भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 462, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 462

कमर्चन्तो महाप्राज्ञ सुखमव्ययमाप्नुयुः ॥ ६ ॥ **वसुमना बोले—**महामते! राज्यमें रहनेवाले प्राणियोंकी वृद्धि कैसे होती है? उनका ह्रास कैसे हो सकता है? किस देवताकी पूजा करनेवाले लोगोंको अक्षय सुखकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ ६ ॥ एवं पृष्टो महाप्राज्ञः कौसल्येनामितौजसा । राजसत्कारमव्यग्रं शशांसास्मै बृहस्पतिः ॥ ७ ॥ अमित तेजस्वी कोसलनरेशके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महाज्ञानी बृहस्पतिजीने शान्तभावसे राजाके सत्कारकी आवश्यकता बताते हुए इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥

बृहस्पतिरुवाच राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मो लोकस्य लक्ष्यते । प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम् ॥ ८ ॥ **बृहस्पतिजीने कहा—**महाप्राज्ञ! लोकमें जो धर्म देखा जाता है, उसका मूल कारण राजा ही है। राजाके भयसे ही प्रजा एक-दूसरेको हड़प नहीं लेती है ॥ ८ ॥ राजा ह्येवाखिलं लोकं समुदीर्णं समुत्सुकम् । प्रसादयति धर्मेण प्रसाद्य च विराजते ॥ ९ ॥ राजा ही मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले तथा अनुचित भोगोंमें आसक्त हो उनकी प्राप्तिके लिये उत्कण्ठित रहनेवाले सारे जगत्‌के लोगोंको धर्मानुकूल शासनद्वारा प्रसन्न रखता है और स्वयं भी प्रसन्नतापूर्वक रहकर अपने तेजसे प्रकाशित होता है ॥ ९ ॥ यथा ह्यनुदये राजन् भूतानि शशिसूर्ययोः । अन्धे तमसि मज्जेयुरपश्यन्तः परस्परम् ॥ १० ॥ यथा ह्यनुदके मत्स्या निराक्रन्दे विहङ्गमाः । विहरेयुर्यथाकामं विहिंसन्तः पुनः पुनः ॥ ११ ॥ विमथ्यातिक्रमेरंश्च विषह्यापि परस्परम् । अभावमचिरेणैव गच्छेयुर्नात्र संशयः ॥ १२ ॥ एवमेव विना राज्ञा विनश्येयुरिमाः प्रजाः । अन्धे तमसि मज्जेयुरगोपाः पशवो यथा ॥ १३ ॥ राजन्! जैसे सूर्य और चन्द्रमाका उदय न होनेपर समस्त प्राणी घोर अन्धकारमें डूब जाते हैं और एक-दूसरेको देख नहीं पाते हैं, जैसे थोड़े जलवाले तालाबमें मत्स्यगण तथा रक्षकरहित उपवनमें पक्षियोंके झुंड परस्पर एक-दूसरेपर बारंबार चोट करते हुए इच्छानुसार विचरण करते हैं, वे कभी तो अपने प्रहारसे दूसरोंको कुचलते और मथते हुए आगे बढ़ जाते हैं और कभी स्वयं दूसरेकी चोट खाकर व्याकुल हो उठते हैं। इस प्रकार