भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः

वसुमना और बृहस्पतिके संवादमें राजाके न होनेसे प्रजाकी

हानि और होनेसे लाभका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

किमाहुर्देवतं विप्रा राजानं भरतर्षभ ।

मनुष्याणामधिपतिं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ पितामह! जो मनुष्योंका अधिपति है, उस राजाको

ब्राह्मणलोग देवस्वरूप क्यों बताते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

बृहस्पतिं वसुमना यथा पप्रच्छ भारत ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा—भारत! इस विषयमें जानकार लोग उस प्राचीन इतिहासका

उदाहरण दिया करते हैं, जिसके अनुसार राजा वसुमनाने बृहस्पतिजीसे यही बात पूछी

थी ॥ २ ॥

राजा वसुमना नाम कौसल्यो धीमतां वरः ।

महर्षिं किल पप्रच्छ कृतप्रज्ञं बृहस्पतिम् ॥ ३ ॥

कहते हैं, प्राचीन कालमें बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कोसल-नरेश राजा वसुमनाने शुद्ध बुद्धिवाले

महर्षि बृहस्पतिसे कुछ प्रश्न किया ॥ ३ ॥

सर्वं वैनयिकं कृत्वा विनयज्ञो बृहस्पतिम् ।

दक्षिणानन्तरो भूत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥ ४ ॥

विधिं पप्रच्छ राज्यस्य सर्वलोकहिते रतः ।

प्रजानां सुखमन्विच्छन् धर्मशीलं बृहस्पतिम् ॥ ५ ॥

राजा वसुमना सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे। वे विनय प्रकट करनेकी

कलाको जानते थे। बृहस्पतिजीके आनेपर उन्होंने उठकर उनका अभिवादन किया और

चरणप्रक्षालन आदि सारा विनयसम्बन्धी बर्ताव पूर्ण करके महर्षिकी परिक्रमा करनेके

अनन्तर उन्होंने विधिपूर्वक उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। फिर प्रजाके सुखकी इच्छा

रखते हुए राजाने धर्मशील बृहस्पतिसे राज्यसंचालनकी विधिके विषयमें इस प्रकार प्रश्न

उपस्थित किया ॥ ४-५ ॥

वसुमना उवाच

केन भूतानि वर्धन्ते क्षयं गच्छन्ति केन वा ।