महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पापा ह्यपि तदा क्षेमं न लभन्ते कदाचन । एकस्य हि द्वौ हरतो द्वयोश्च बहवोऽपरे ॥ १४ ॥ अराजक देशमें पापी मनुष्य भी कभी कुशलपूर्वक नहीं रह सकते। एकका धन दो मिलकर उठा ले जाते हैं और उन दोनोंका धन दूसरे बहुसंख्यक लुटेरे लूट लेते हैं ॥
अदासः क्रियते दासो ह्रियन्ते च बलात् स्त्रियः । एतस्मात् कारणाद् देवाः प्रजापालान् प्रचक्रिरे ॥ १५ ॥ अराजकताकी स्थितिमें जो दास नहीं है, उसे दास बना लिया जाता है और स्त्रियोंका बलपूर्वक अपहरण किया जाता है। इसी कारणसे देवताओंने प्रजापालक नरेशोंकी सृष्टि की है ॥ १५ ॥
राजा चेन्न भवेल्लोके पृथिव्यां दण्डधारकः । जले मत्स्यानिवाभक्ष्यन् दुर्बलं बलवत्तराः ॥ १६ ॥ यदि इस जगत्में भूतलपर दण्डधारी राजा न हो तो जैसे जलमें बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियोंको खा जाती हैं, उसी प्रकार प्रबल मनुष्य दुर्बलोंको लूट खायँ ॥ १६ ॥
अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनेशुरिति नः श्रुतम् । परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशान् ॥ १७ ॥ हमने सुन रखा है कि जैसे पानीमें बलवान् मत्स्य दुर्बल मत्स्योंको अपना आहार बना लेते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें राजाके न रहनेपर प्रजावर्गके लोग परस्पर एक-दूसरेको लूटते हुए नष्ट हो गये थे ॥ १७ ॥
समेत्य तास्ततश्चक्रुः समयानिति नः श्रुतम् । वाक्शूरो दण्डपरुषो यश्च स्यात् पारजायिकः ॥ १८ ॥ यः परस्वमथादद्यात् त्याज्या नस्तादृशा इति । विश्वासार्थं च सर्वेषां वर्णानामविशेषतः । तास्तथा समयं कृत्वा समयेनावतस्थिरे ॥ १९ ॥ तब उन सबने मिलकर आपसमें नियम बनाया—यह बात हमारे सुननेमें आयी है। वह नियम इस प्रकार है—'हम लोगोंमेंसे जो भी निष्ठुर बोलनेवाला, भयानक दण्ड देनेवाला, परस्त्रीगामी तथा पराये धनका अपहरण करनेवाला हो, ऐसे सब लोगोंको हमें समाजसे बहिष्कृत कर देना चाहिये।' सभी वर्णके लोगोंमें विश्वास उत्पन्न करनेके लिये सामान्यतः ऐसा नियम बनाकर उसका पालन करते हुए वे सब लोग सुखसे रहने लगे ॥
सहितास्तास्तदा जग्मुरसुखार्ताः पितामहम् । अनीश्वरा विनश्यामो भगवन्नीश्वरं दिश ॥ २० ॥ यं पूजयेम सम्भूय यश्च नः प्रतिपालयेत् ।
(कुछ समयतक इस प्रकार काम चलता रहा; किंतु आगे चलकर पुनः दुर्व्यवस्था फैल
गयी) तब दुःखसे पीड़ित हुई सारी प्रजाएँ एक साथ मिलकर ब्रह्माजीके पास गयीं और
उनसे कहने लगीं—'भगवन्! राजाके बिना तो हमलोग नष्ट हो रहे हैं। आप हमें कोई ऐसा
राजा दीजिये, जो शासन करनेमें समर्थ हो, हम सब लोग मिलकर जिसकी पूजा करें और
जो निरन्तर हमारा पालन करता रहे' ॥ २०१/२ ॥
ततो मनुं व्यादिदेश मनुर्नाभिननन्द ताः ॥ २१ ॥
तब ब्रह्माजीने मनुको राजा होनेकी आज्ञा दी; परंतु मनुने उन प्रजाओंको स्वीकार नहीं
किया ॥ २१ ॥
मनुरुवाच
बिभेमि कर्मणः पापाद् राज्यं हि भृशदुस्तरम् ।
विशेषतो मनुष्येषु मिथ्यावृत्तेषु नित्यदा ॥ २२ ॥
मनु बोले—भगवन्! मैं पापकर्मसे बहुत डरता हूँ। राज्य करना बड़ा कठिन काम है—
विशेषतः सदा मिथ्याचारमें प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्योंपर शासन करना तो और भी दुष्कर
है ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
तमब्रुवन् प्रजा मा भैः कर्तृनेनो गमिष्यति ।
पशूनामधिपञ्चाशद्धिरण्यस्य तथैव च ॥ २३ ॥
धान्यस्य दशमं भागं दास्यामः कोशवर्धनम् ।
कन्यां शुल्के चारुरूपां विवाहेषूद्यतासु च ॥ २४ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! तब समस्त प्रजाओंने मनुसे कहा—'महाराज! आप डरें
मत। पाप तो उन्हींको लगेगा, जो उसे करेंगे। हमलोग आपके कोशकी वृद्धिके लिये प्रति
पचास पशुओंपर एक पशु आपको दिया करेंगे। इसी प्रकार सुवर्णका भी पचासवाँ भाग
देते रहेंगे। अनाजकी उपजका दसवाँ भाग करके रूपमें देंगे। जब हमारी बहुत-सी कन्याएँ
विवाहके लिये उद्यत होंगी, उस समय उनमें जो सबसे सुन्दरी कन्या होगी, उसे हम शुल्कके
रूपमें आपको भेंट कर देंगे ॥
मुखेन शस्त्रपत्रेण ये मनुष्याः प्रधानतः ।
भवन्तं तेऽनुयास्यन्ति महेन्द्रमिव देवताः ॥ २५ ॥
'जैसे देवता देवराज इन्द्रका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार प्रधान-प्रधान मनुष्य अपने
प्रमुख शस्त्रों और वाहनोंके साथ आपके पीछे-पीछे चलेंगे ॥ २५ ॥
स त्वं जातबलो राजा दुष्प्रधर्षः प्रतापवान् ।
सुखे धास्यसि नः सर्वान् कुबेर इव नैर्ऋतान् ॥ २६ ॥
‘प्रजाका सहयोग पाकर आप एक प्रबल, दुर्जय और प्रतापी राजा होंगे। जैसे कुबेर यक्षों तथा राक्षसोंकी रक्षा करके उन्हें सुखी बनाते हैं, उसी प्रकार आप हमें सुरक्षित एवं सुखसे रखेंगे ॥ २६ ॥ यं च धर्मं चरिष्यन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः । चतुर्थं तस्य धर्मस्य त्वत्संस्थं वै भविष्यति ॥ २७ ॥ ‘आप जैसे राजाके द्वारा सुरक्षित हुई प्रजाएँ जो-जो धर्म करेंगी, उसका चतुर्थ भाग आपको मिलता रहेगा ॥ तेन धर्मेण महता सुखं लब्धेन भावितः । पाह्यस्मान् सर्वतो राजन् देवानिव शतक्रतुः ॥ २८ ॥ ‘राजन्! सुखपूर्वक प्राप्त हुए उस महान् धर्मसे सम्पन्न हो आप उसी प्रकार सब ओरसे हमारी रक्षा कीजिये, जैसे इन्द्र देवताओंकी रक्षा करते हैं ॥ २८ ॥ विजयाय हि निर्याहि प्रतपन् रश्मिवानिव । मानं विधम शत्रूणां जयोऽस्तु तव सर्वदा ॥ २९ ॥ ‘महाराज! आप तपते हुए अंशुमाली सूर्यके समान विजयके लिये यात्रा कीजिये, शत्रुओंका घमंड धूलमें मिला दीजिये और सर्वदा आपकी जय हो’ ॥ २९ ॥ स निर्ययौ महातेजा बलेन महता वृतः । महाभिजनसम्पन्नस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ ३० ॥ तब महान् सैन्यबलसे घिरे हुए महाकुलीन, महातेजस्वी राजा मनु अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए-से निकले ॥ ३० ॥ तस्य दृष्ट्वा महत्त्वं ते महेन्द्रस्येव देवताः । अपतत्रसिरे सर्वे स्वधर्मे च ददुर्मनः ॥ ३१ ॥ जैसे देवता देवराज इन्द्रका प्रभाव देखकर प्रभावित हो जाते हैं, उसी प्रकार सब लोग महाराज मनुका महत्त्व देखकर आतंकित हो उठे और अपने-अपने धर्ममें मन लगाने लगे ॥ ३१ ॥ ततो महीं परिययौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् । शमयन् सर्वतः पापान् स्वकर्मसु च योजयन् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वर्षा करनेवाले मेघके समान मनु पापा-चारियोंको शान्त करते और उन्हें अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंमें लगाते हुए भूमण्डलपर चारों ओर घूमने लगे ॥ एवं ये भूतिमिच्छेयुः पृथिव्यां मानवाः क्वचित् । कुर्यू राजानमेवाग्रे प्रजानुग्रहकारणात् ॥ ३३ ॥ इस प्रकार जो मनुष्य वैभव-वृद्धिकी कामना रखते हों, उन्हें सबसे पहले इस भूमण्डलमें प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कोई राजा अवश्य बना लेना चाहिये ॥ ३३ ॥
नमस्येरंश्च तं भक्त्या शिष्या इव गुरुं सदा । देवा इव च देवेन्द्रं तत्र राजानमन्तिके ॥ ३४ ॥ फिर जैसे शिष्य भक्तिभावसे गुरुको नमस्कार करते हैं तथा जैसे देवता देवराज इन्द्रको प्रणाम करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजाजनोंको अपने राजाके निकट नमस्कार करना चाहिये ॥ ३४ ॥
सत्कृतं स्वजनेनेह परोऽपि बहु मन्यते । स्वजनेन त्ववज्ञातं परे परिभवन्त्युत ॥ ३५ ॥ इस लोकमें आत्मीयजन जिसका आदर करते हैं, उसे दूसरे लोग भी बहुत मानते हैं और जो स्वजनोंद्वारा तिरस्कृत होता है, उसका दूसरे भी अनादर करते हैं ॥ ३५ ॥
राज्ञः परैः परिभवः सर्वेषामसुखावहः । तस्माच्छत्रं च पत्रं च वासांस्याभरणानि च ॥ ३६ ॥ भोजनान्यथ पानानि राज्ञे दद्युर्गृहाणि च । आसनानि च शय्याश्च सर्वोपकरणानि च ॥ ३७ ॥ राजाका यदि दूसरोंके द्वारा पराभव हुआ तो वह समस्त प्रजाके लिये दुःखदायी होता है; इसलिये प्रजाको चाहिये कि वह राजाके लिये छत्र, वाहन, वस्त्र, आभूषण, भोजन, पान, गृह, आसन और शय्या आदि सभी प्रकारकी सामग्री भेंट करे ॥ ३६-३७ ॥
गोप्ता तस्माद् दुराधर्षः स्मितपूर्वाभिभाषिता । आभाषितश्च मधुरं प्रत्याभाषेत मानवान् ॥ ३८ ॥ इस प्रकार प्रजाकी सहायता पाकर राजा दुर्धर्ष एवं प्रजाकी रक्षा करनेमें समर्थ हो जाता है। राजाको चाहिये कि वह मुसकराकर बातचीत करे। यदि प्रजावर्गके लोग उससे कोई बात पूछें तो वह मधुर वाणीमें उन्हें उत्तर दे ॥ ३८ ॥
कृतज्ञो दृढभक्तिः स्यात् संविभागी जितेन्द्रियः । ईक्षितः प्रतिवीक्षेत मृदु वल्गु च सुष्ठु च ॥ ३९ ॥ राजा उपकार करनेवालोंके प्रति कृतज्ञ और अपने भक्तोंपर सुदृढ़ स्नेह रखनेवाला हो। उपभोगमें आनेवाली वस्तुओंको यथायोग्य विभाजन करके उन्हें काममें ले। इन्द्रियोंको वशमें रखे। जो उसकी ओर देखे, उसे वह भी देखे एवं स्वभावसे ही मृदु, मधुर और सरल हो ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रे राजकरणावश्यकत्वकथने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रके लिये राजाको नियुक्त करनेकी आवश्यकताका कथनविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी
हानि और होनेसे लाभका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
किमाहुर्देवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ ।
मनुष्याणामधिपतिं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ पितामह! जो मनुष्योंका अधिपति है, उस राजाको
ब्राह्मणलोग देवस्वरूप क्यों बताते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
बृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा—भारत! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासका
उदाहरण दिया करते हैं, जिसके अनुसार राजा वसुमनाने बृहस्पतिजीसे यही बात पूछी
थी ॥ २ ॥
राजा वसुमना नाम कौसल्यो धीमतां वरः ।
महर्षिं किल पप्रच्छ कृतप्रज्ञं बृहस्पतिम् ॥ ३ ॥
कहते हैं, प्राचीन कालमें बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कोसल-नरेश राजा वसुमनाने शुद्ध बुद्धिवाले
महर्षि बृहस्पतिसे कुछ प्रश्न किया ॥ ३ ॥
सर्वं वैनयिकं कृत्वा विनयज्ञो बृहस्पतिम् ।
दक्षिणानन्तरो भूत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥ ४ ॥
विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वलोकहिते रतः ।
प्रजानां सुखमन्विच्छन् धर्मशीलं बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥
राजा वसुमना सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। वे विनय प्रकट करनेकी
कलाको जानते थे। बृहस्पतिजीके आनेपर उन्होंने उठकर उनका अभिवादन किया और
चरणप्रक्षालन आदि सारा विनयसम्बन्धी बर्ताव पूर्ण करके महर्षिकी परिक्रमा करनेके
अनन्तर उन्होंने विधिपूर्वक उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर प्रजाके सुखकी इच्छा
