भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 437

नासौ देवो विश्वरूपो मयापि शक्यो द्रष्टुं ब्रह्मणा वापि साक्षात् । येऽन्ये कामास्तव राजन् हृदिस्था दास्ये चैतांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा ॥ १७ ॥ उन विश्वरूप भगवान्‌को मैं और साक्षात् ब्रह्माजी भी नहीं देख सकते। राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो दूसरी कामनाएँ हों, उन्हें मैं पूर्ण कर दूँगा; क्योंकि तुम मनुष्योंके राजा हो ॥ १७ ॥

सत्ये स्थितो धर्मपरो जितेन्द्रियः शूरो दृढप्रीतिरतः सुराणाम् । बुद्ध्या भक्त्या चोत्तमश्रद्धया च ततस्तेऽहं दद्मि वरान् यथेष्टम् ॥ १८ ॥ नरेश्वर! तुम सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण, जितेन्द्रिय और शूरवीर हो, देवताओंके प्रति अविचल प्रेमभाव रखते हो, तुम्हारी बुद्धि, भक्ति और उत्तम श्रद्धासे संतुष्ट होकर मैं तुम्हें इच्छानुसार वर दे रहा हूँ ॥ १८ ॥