाले सब लोग तत्काल विनष्ट हो जायँ ॥ १० ॥

यश्च त्रयाणां वर्णानामिच्छेदाश्रमसेवनम् । चातुराश्रम्यदृष्टांश्च धर्मांस्तान् शृणु पाण्डव ॥ ११ ॥ पाण्डुनन्दन! जो राजा अपने राज्यमें तीनों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) के द्वारा शास्त्रोक्त रूपसे आश्रम-धर्मका सेवन कराना चाहता हो, उसके लिये जानने योग्य जो चारों आश्रमोंके लिये उपयोगी धर्म हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ ११ ॥

शुश्रूषाकृतकार्यस्य कृतसंतानकर्मणः । अभ्यनुज्ञातराज्यस्य शूद्रस्य जगतीपते ॥ १२ ॥ अल्पान्तरगतस्यापि दशधर्मगतस्य वा । आश्रमा विहिताः सर्वे वर्जयित्वा निराशिषम् ॥ १३ ॥ पृथ्वीनाथ! जो शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवा करके कृतार्थ हो गया है, जिसने पुत्र उत्पन्न कर लिया है, शौच और सदाचारकी दृष्टिसे जिसमें अन्य त्रैवर्णिकोंकी अपेक्षा बहुत कम अन्तर रह गया है अथवा जो मनुप्रोक्त दस धर्मोंके पालनमें तत्पर रहा है*, वह शूद्र यदि राजाकी अनुमति प्राप्त कर ले तो उसके लिये संन्यासको छोड़कर शेष सभी आश्रम विहित हैं ॥ १२-१३ ॥

भैक्ष्यचर्यां ततः प्राहुस्तस्य तद्धर्मचारिणः । तथा वैश्यस्य राजेन्द्र राजपुत्रस्य चैव हि ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! पूर्वोक्त धर्मोंका आचरण करनेवाले शूद्रके लिये तथा वैश्य और क्षत्रियके लिये भी भिक्षा माँगकर निर्वाह करनेका विधान है ॥ १४ ॥

कृतकृत्यो वयोऽतीतो राज्ञः कृतपरिश्रमः । वैश्यो गच्छेद्वनुज्ञातो नृपेणाश्रमसंश्रयम् ॥ १५ ॥ अपने वर्णधर्मका परिश्रमपूर्वक पालन करके कृतकृत्य हुआ वैश्य अधिक अवस्था व्यतीत हो जानेपर राजाकी आज्ञा लेकर क्षत्रियोचित वानप्रस्थ आश्रमोंका ग्रहण करे ॥ १५ ॥

वेदानधीत्य धर्मेण राजशास्त्राणि चानघ । संतानादीनि कर्माणि कृत्वा सोमं निषेव्य च ॥ १६ ॥