रखते हुए राजाने धर्मशील बृहस्पतिसे राज्यसंचालनकी विधिके विषयमें इस प्रकार प्रश्न
उपस्थित किया ॥ ४-५ ॥
वसुमना उवाच
केन भूतानि वर्धन्ते क्षयं गच्छन्ति केन वा ।
कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमव्ययमाप्नुयुः ॥ ६ ॥ **वसुमना बोले—**महामते! राज्यमें रहनेवाले प्राणियोंकी वृद्धि कैसे होती है? उनका ह्रास कैसे हो सकता है? किस देवताकी पूजा करनेवाले लोगोंको अक्षय सुखकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ ६ ॥ एवं पृष्टो महाप्राज्ञः कौसल्येनामितौजसा । राजसत्कारमव्यग्रं शशांसास्मै बृहस्पतिः ॥ ७ ॥ अमित तेजस्वी कोसलनरेशके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महाज्ञानी बृहस्पतिजीने शान्तभावसे राजाके सत्कारकी आवश्यकता बताते हुए इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥
बृहस्पतिरुवाच राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मो लोकस्य लक्ष्यते । प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥ **बृहस्पतिजीने कहा—**महाप्राज्ञ! लोकमें जो धर्म देखा जाता है, उसका मूल कारण राजा ही है। राजाके भयसे ही प्रजा एक-दूसरेको हड़प नहीं लेती है ॥ ८ ॥ राजा ह्येवाखिलं लोकं समुदीर्णं समुत्सुकम् । प्रसादयति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ॥ ९ ॥ राजा ही मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले तथा अनुचित भोगोंमें आसक्त हो उनकी प्राप्तिके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले सारे जगत्के लोगोंको धर्मानुकूल शासनद्वारा प्रसन्न रखता है और स्वयं भी प्रसन्नतापूर्वक रहकर अपने तेजसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥ यथा ह्यनुदये राजन् भूतानि शशिसूर्ययोः । अन्धे तमसि मज्जेयुरपश्यन्तः परस्परम् ॥ १० ॥ यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः । विहरेयुर्यथाकामं विहिंसन्तः पुनः पुनः ॥ ११ ॥ विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् । अभावमचिरेणैव गच्छेयुर्नात्र संशयः ॥ १२ ॥ एवमेव विना राज्ञा विनश्येयुरिमाः प्रजाः । अन्धे तमसि मज्जेयुरगोपाः पशवो यथा ॥ १३ ॥ राजन्! जैसे सूर्य और चन्द्रमाका उदय न होनेपर समस्त प्राणी घोर अन्धकारमें डूब जाते हैं और एक-दूसरेको देख नहीं पाते हैं, जैसे थोड़े जलवाले तालाबमें मत्स्यगण तथा रक्षकरहित उपवनमें पक्षियोंके झुंड परस्पर एक-दूसरेपर बारंबार चोट करते हुए इच्छानुसार विचरण करते हैं, वे कभी तो अपने प्रहारसे दूसरोंको कुचलते और मथते हुए आगे बढ़ जाते हैं और कभी स्वयं दूसरेकी चोट खाकर व्याकुल हो उठते हैं। इस प्रकार
आपसमें लड़ते हुए वे थोड़े ही दिनोंमें नष्टप्राय हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। इसी तरह राजाके बिना वे सारी प्रजाएँ आपसमें लड़-झगड़कर बात-की-बातमें नष्ट हो जायँगी और बिना चरवाहेके पशुओंकी भाँति दुःखके घोर अन्धकारमें डूब जायँगी ॥ १०—१३ ॥
हरेयुर्बलवन्तोऽपि दुर्बलानां परिग्रहान् ।
हन्युर्यायच्छमानांश्च यदि राजा न पालयेत् ॥ १४ ॥
यदि राजा प्रजाकी रक्षा न करे तो बलवान् मनुष्य दुर्बलोंकी बहू-बेटियोंको हर ले जायँ और अपने घरबारकी रक्षाके लिये प्रयत्न करनेवालोंको मार डालें ॥ १४ ॥
ममेदमिति लोकेऽस्मिन् न भवेत् सम्परिग्रहः ।
न दारा न च पुत्रः स्यान्न धनं न परिग्रहः ।
विष्वग्लोपः प्रवर्तेत यदि राजा न पालयेत् ॥ १५ ॥
यदि राजा रक्षा न करे तो इस जगत्में स्त्री, पुत्र, धन अथवा घरबार कोई भी ऐसा संग्रह सम्भव नहीं हो सकता, जिसके लिये कोई कह सके कि यह मेरा है, सब ओर सबकी सारी सम्पत्तिका लोप हो जाय ॥ १५ ॥
यानं वस्त्रमलङ्कारान् रत्नानि विविधानि च ।
हरेयुः सहसा पापा यदि राजा न पालयेत् ॥ १६ ॥
यदि राजा प्रजाका पालन न करे तो पापाचारी लुटेरे सहसा आक्रमण करके वाहन, वस्त्र, आभूषण और नाना प्रकारके रत्न लूट ले जायँ ॥ १६ ॥
पतेद् बहुविधं शस्त्रं बहुधा धर्मचारिषु ।
अधर्मः प्रगृहीतः स्याद् यदि राजा न पालयेत् ॥ १७ ॥
यदि राजा रक्षा न करे तो धर्मात्मा पुरुषोंपर बारंबार नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी मार पड़े और विवश होकर लोगोंको अधर्मका मार्ग ग्रहण करना पड़े ॥ १७ ॥
मातरं पितरं वृद्धमाचार्यमतिथिं गुरुम् ।
क्लिश्नीयुरपि हिंस्युर्वा यदि राजा न पालयेत् ॥ १८ ॥
यदि राजा पालन न करे तो दुराचारी मनुष्य माता, पिता, वृद्ध, आचार्य, अतिथि और गुरुको क्लेश पहुँचावें अथवा मार डालें ॥ १८ ॥
वधबन्धपरिक्लेशो नित्यमर्थवतां भवेत् ।
ममत्वं च न विन्देयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥ १९ ॥
यदि राजा रक्षा न करे तो धनवानोंको प्रतिदिन वध या बन्धनका क्लेश उठाना पड़े और किसी भी वस्तुको वे अपनी न कह सकें ॥ १९ ॥
अन्ताश्चाकाल एव स्युर्लोकोऽयं दस्युसाद् भवेत् ।
पतेयुर्नरकं घोरं यदि राजा न पालयेत् ॥ २० ॥
यदि राजा प्रजाका पालन न करे तो अकालमें ही लोगोंकी मृत्यु होने लगे, यह समस्त जगत् डाकुओंके अधीन हो जाय और (पापके कारण) घोर नरकमें गिर जाय ॥ २० ॥
न योनिदोषो वर्तेत न कृषिर्न वणिक्पथः ।
मज्जेद् धर्मस्त्रयी न स्याद् यदि राजा न पालयेत् ॥ २१ ॥
यदि राजा पालन न करे तो व्यभिचारसे किसीको घृणा न हो, खेती नष्ट हो जाय, व्यापार चौपट हो जाय, धर्म डूब जाय और तीनों वेदोंका कहीं पता न चले ॥ २१ ॥
