महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 438, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमान्धातोवाच
असंशयं भगवन्नादिदेवं द्रक्ष्यामि त्वाऽहं शिरसा सम्प्रसाद्य । त्यक्त्वा कामान् धर्मकामोह्यरण्य- मिच्छे गन्तुं सत्पथं लोकदृष्टम् ॥ १९ ॥ **मान्धाताने कहा—**भगवन्! मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर आपको प्रसन्न करके आपकी ही दयासे आदिदेव भगवान् विष्णुका दर्शन प्राप्त कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है। इस समय मैं समस्त कामनाओंका परित्याग करके केवल धर्मसम्पादनकी इच्छा रखकर वनमें जाना चाहता हूँ; क्योंकि लोकमें सभी सत्पुरुष अन्तमें इसी सन्मार्गका दिग्दर्शन करा गये हैं ॥ १९ ॥
क्षात्राद् धर्माद् विपुलादप्रमेया- ल्लोकाः प्राप्ताः स्थापितं स्वं यशश्च । धर्मो योऽसावादिदेवात् प्रवृत्तो लोकश्रेष्ठं तं न जानामि कर्तुम् ॥ २० ॥ विशाल एवं अप्रमेय क्षात्रधर्मके प्रभावसे मैंने उत्तम लोक प्राप्त किये और सर्वत्र अपने यशका प्रचार एवं प्रसार कर दिया; परंतु आदिदेव भगवान् विष्णुसे जिस धर्मकी प्रवृत्ति हुई है, उस लोकश्रेष्ठ धर्मका आचरण करना मैं नहीं जानता ॥ २० ॥
इन्द्र उवाच
असैनिका धर्मपराश्च धर्मे परां गतिं न नयन्ते ह्ययुक्तम् । क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्तः पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ २१ ॥ **इन्द्र बोले—**राजन्! आदिदेव भगवान् विष्णुसे तो पहले राजधर्म ही प्रवृत्त हुआ है। अन्य सभी धर्म उसीके अंग हैं और उसके बाद प्रकट हुए हैं। जो सैनिक शक्तिसे सम्पन्न राजा नहीं हैं, वे धर्मपरायण होनेपर भी दूसरोंको अनायास ही धर्मविषयक परम गतिकी प्राप्ति नहीं करा सकते ॥ २१ ॥
शेषाः सृष्टा ह्यन्तवन्तो ह्यनन्ताः सप्रस्थानाः क्षात्रधर्मा विशिष्टाः । अस्मिन् धर्मे सर्वधर्माः प्रविष्टा- स्तस्माद् धर्मं श्रेष्ठमिमं वदन्ति ॥ २२ ॥ क्षात्रधर्म ही सबसे श्रेष्ठ है। शेष धर्म असंख्य हैं और उनका फल भी विनाशशील है। इस क्षात्रधर्ममें सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है, इसलिये इसी धर्मको श्रेष्ठ कहते