महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 456, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअराजकाणि राष्ट्राणि हतवीर्याणि वा पुनः ॥ ६ ॥ प्रत्युद्गम्याभिपूज्यः स्यादेतदत्र सुमन्त्रितम् । न हि पापात् परतरमस्ति किञ्चिदराजकात् ॥ ७ ॥ यदि कोई प्रबल राजा राज्यके लोभसे उन बिना राजाके दुर्बल देशोंपर आक्रमण करे तो वहाँके निवासियोंको चाहिये कि वे आगे बढ़कर उसका स्वागत-सत्कार करें। यही वहाँके लिये सबसे अच्छी सलाह हो सकती है; क्योंकि पापपूर्ण अराजकतासे बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है ॥ ६-७ ॥
स चेत् समनुपश्येत समग्रं कुशलं भवेत् । बलवान् हि प्रकुपितः कुर्यान्निःशेषतामपि ॥ ८ ॥ वह बलवान् आक्रमणकारी नरेश यदि शान्त दृष्टिसे देखे तो राज्यकी पूर्णतः भलाई होती है और यदि वह कुपित हो गया तो उस राज्यका सर्वनाश कर सकता है ॥ ८ ॥
भूयांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ या सुदुहा राजन् नैव तां वितुदन्त्यपि ॥ ९ ॥ राजन्! जो गाय कठिनाईसे दुही जाती है, उसे बड़े-बड़े क्लेश उठाने पड़ते हैं, परंतु जो सुगमतापूर्वक दूध दुह लेने देती है, उसे लोग पीड़ा नहीं देते, आरामसे रखते हैं ॥ ९ ॥
यदतप्तं प्रणमते नैतत् संतापमर्हति । यत् स्वयं नमते दारु न तत् संनामयन्त्यपि ॥ १० ॥ जो राष्ट्र बिना कष्ट पाये ही नतमस्तक हो जाता है, वह अधिक संतापका भागी नहीं होता। जो लकड़ी स्वयं ही झुक जाती है, उसे लोग झुकानेका प्रयत्न नहीं करते हैं ॥ १० ॥
एतयोपमया वीर संनमेत बलीयसे । इन्द्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥ ११ ॥ वीर! इस उपमाको ध्यानमें रखते हुए दुर्बलको बलवान्के सामने नतमस्तक हो जाना चाहिये। जो बलवान्को प्रणाम करता है, वह मानो इन्द्रको ही नमस्कार करता है ॥ ११ ॥
तस्माद् राजैव कर्तव्यः सततं भूतिमिच्छता । न धनार्थो न दारार्थस्तेषां येषामराजकम् ॥ १२ ॥ अतः सदा उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले देशको अपनी रक्षाके लिये किसीको राजा अवश्य बना लेना चाहिये। जिनके देशमें अराजकता है, उनके धन और स्त्रियोंपर उन्हींका अधिकार बना रहे, यह सम्भव नहीं है ॥ १२ ॥
प्रीयते हि हरन् पापः परवित्तमराजके । यदास्य उद्धरन्त्यन्ये तदा राजानमिच्छति ॥ १३ ॥ अराजकताकी स्थितिमें दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाला पापाचारी मनुष्य बड़ा प्रसन्न होता है, परंतु जब दूसरे लुटेरे उसका भी सारा धन हड़प लेते हैं, तब वह राजाकी आवश्यकताका अनुभव करता है ॥ १३ ॥