न यज्ञाः सम्प्रवर्तेयुर्विधिवत् स्वाप्तदक्षिणाः ।
न विवाहाः समाजो वा यदि राजा न पालयेत् ॥ २२ ॥
यदि राजा जगत्की रक्षा न करे तो विधिवत् पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान बंद हो जाय, विवाह न हो और सामाजिक कार्य रुक जायँ ॥ २२ ॥
न वृषाः सम्प्रवर्तेरन् न मथ्येरंश्च गर्गराः ।
घोषाः प्रणाशं गच्छेयुर्यदि राजा न पालयेत् ॥ २३ ॥
यदि राजा पशुओंका पालन न करे तो साँड़ गायोंमें गर्भाधान न करें, दूध-दहीसे भरे हुए घड़े या मटके कभी मथे न जायँ और गोशाले नष्ट हो जायँ ॥ २३ ॥
त्रस्तमुद्विग्नहृदयं हाहाभूतमचेतनम् ।
क्षणेन विनशेत् सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥ २४ ॥
यदि राजा रक्षा न करे तो सारा जगत् भयभीत, उद्विग्नचित्त, हाहाकारपरायण तथा अचेत हो क्षणभरमें नष्ट हो जाय ॥ २४ ॥
न संवत्सरसत्राणि तिष्ठेयुरकुतोभयाः ।
विधिवद् दक्षिणावन्ति यदि राजा न पालयेत् ॥ २५ ॥
यदि राजा पालन न करे तो उनमें विधिपूर्वक दक्षिणाओंसे युक्त वार्षिक यज्ञ बेखटके न चल सकें ॥ २५ ॥
ब्राह्मणाश्चतुरो वेदान् नाधीयीरंस्तपस्विनः ।
विद्यास्नाता व्रतस्नाता यदि राजा न पालयेत् ॥ २६ ॥
यदि राजा पालन न करे तो विद्या पढ़कर स्नातक हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले और तपस्वी तथा ब्राह्मण लोग चारों वेदोंका अध्ययन छोड़ दें ॥ २६ ॥
न लभेद् धर्मसंश्लेषं हतविप्रहतो जनः ।
हर्ता स्वस्थेन्द्रियो गच्छेद् यदि राजा न पालयेत् ॥ २७ ॥
यदि राजा पालन न करे तो मनुष्य हताहत होकर धर्मका सम्पर्क छोड़ दें और चोर घरका मालमत्ता लेकर अपने शरीर और इन्द्रियोंपर आँच आये बिना ही सकुशल लौट जायँ ॥ २७ ॥
हस्ताद्धस्तं परिमुषेद् भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
भयार्तं विद्रवेत् सर्वं यदि राजा न पालयेत् ॥ २८ ॥
यदि राजा पालन न करे तो चोर और लुटेरे हाथमें रखी हुई वस्तुको भी हाथसे छीन ले जायँ, सारी मर्यादाएँ टूट जायँ और सब लोग भयसे पीड़ित हो चारों ओर भागते
फिरें ॥ २८ ॥ अनयाः सम्प्रवर्तेरन् भवेद् वै वर्णसंकरः । दुर्भिक्षमाविशेद् राष्ट्रं यदि राजा न पालयेत् ॥ २९ ॥ यदि राजा पालन न करे तो सब ओर अन्याय एवं अत्याचार फैल जाय, वर्णसंकर संतानें पैदा होने लगें और समूचे देशमें अकाल पड़ जाय ॥ २९ ॥ विवृत्य हि यथाकामं गृहद्वाराणि शेरते । मनुष्या रक्षिता राज्ञा समन्तादकुतोभयाः ॥ ३० ॥ राजासे रक्षित हुए मनुष्य सब ओरसे निर्भय हो जाते हैं और अपनी इच्छाके अनुसार घरके दरवाजे खोलकर सोते हैं ॥ ३० ॥ नाक्रोशं सहते कश्चित् कुतो वा हस्तलाघवम् । यदि राजा न सम्यग् गां रक्षत्यपि धार्मिकः ॥ ३१ ॥ यदि धर्मात्मा राजा भलीभाँति पृथिवीकी रक्षा न करे तो कोई भी मनुष्य गाली-गलौज अथवा हाथसे पीटे जानेका अपमान कैसे सहन करे ॥ ३१ ॥ स्त्रियश्चापुरुषा मार्गं सर्वालङ्कारभूषिताः । निर्भयाः प्रतिपद्यन्ते यदि रक्षति भूमिपः ॥ ३२ ॥ यदि पृथिवीका पालन करनेवाला राजा अपने राज्यकी रक्षा करता है तो समस्त आभूषणोंसे विभूषित हुई सुन्दरी स्त्रियाँ किसी पुरुषको साथ लिये बिना भी निर्भय होकर मार्गसे आती-जाती हैं ॥ ३२ ॥ धर्ममेव प्रपद्यन्ते न हिंसन्ति परस्परम् । अनुगृह्णन्ति चान्योन्यं यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३३ ॥ जब राजा रक्षा करता है, तब सब लोग धर्मका ही पालन करते हैं, कोई किसीकी हिंसा नहीं करते और सभी एक-दूसरेपर अनुग्रह रखते हैं ॥ ३३ ॥ यजन्ते च महायज्ञैस्त्रयो वर्णाः पृथग्विधैः । युक्ताश्चाधीयते विद्यां यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३४ ॥ जब राजा रक्षा करता है, तब तीनों वर्णोंके लोग नाना प्रकारके बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं और मनोयोगपूर्वक विद्याध्ययनमें लगे रहते हैं ॥ ३४ ॥ वार्तामूलो ह्ययं लोकस्त्रय्या वै धार्यते सदा । तत् सर्वं वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमिपः ॥ ३५ ॥ खेती आदि समुचित जीविकाकी व्यवस्था ही इस जगत्के जीवनका मूल है तथा वृष्टि आदिकी हेतुभूत त्रयी विद्यासे ही सदा जगत्का धारण-पोषण होता है। जब राजा प्रजाकी रक्षा करता है, तभी वह सब कुछ ठीक ढंगसे चलता रहता है ॥ ३५ ॥ यदा राजा धुरं श्रेष्ठामादाय वहति प्रजाः । महता बलयोगेन तदा लोकः प्रसीदति ॥ ३६ ॥
जब राजा विशाल सैनिक-शक्तिके सहयोगसे भारी भार उठाकर प्रजाकी रक्षाका भार वहन करता है, तब यह सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न होता है ॥ ३६ ॥ यस्याभावेन भूतानामभावः स्यात् समन्ततः। भावे च भावो नित्यं स्यात् कस्तं न प्रतिपूजयेत् ॥ ३७ ॥ जिसके न रहनेपर सब ओरसे समस्त प्राणियोंका अभाव होने लगता है और जिसके रहनेपर सदा सबका अस्तित्व बना रहता है, उस राजाका पूजन (आदर-सत्कार) कौन नहीं करेगा? ॥ ३७ ॥ तस्य यो वहते भारं सर्वलोकभयावहम् । तिष्ठन् प्रियहिते राज्ञ उभौ लोकाविमौ जयेत् ॥ ३८ ॥ जो उस राजाके प्रिय एवं हितसाधनमें संलग्न रहकर उसके सर्वलोकभयंकर शासन-भारको वहन करता है, वह इस लोक और परलोक दोनोंपर विजय पाता है ॥ ३८ ॥ यस्तस्य पुरुषः पापं मनसाप्यनुचिन्तयेत् । असंशयमिह क्लिष्टः प्रेत्यापि नरकं व्रजेत् ॥ ३९ ॥ जो पुरुष मनसे भी राजाके अनिष्टका चिन्तन करता है, वह निश्चय ही इह लोकमें कष्ट भोगता है और मरनेके बाद भी नरकमें पड़ता है ॥ ३९ ॥ न हि जात्ववमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ४० ॥ 