महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपालयित्वा प्रजाः सर्वा धर्मेण वदतां वर । राजसूयाश्वमेधादीन् मखानन्यांस्तथैव च ॥ १७ ॥ आनयित्वा यथापाठं विप्रेभ्यो दत्तदक्षिणः । संग्रामे विजयं प्राप्य तथाल्पं यदि वा बहु ॥ १८ ॥ स्थापयित्वा प्रजापालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव । अन्यगोत्रं प्रशस्तं वा क्षत्रियं क्षत्रियर्षभ ॥ १९ ॥ अर्चयित्वा पितॄन् सम्यक् पितृयज्ञैर्यथाविधि । देवान् यज्ञैर्ऋषीन् वेदैर्चयित्वा तु यत्नतः ॥ २० ॥ अन्तकाले च सम्प्राप्ते य इच्छेदाश्रमान्तरम् । सोऽनुपूर्व्याश्रमान् राजन् गत्वा सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ २१ ॥ निष्पाप नरेश! राजाको चाहिये कि पहले धर्माचरण-पूर्वक वेदों तथा राजशास्त्रोंका अध्ययन करे। फिर संतानोत्पादन आदि कर्म करके यज्ञमें सोमरसका सेवन करे। समस्त प्रजाओंका धर्मके अनुसार पालन करके राजसूय, अश्वमेध तथा दूसरे-दूसरे यज्ञोंका अनुष्ठान करे। शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार सब सामग्री एकत्र करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। संग्राममें अल्प या महान् विजय पाकर राज्यपर प्रजाकी रक्षाके लिये अपने पुत्रको स्थापित कर दे। पुत्र न हो तो दूसरे गोत्रके किसी श्रेष्ठ क्षत्रियको राज्यसिंहासनपर अभिषिक्त कर दे। वक्ताओंमें श्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि पाण्डुनन्दन! पितृयज्ञों-द्वारा विधिपूर्वक पितरोंका, देवयज्ञोंद्वारा देवताओंका तथा वेदोंके स्वाध्यायद्वारा ऋषियोंका यत्नपूर्वक भली-भाँति पूजन करके अन्तकाल आनेपर जो क्षत्रिय दूसरे आश्रमोंको ग्रहण करनेकी इच्छा करता है, वह क्रमशः आश्रमोंको अपनाकर परम सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ १६—२१ ॥
राजर्षित्वेन राजेन्द्र भैक्ष्यचर्यां न सेवया । अपेतगृहधर्मोऽपि चरेज्जीवितकाम्यया ॥ २२ ॥ गृहस्थ-धर्मोंका त्याग कर देनेपर भी क्षत्रियको ऋषिभावसे वेदान्तश्रवण आदि संन्यास-धर्मका पालन करते हुए जीवनरक्षाके लिये ही भिक्षाका आश्रय लेना चाहिये, सेवा करानेके लिये नहीं ॥ २२ ॥
न चैतन्नैष्ठिकं कर्म त्रयाणां भूरिदक्षिण । चतुर्णां राजशार्दूल प्राहुराश्रमवासिनाम् ॥ २३ ॥ पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले राजसिंह! यह भैक्ष्यचर्या क्षत्रिय आदि तीन वर्णोंके लिये नित्य या अनिवार्य कर्म नहीं है। चारों आश्रमवासियोंका कर्म उनके लिये ऐच्छिक ही बताया गया है ॥ २३ ॥
बाह्वायत्तं क्षत्रियैर्मानवानां लोकश्रेष्ठं धर्ममासेवमानैः । सर्वे धर्माः सोपधर्मास्त्रयाणां