महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 432, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंराज्ञो धर्मादिति वेदाच्छृणोमि ॥ २४ ॥
राजन्! राजधर्म बाहुबलके अधीन होता है। वह क्षत्रियके लिये जगत्का श्रेष्ठतम धर्म है, उसका सेवन करनेवाले क्षत्रिय मानवमात्रकी रक्षा करते हैं। अतः तीनों वर्णोंके उपधर्मोंसहित जो अन्यान्य समस्त धर्म हैं। वे राजधर्मसे ही सुरक्षित रह सकते हैं, यह मैंने वेद-शास्त्रसे सुना है ॥ २४ ॥
यथा राजन् हस्तिपदे पदानि
संलीयन्ते सर्वसत्त्वोद्भवानि ।
एवं धर्मान् राजधर्मेषु सर्वान्
सर्वावस्थान् सम्प्रलीनान् निबोध ॥ २५ ॥
नरेश्वर! जैसे हाथीके पदचिह्नमें सभी प्राणियोंके पदचिह्न विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार सब धर्मोंको सभी अवस्थाओंमें राजधर्मके भीतर ही समाविष्ट हुआ समझो ॥ २५ ॥
अल्पाश्रयानल्पफलान् वदन्ति
धर्मानन्यान् धर्मविदो मनुष्याः ।
महाश्रयं बहुकल्याणरूपं
क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुरायाः ॥ २६ ॥
धर्मके ज्ञाता आर्य पुरुषोंका कथन है कि अन्य समस्त धर्मोंका आश्रय तो अल्प है ही, फल भी अल्प ही है। परंतु क्षात्रधर्मका आश्रय भी महान् है और उसके फल भी बहुसंख्यक एवं परमकल्याणरूप हैं, अतः इसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है ॥ २६ ॥
सर्वे धर्मा राजधर्मप्रधानाः
सर्वे वर्णाः पाल्यमाना भवन्ति ।
सर्वस्त्यागो राजधर्मेषु राजं-
स्त्यागं धर्मं चाहुग्र्यं पुराणम् ॥ २७ ॥
सभी धर्मोंमें राजधर्म ही प्रधान है; क्योंकि उसके द्वारा सभी वर्णोंका पालन होता है। राजन्! राजधर्मोंमें सभी प्रकारके त्यागका समावेश है और ऋषिगण त्यागको सर्वश्रेष्ठ एवं प्राचीन धर्म बताते हैं ॥ २७ ॥
मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायां
सर्वे धर्माः प्रक्षयेयुर्विबुद्धाः ।
सर्वे धर्माश्चाश्रमाणां हताः स्युः
क्षात्रे त्यक्ते राजधर्मे पुराणे ॥ २८ ॥
यदि दण्डनीति नष्ट हो जाय तो तीनों वेद रसातलको चले जायँ और वेदोंके नष्ट होनेसे समाजमें प्रचलित हुए सारे धर्मोंका नाश हो जाय। पुरातन राजधर्म जिसे क्षात्रधर्म भी कहते हैं, यदि लुप्त हो जाय तो आश्रमोंके सम्पूर्ण धर्मोंका ही लोप हो जायगा ॥ २८ ॥
सर्वे त्यागा राजधर्मेषु दृष्टाः