'यह भी एक मनुष्य है' ऐसा समझकर कभी भी पृथ्वीपालक नरेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि राजा मनुष्यरूपमें एक महान् देवता है ॥ ४० ॥ कुरुते पञ्चरूपाणि कालयुक्तानि यः सदा। भवत्यग्निस्तथाऽऽदित्यो मृत्युर्वैश्रवणो यमः ॥ ४१ ॥ राजा ही सदा समयानुसार पाँच रूप धारण करता है। वह कभी अग्नि, कभी सूर्य, कभी मृत्यु, कभी कुबेर और कभी यमराज बन जाता है ॥ ४१ ॥ यदा ह्यासीदतः पापान् दहत्युग्रेण तेजसा । मिथ्योपचरितो राजा तदा भवति पावकः ॥ ४२ ॥ जब पापात्मा मनुष्य राजाके साथ मिथ्या बर्ताव करके उसे ठगते हैं, तब वह अग्निस্বরূপ हो जाता है और अपने उग्र तेजसे समीप आये हुए उन पापियोंको जलाकर भस्म कर देता है ॥ ४२ ॥ यदा पश्यति चारेण सर्वभूतानि भूमिपः । क्षेमं च कृत्वा व्रजति तदा भवति भास्करः ॥ ४३ ॥ जब राजा गुप्तचरोंद्वारा समस्त प्रजाओंकी देख-भाल करता है और उन सबकी रक्षा करता हुआ चलता है, तब वह सूर्यरूप होता है ॥ ४३ ॥ अशुचींश्च यदा क्रुद्धः क्षिणोति शतशो नरान् ।
सपुत्रपौत्रान् सामात्यांस्तदा भवति सोऽन्तकः ॥ ४४ ॥
जब राजा कुपित होकर अशुद्धाचारी सैकड़ों मनुष्योंका उनके पुत्र, पौत्र और मन्त्रियोंसहित संहार कर डालता है, तब वह मृत्युरूप होता है ॥ ४४ ॥
यदा त्वधार्मिकान् सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्नियच्छति ।
धार्मिकांश्चानुगृह्णाति भवत्यथ यमस्तदा ॥ ४५ ॥
जब वह कठोर दण्डके द्वारा समस्त अधार्मिक पुरुषोंको काबूमें करके सन्मार्गपर लाता है और धर्मात्माओंपर अनुग्रह करता है, उस समय वह यमराज माना जाता है ॥ ४५ ॥
यदा तु धनधाराभिस्तर्पयत्युपकारिणः ।
आच्छिनत्ति च रत्नानि विविधान्यपकारिणाम् ॥ ४६ ॥
श्रियं ददाति कस्मैचित् कस्माच्चिदपकर्षति ।
तदा वैश्रवणो राजा लोके भवति भूमिपः ॥ ४७ ॥
जब राजा उपकारी पुरुषोंको धनरूपी जलकी धाराओंसे तृप्त करता है और अपकार करनेवाले दुष्टोंके नाना प्रकारके रत्नोंको छीन लेता है, किसी राज्यहितैषीको धन देता है तो किसी (राज्यद्रोही) के धनका अपहरण कर लेता है, उस समय वह पृथिवीपालक नरेश इस संसारमें कुबेर समझा जाता है ॥ ४६-४७ ॥
नास्यापवादे स्थातव्यं दक्षेणाक्लिष्टकर्मणा ।
धर्म्यमाकांक्षता लोकमिश्वरस्यानसूयता ॥ ४८ ॥
जो समस्त कार्योंमें निपुण, अनायास ही कार्य-साधन करनेमें समर्थ, धर्ममय लोकोंमें जानेकी इच्छा रखनेवाला तथा दोषदृष्टिसे रहित हो, उस पुरुषको अपने देशके शासक नरेशकी निन्दाके काममें नहीं पड़ना चाहिये ॥
न हि राज्ञः प्रतीपानि कुर्वन् सुखमवाप्नुयात् ।
पुत्रो भ्राता वयस्यो वा यद्यप्यात्मसमो भवेत् ॥ ४९ ॥
राजाके विपरीत आचरण करनेवाला मनुष्य उसका पुत्र, भाई, मित्र अथवा आत्माके तुल्य ही क्यों न हो, कभी सुख नहीं पा सकता ॥ ४९ ॥
कुर्यात् कृष्णगतिः शेषं ज्वलितोऽनिलसारथिः ।
न तु राजाभिपन्नस्य शेषं क्वचन विद्यते ॥ ५० ॥
वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हुई आग जब किसी गाँव या जंगलको जलाने लगे तो सम्भव है कि वहाँका कुछ भाग जलाये बिना शेष छोड़ दे; परंतु राजा जिसपर आक्रमण करता है, उसकी कहीं कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती ॥
तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जयेत् ।
मृत्योरिव जुगुप्सेत राजस्वहरणान्नरः ॥ ५१ ॥
मनुष्यको चाहिये कि राजाकी सारी रक्षणीय वस्तुओंको दूरसे ही त्याग दे और मृत्युकी ही भाँति राजधनके अपहरणसे घृणा करके उससे अपनेको बचानेका प्रयत्न करे ॥ ५१ ॥
नश्येदभिमृशन् सद्यो मृगः कूटमिव स्पृशन् ।
आत्मस्वमिव रक्षेत् राजस्वमिह बुद्धिमान् ॥ ५२ ॥
जैसे मृग मारण-मन्त्रका स्पर्श करते ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठता है, उसी प्रकार राजाके धनपर हाथ लगानेवाला मनुष्य तत्काल मारा जाता है; अतः बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपने ही धनके समान इस जगत्में राजाके धनकी भी रक्षा करे ॥ ५२ ॥
महान्तं नरकं घोरमप्रतिष्ठमचेतनम् ।
पतन्ति चिररात्राय राजवित्तापहारिणः ॥ ५३ ॥
राजाके धनका अपहरण करनेवाले मनुष्य दीर्घकालके लिये विशाल, भयंकर, अस्थिर और चेतनाशक्तिको लुप्त कर देनेवाले नरकमें गिरते हैं ॥ ५३ ॥
राजा भोजो विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः ।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति ॥ ५४ ॥
भोज, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति और नृप—इन शब्दोंद्वारा जिस राजाकी स्तुति की जाती है, उस प्रजापालक नरेशकी पूजा कौन नहीं करेगा? ॥ ५४ ॥
तस्माद् बुभूषुर्नियतो जितात्मा नियतेन्द्रियः ।
मेधावी स्मृतिमान् दक्षः संश्रयेत महीपतिम् ॥ ५५ ॥
इसलिये अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाला, मेधावी, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न एवं कार्यदक्ष मनुष्य नियमपूर्वक रहकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए राजाका आश्रय ग्रहण करे ॥ ५५ ॥
कृतज्ञं प्राज्ञमक्षुद्रं दृढभक्तिं जितेन्द्रियम् ।
धर्मनित्यं स्थितं नीत्यं मन्त्रिणं पूजयेन्नृपः ॥ ५६ ॥
राजाको उचित है कि वह कृतज्ञ, विद्वान्, महामना, राजाके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाले, जितेन्द्रिय, नित्य धर्मपरायण और नीतिज्ञ मन्त्रीका आदर करे ॥ ५६ ॥
दृढभक्तिं कृतप्रज्ञं धर्मज्ञं संयतेन्द्रियम् ।
