भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

पापा ह्यपि तदा क्षेमं न लभन्ते कदाचन । एकस्य हि द्वौ हरतो द्वयोश्च बहवोऽपरे ॥ १४ ॥ अराजक देशमें पापी मनुष्य भी कभी कुशलपूर्वक नहीं रह सकते। एकका धन दो मिलकर उठा ले जाते हैं और उन दोनोंका धन दूसरे बहुसंख्यक लुटेरे लूट लेते हैं ॥

अदासः क्रियते दासो ह्रियन्ते च बलात् स्त्रियः । एतस्मात् कारणाद् देवाः प्रजापालान् प्रचक्रिरे ॥ १५ ॥ अराजकताकी स्थितिमें जो दास नहीं है, उसे दास बना लिया जाता है और स्त्रियोंका बलपूर्वक अपहरण किया जाता है। इसी कारणसे देवताओंने प्रजापालक नरेशोंकी सृष्टि की है ॥ १५ ॥

राजा चेन्न भवेल्लोके पृथिव्यां दण्डधारकः । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ १६ ॥ यदि इस जगत्में भूतलपर दण्डधारी राजा न हो तो जैसे जलमें बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियोंको खा जाती हैं, उसी प्रकार प्रबल मनुष्य दुर्बलोंको लूट खायँ ॥ १६ ॥

अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् । परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशान् ॥ १७ ॥ हमने सुन रखा है कि जैसे पानीमें बलवान् मत्स्य दुर्बल मत्स्योंको अपना आहार बना लेते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें राजाके न रहनेपर प्रजावर्गके लोग परस्पर एक-दूसरेको लूटते हुए नष्ट हो गये थे ॥ १७ ॥

समेत्य तास्ततश्चक्रुः समयानिति नः श्रुतम् । वाक्शूरो दण्डपरुषो यश्च स्यात् पारजायिकः ॥ १८ ॥ यः परस्वमथादद्यात् त्याज्या नस्तादृशा इति । विश्वासार्थं च सर्वेषां वर्णानामविशेषतः । तास्तथा समयं कृत्वा समयेनावतस्थिरे ॥ १९ ॥ तब उन सबने मिलकर आपसमें नियम बनाया—यह बात हमारे सुननेमें आयी है। वह नियम इस प्रकार है—'हम लोगोंमेंसे जो भी निष्ठुर बोलनेवाला, भयानक दण्ड देनेवाला, परस्त्रीगामी तथा पराये धनका अपहरण करनेवाला हो, ऐसे सब लोगोंको हमें समाजसे बहिष्कृत कर देना चाहिये।' सभी वर्णके लोगोंमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये सामान्यतः ऐसा नियम बनाकर उसका पालन करते हुए वे सब लोग सुखसे रहने लगे ॥

सहितास्तास्तदा जग्मुरसुखार्ताः पितामहम् । अनीश्वरा विनश्यामो भगवन्नीश्वरं दिश ॥ २० ॥ यं पूजयेम सम्भूय यश्च नः प्रतिपालयेत् ।