शूरमक्षुद्रकर्माणं निषिद्धजनमाश्रयेत् ॥ ५७ ॥
इसी प्रकार राजा अपने प्रति दृढ़ भक्तिसे सम्पन्न, युद्धकी शिक्षा पाये हुए, बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, जितेन्द्रिय, शूरवीर और श्रेष्ठ कर्म करनेवाले ऐसे वीर पुरुषको सेनापति बनाये, जो अपनी सहायताके लिये दूसरोंका आश्रय लेनेवाला न हो ॥ ५७ ॥
राजा प्रगल्भं कुरुते मनुष्यं
राजा कृशं वै कुरुते मनुष्यम् ।
राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि
राजाभ्युपेतं सुखिनं करोति ॥ ५८ ॥
राजा मनुष्यको धृष्ट एवं सबल बनाता है और राजा ही उसे दुर्बल कर देता है। राजाके रोषका शिकार बने हुए मनुष्यको कैसे सुख मिल सकता है? राजा अपने शरणागतको सुखी बना देता है॥ ५८॥ (राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम्। राजा विहीना न भवन्ति देशा देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति॥) राजा प्रजाओंका प्रथम अथवा प्रधान शरीर है। प्रजा भी राजाका अनुपम शरीर है। राजाके बिना देश और वहाँके निवासी नहीं रह सकते और देशों तथा देशवासियोंके बिना राजा भी नहीं रह सकते हैं॥ राजा प्रजानां हृदयं गरीयो गतिः प्रतिष्ठा सुखमुत्तमं च। समाश्रिता लोकमिमं परं च जयन्ति सम्यक् पुरुषा नरेन्द्र॥ ५९॥ राजा प्रजाका गुरुतर हृदय, गति, प्रतिष्ठा और उत्तम सुख है। नरेन्द्र! राजाका आश्रय लेनेवाले मनुष्य इस लोक और परलोकपर भी पूर्णतः विजय पा लेते हैं॥ ५९॥ नराधिपश्चाप्यनुशिष्य मेदिनीं दमेन सत्येन च सौहृदेन। महद्भिरिष्ट्वा क्रतुभिर्महायशा- स्त्रिविष्टपे स्थानमुपैति शाश्वतम्॥ ६०॥ राजा भी इन्द्रियसंयम, सत्य और सौहार्दके साथ इस पृथ्वीका भलीभाँति शासन करके बड़े-बड़े यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा महान् यशका भागी हो स्वर्गलोकमें सनातन स्थान प्राप्त कर लेता है॥ ६०॥ स एवमुक्तोऽङ्गिरसा कौसल्यो राजसत्तमः। प्रयत्नात् कृतवान् वीरः प्रजानां परिपालनम्॥ ६१॥ राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर राजाओंमें श्रेष्ठ कोसलनरेश वीर वसुमना अपनी प्रजाओंका प्रयत्नपूर्वक पालन करने लगे॥ ६१॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि आङ्गिरसवाक्येऽष्टषष्टितमोऽध्यायः॥ ६८॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें बृहस्पतिजीका उपदेशविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६२ श्लोक हैं।)
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राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
राजाके प्रधान कर्तव्योंका तथा दण्डनीतिके द्वारा युगोंके निर्माणका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पार्थिवेन विशेषेण किं कार्यमवशिष्यते ।
कथं रक्ष्यो जनपदः कथं जेयाश्च शत्रवः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! राजाके द्वारा विशेष रूपसे पालन करने योग्य और कौन-सा कार्य शेष है? उसे गाँवोंकी रक्षा कैसे करनी चाहिये और शत्रुओंको किस प्रकार जीतना चाहिये? ॥ १ ॥
कथं चारं प्रयुञ्जीत वर्णान् विश्वासयेत् कथम् ।
कथं भृत्यान् कथं दारान् कथं पुत्रांश्च भारत ॥ २ ॥
राजा गुप्तचरकी नियुक्ति कैसे करे? सब वर्णोंके मनमें किस प्रकार विश्वास उत्पन्न करे? भारत! वह भृत्यों, स्त्रियों और पुत्रोंको भी कैसे कार्यमें लगावे? तथा उनके मनमें भी किस तरह विश्वास पैदा करे? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
राजवृत्तं महाराज शृणुष्वावहितोऽखिलम् ।
यत् कार्यं पार्थिवेनादौ पार्थिवप्रकृतेन वा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महाराज! क्षत्रिय राजा अथवा राजकार्य करनेवाले अन्य पुरुषको सबसे पहले जो कार्य करना चाहिये, वह सारा राजकीय आचार-व्यवहार सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥
आत्मा जेयः सदा राज्ञा ततो जेयाश्च शत्रवः ।
अजितात्मा नरपतिर्विजयेत कथं रिपून् ॥ ४ ॥
राजाको सबसे पहले सदा अपने मनपर विजय प्राप्त करनी चाहिये, उसके बाद शत्रुओंको जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिये। जिस राजाने अपने मनको नहीं जीता, वह शत्रुपर विजय कैसे पा सकता है? ॥ ४ ॥
एतावानात्मविजयः पञ्चवर्गविनिग्रहः ।
जितेन्द्रियो नरपतिर्बाधितुं शक्नुयादरीन् ॥ ५ ॥
श्रोत्र आदि पाँचों इन्द्रियोंको वशमें रखना यही मनपर विजय पाना है। जितेन्द्रिय नरेश ही अपने शत्रुओंका दमन कर सकता है ॥ ५ ॥
न्यसेत गुल्मान् दुर्गैषु सन्धौ च कुरुनन्दन ।
नगरोपवने चैव पुरोद्यानेषु चैव ह ॥ ६ ॥ कुरुनन्दन! राजाको किलोंमें, राज्यकी सीमापर तथा नगर और गाँवके बगीचोंमें सेना रखनी चाहिये ॥ ६ ॥
संस्थानेषु च सर्वेषु पुरेषु नगरेषु च । मध्ये च नरशार्दूल तथा राजनिवेशने ॥ ७ ॥ नरसिंह! इसी प्रकार सभी पड़ावोंपर, बड़े-बड़े गाँवों और नगरोंमें, अन्तःपुरमें तथा राजमहलके आस-पास भी रक्षक सैनिकोंकी नियुक्ति करनी चाहिये ॥ ७ ॥
प्रणिधींश्च ततः कुर्याज्जडान्धबधिराकृतीन् । पुंसः परीक्षितान् प्राज्ञान् क्षुत्पिपासाश्रमक्षमान् ॥ ८ ॥ तदनन्तर जिन लोगोंकी अच्छी तरह परीक्षा कर ली गयी हो, जो बुद्धिमान् होनेपर भी देखनेमें गूँगे, अंधे और बहरे-से जान पड़ते हों तथा जो भूख-प्यास और परिश्रम सहनेकी शक्ति रखते हों, ऐसे लोगोंको ही गुप्तचर बनाकर आवश्यक कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ॥ ८ ॥
अमात्येषु च सर्वेषु मित्रेषु विविधेषु च । पुत्रेषु च महाराज प्रणिदध्यात् समाहितः ॥ ९ ॥ महाराज! राजा एकाग्रचित्त हो सब मन्त्रियों, नाना प्रकारके मित्रों तथा पुत्रोंपर भी गुप्तचर नियुक्त करे ॥ ९ ॥
पुरे जनपदे चैव तथा सामन्तराजसु । यथा न विद्युरन्योन्यं प्रणिधेयास्तथा हि ते ॥ १० ॥ नगर, जनपद तथा मल्ललोग जहाँ व्यायाम करते हों, उन स्थानोंमें ऐसी युक्तिसे गुप्तचर नियुक्त करने चाहिये, जिससे वे आपसमें भी एक-दूसरेको पहचान न सकें ॥
चारांश्च विद्यात् प्रहितान् परेण भरतर्षभ । आपणेषु विहारेषु समाजेषु च भिक्षुषु ॥ ११ ॥ आरामेषु तथोद्याने पण्डितानां समागमे । देशेषु चत्वरे चैव सभास्वावसथेषु च ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! राजाको अपने गुप्तचरोंद्वारा बाजारों, लोगोंके घूमने-फिरनेके स्थानों, सामाजिक उत्सवों, भिक्षुकोंके समुदायों, बगीचों, उद्यानों, विद्वानोंकी सभाओं, विभिन्न प्रान्तों, चौराहों, सभाओं और धर्मशालाओंमें शत्रुओंके भेजे हुए गुप्तचरोंका पता लगाते रहना चाहिये ॥ ११-१२ ॥
एवं विचिनुयाद् राजा परचारं विचक्षणः । चारे हि विदिते पूर्वं हितं भवति पाण्डव ॥ १३ ॥ पाण्डुनन्दन! इस प्रकार बुद्धिमान् राजा शत्रुके गुप्तचरका टोह लेता रहे। यदि उसने शत्रुके जासूसका पहले ही पता लगा लिया तो इससे उसका बड़ा हित होता है ॥ १३ ॥
यदा तु हीनं नृपतिर्विद्यादात्मानमात्मना । अमात्यैः सह सम्मन्त्र्य कुर्यात् संधिं बलीयसा ॥ १४ ॥ यदि राजाको अपना पक्ष स्वयं ही निर्बल जान पड़े तो मन्त्रियोंसे सलाह लेकर बलवान् शत्रुके साथ संधि कर ले ॥ १४ ॥
(विद्वांसःक्षत्रिया वैश्या ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः । दण्डनीतौ तु निष्पन्ना मन्त्रिणः पृथिवीपते ॥ प्रष्टव्यो ब्राह्मणः पूर्वं नीतिशास्त्रस्य तत्त्ववित् । पश्चात् पृच्छेत भूपालः क्षत्रियं नीतिकोविदम् ॥ वैश्यशूद्रौ तथा भूयः शास्त्रज्ञौ हितकारिणौ ।) पृथ्वीपते! विद्वान् क्षत्रिय, वैश्य तथा अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण यदि दण्डनीतिके ज्ञानमें निपुण हों तो इन्हें मन्त्री बनाना चाहिये। पहले नीतिशास्त्रका तत्त्व जाननेवाले विद्वान् ब्राह्मणसे किसी कार्यके लिये सलाह पूछनी चाहिये। इसके बाद पृथ्वीपालक नरेशको चाहिये कि वह नीतिज्ञ क्षत्रियसे अभीष्ट कार्यके विषयमें पूछे। तदनन्तर अपने हितमें लगे रहनेवाले शास्त्रज्ञ वैश्य और शूद्रोंसे सलाह ले ॥
अज्ञायमाने हीनत्वे संधिं कुर्यात् परेण वै । लिप्सुर्वा कंचिदेवार्थं त्वरमाणो विचक्षणः ॥ १५ ॥ अपनी हीनता या निर्बलताका पता शत्रुको लगनेसे पहले ही शत्रुके साथ संधि कर लेनी चाहिये। यदि इस संधिके द्वारा कोई प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छा हो तो विद्वान् एवं बुद्धिमान् राजाको इस कार्यमें विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
गुणवन्तो महोत्साहा धर्मज्ञाः साधवश्च ये । संदधीत नृपस्तैश्च राष्ट्रं धर्मेण पालयन् ॥ १६ ॥ जो गुणवान्, महान् उत्साही, धर्मज्ञ और साधु पुरुष हों, उन्हें सहयोगी बनाकर धर्मपूर्वक राष्ट्रकी रक्षा करनेवाला नरेश बलवान् राजाओंके साथ संधि स्थापित करे ॥ १६ ॥
उच्छिद्यमानमात्मानं ज्ञात्वा राजा महामतिः । पूर्वापकारिणो हन्याल्लोकद्विष्टांश्च सर्वशः ॥ १७ ॥ यदि यह पता लग जाय कि कोई हमारा उच्छेद कर रहा है, तो परम बुद्धिमान् राजा पहलेके अपकारियोंको तथा जनताके साथ द्वेष रखनेवालोंको भी सर्वथा नष्ट कर दे ॥ १७ ॥
यो नोपकर्तुं शक्नोति नापकर्तुं महीपतिः । न शक्यरूपश्चोद्धर्तुमुपेक्ष्यस्तादृशो भवेत् ॥ १८ ॥ जो राजा न तो उपकार कर सकता हो और न अपकार कर सकता हो तथा जिसका सर्वथा उच्छेद कर डालना भी उचित नहीं प्रतीत होता हो, उस राजाकी उपेक्षा कर देनी
चाहिये ॥ १८ ॥ यात्रायां यदि विज्ञातमनाक्रन्दमनन्तरम् । व्यासक्तं च प्रमत्तं च दुर्बलं च विचक्षणः ॥ १९ ॥ यात्रामाज्ञापयेद् वीरः कल्यः पुष्टबलः सुखी । पूर्वं कृत्वा विधानं च यात्रायां नगरे तथा ॥ २० ॥ यदि शत्रुपर चढ़ाई करनेकी इच्छा हो तो पहले उसके बलाबलके बारेमें अच्छी तरह पता लगा लेना चाहिये। यदि वह मित्रहीन, सहायकों और बन्धुओंसे रहित, दूसरोंके साथ युद्धमें लगा हुआ, प्रमादमें पड़ा हुआ तथा दुर्बल जान पड़े और इधर अपनी सैनिक शक्ति प्रबल हो तो युद्धनिपुण, सुखके साधनोंसे सम्पन्न एवं वीर राजाको उचित है कि अपनी सेनाको यात्राके लिये आज्ञा दे दे। पहले अपनी राजधानीकी रक्षाका प्रबन्ध करके शत्रुपर आक्रमण करना चाहिये ॥ १९-२० ॥ न च वश्यो भवेदस्य नृपो यश्चातिवीर्यवान् । हीनश्च बलवीर्याभ्यां कर्षयंस्तत्परो वसेत् ॥ २१ ॥ बल और पराक्रमसे हीन राजा भी जो अपनेसे अत्यन्त शक्तिशाली नरेश हो उसके अधीन न रहे। उसे चाहिये कि गुप्तरूपसे प्रबल शत्रुको क्षीण करनेका प्रयत्न करता रहे ॥ २१ ॥ राष्ट्रं च पीडयेत् तस्य शस्त्राग्निविषमूर्च्छनैः । अमात्यवल्लभानां च विवादांस्तस्य कारयेत् ॥ २२ ॥ वह शस्त्रोंके प्रहारसे घायल करके, आग लगाकर तथा विषके प्रयोगद्वारा मूर्च्छित करके शत्रुके राष्ट्रमें रहनेवाले लोगोंको पीड़ा दे। मन्त्रियों तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंमें कलह प्रारम्भ करा दे ॥ २२ ॥ वर्जनीयं सदा युद्धं राज्यकामेन धीमता । उपायैस्त्रिभिरादानमर्थस्याह बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ सान्त्वेन तु प्रदानेन भेदेन च नराधिप । यदर्थं शक्नुयात् प्राप्तुं तेन तुष्येत पण्डितः ॥ २४ ॥ जो बुद्धिमान् राजा राज्यका हित चाहे, उसे सदा युद्धको टालनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। नरेश्वर! बृहस्पतिजीने साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे ही राजाके लिये धनकी आय बतायी है। इन उपायोंसे जो धन प्राप्त किया जा सके, उसीसे विद्वान् राजाको संतुष्ट होना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ आददीत बलिं चापि प्रजाभ्यः कुरुनन्दन । स षड्भागमपि प्राज्ञस्तासामेवाभिगुप्तये ॥ २५ ॥ कुरुनन्दन! बुद्धिमान् नरेश प्रजाजनोंसे उन्हींकी रक्षाके लिये उनकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करे ॥ २५ ॥
दशधर्मगतेभ्यो यद् वसु बह्वल्पमेव च ।
तदाददीत सहसा पौराणां रक्षणाय वै ॥ २६ ॥
मत्त, उन्मत्त आदि जो दस* प्रकारके दण्डनीय मनुष्य हैं, उनसे थोड़ा या बहुत जो धन दण्डके रूपमें प्राप्त हो, उसे पुरवासियोंकी रक्षाके लिये ही सहसा ग्रहण कर ले ॥ २६ ॥
यथा पुत्रास्तथा पौत्रा द्रष्टव्यास्ते न संशयः ।
भक्तिश्चैषां न कर्तव्या व्यवहारे प्रदर्शिते ॥ २७ ॥
निःसंदेह राजाको चाहिये कि वह अपनी प्रजाको पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति स्नेहदृष्टिसे देखे; परंतु जब न्याय करनेका अवसर प्राप्त हो, तब उसे स्नेहवश पक्षपात नहीं करना चाहिये ॥ २७ ॥
श्रोतुं चैव न्यसेद् राजा प्राज्ञान् सर्वार्थदर्शिनः ।
व्यवहारेषु सततं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम् ॥ २८ ॥
राजा न्याय करते समय सदा वादी-प्रतिवादीकी बातोंको सुननेके लिये अपने पास सर्वार्थदर्शी विद्वान् पुरुषोंको बिठाये रखे; क्योंकि विशुद्ध न्यायपर ही राज्य प्रतिष्ठित होता है ॥ २८ ॥
आकरे लवणे शुल्के तरे नागबले तथा ।
न्यसेदमात्यान् नृपतिः स्वाप्तान् वा पुरुषान् हितान् ॥ २९ ॥
सोने आदिकी खान, नमक, अनाज आदिकी मंडी, नावके घाट तथा हाथियोंके यूथ—इन सब स्थानोंपर होनेवाली आयके निरीक्षणके लिये मन्त्रियोंको अथवा अपना हित चाहनेवाले विश्वसनीय पुरुषोंको राजा नियुक्त करे ॥ २९ ॥
सम्यग्दण्डधरो नित्यं राजा धर्ममवाप्नुयात् ।
नृपस्य सततं दण्डः सम्यग् धर्मः प्रशस्यते ॥ ३० ॥
भलीभाँति दण्ड धारण करनेवाला राजा सदा धर्मका भागी होता है। निरन्तर दण्ड धारण किये रहना राजाके लिये उत्तम धर्म मानकर उसकी प्रशंसा की जाती है ॥ ३० ॥
वेदवेदाङ्गवित् प्राज्ञः सुतपस्वी नृपो भवेत् ।
दानशीलश्च सततं यज्ञशीलश्च भारत ॥ ३१ ॥
भरतनन्दन! राजाको वेदों और वेदाङ्गोंका विद्वान्, बुद्धिमान्, तपस्वी, सदा दानशील और यज्ञपरायण होना चाहिये ॥ ३१ ॥
एते गुणाः समस्ताः स्युर्नृपस्य सततं स्थिराः ।
व्यवहारलोपे नृपतेः कुतः स्वर्गः कुतो यशः ॥ ३२ ॥
ये सारे गुण राजामें सदा स्थिरभावसे रहने चाहिये। यदि राजाका न्यायोचित व्यवहार ही लुप्त हो गया, तो उसे कैसे स्वर्ग प्राप्त हो सकता है और कैसे यश? ॥ ३२ ॥
यदा तु पीडितो राजा भवेद् राज्ञा बलीयसा ।
तदाभिसंश्रयेद् दुर्गं बुद्धिमान् पृथिवीपतिः ॥ ३३ ॥
बुद्धिमान् पृथ्वीपालक नरेश जब किसी अत्यन्त बलवान् राजासे पीड़ित होने लगे, तब उसे दुर्गका आश्रय लेना चाहिये ॥ ३३ ॥
विधानाक्रम्य मित्राणि विधानमुपकल्पयेत् ।
सामभेदान् विरोधार्थं विधानमुपकल्पयेत् ॥ ३४ ॥
उस समय प्राप्त कर्तव्यपर विचार करनेके लिये मित्रोंका आश्रय लेकर उनकी सलाहसे पहले तो अपनी रक्षाके लिये उचित व्यवस्था करे; फिर साम, भेद अथवा युद्धमेंसे क्या करना है; इसपर विचार करके उसके उपयुक्त कार्य करे ॥ ३४ ॥
घोषान् न्यसेत मार्गेषु ग्रामानुत्थापयेदपि ।
प्रवेशयेच्च तान् सर्वान् शाखानगरकेष्वपि ॥ ३५ ॥
यदि युद्धका ही निश्चय हो तो पशुशालाओंको वनमेंसे उठाकर सड़कोंपर ले आवे, छोटे-छोटे गाँवोंको उठा दे और उन सबको शाखानगरों (कस्बों) में मिला दे ॥
ये गुप्ताश्चैव दुर्गाश्च देशास्तेषु प्रवेशयेत् ।
धनिनो बलमुख्यांश्च सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
राज्यमें जो धनी और सेनाके प्रधान-प्रधान अधिकारी हों अथवा जो मुख्य-मुख्य सेनाएँ हों, उन सबको बारंबार सान्त्वना देकर ऐसे स्थानोंमें रख दे, जो अत्यन्त गुप्त और दुर्गम हो ॥ ३६ ॥
शस्याभिहारं कुर्याच्च स्वयमेव नराधिपः ।
असम्भवे प्रवेशस्य दहेद् दावाग्निना भृशम् ॥ ३७ ॥
राजा स्वयं ही ध्यान देकर खेतोंमें तैयार हुई अनाजकी फसलको कटवाकर किलेके भीतर रखवा ले। यदि किलेमें लाना सम्भव न हो तो उन फसलोंको आग लगाकर जला दे ॥ ३७ ॥
क्षेत्रस्थेषु च सस्येषु शत्रोरुपजयेन्नरान् ।
विनाशयेद् वा तत् सर्वं बलेनाथ स्वकेन वा ॥ ३८ ॥
शत्रुके खेतोंमें जो अनाज हों, उन्हें नष्ट करनेके लिये वहींके लोगोंमें फूट डाले अथवा अपनी ही सेनाके द्वारा वह सब नष्ट करा दे, जिससे शत्रुके पास खाद्य-सामग्रीका अभाव हो जाय ॥ ३८ ॥
नदीमार्गेषु च तथा संक्रमानवसादयेत् ।
जलं विस्रावयेत् सर्वमविस्राव्यं च दूषयेत् ॥ ३९ ॥
नदीके मार्गोंपर जो पुल पड़ते हों उन सबको तुड़वा दे। शत्रुके मार्गमें जो जलाशय हों, उनका सारा जल इधर-उधर बहा दे। जो जल बहाया न जा सके, उसे दूषित कर दे, जिससे वह पीनेयोग्य न रह जाय ॥
तदात्वेनायतीभिश्च निवसेद् भूम्यनन्तरम् ।
प्रतीघातं परस्याजौ मित्रकार्येऽप्युपस्थिते ॥ ४० ॥