भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 481

जिन वस्तुओंको त्रिवर्गके अन्तर्गत बताया गया है, उनको भी यहाँ एकचित्त होकर सुनो। क्षय, स्थान और वृद्धि—ये ही त्रिवर्ग हैं तथा धर्म, अर्थ और काम—इनको परम त्रिवर्ग कहा गया है। इन सबका समयानुसार सेवन करना चाहिये। राजा धर्मके अनुसार चले तो वह पृथ्वीका दीर्घकालतक पालन कर सकता है ।।

अस्मिन्नर्थे च श्लोकौ द्वौ गीतावङ्गिरसा स्वयम् ।
यादवीपुत्र भद्रं ते तावपि श्रोतुमर्हसि ।। ७१ ।।
पृथापुत्र युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। इस विषयमें साक्षात् बृहस्पतिजीने जो दो श्लोक कहे हैं, उन्हें भी तुम सुनो ।। ७१ ।।

कृत्वा सर्वाणि कार्याणि सम्यक् सम्पाल्य मेदिनीम् ।
पालयित्वा तथा पौरान् परत्र सुखमेधते ।। ७२ ।।
‘सारे कर्तव्योंको पूरा करके पृथ्वीका अच्छी तरह पालन तथा नगर एवं राष्ट्रकी प्रजाका संरक्षण करनेसे राजा परलोकमें सुख पाता है ।। ७२ ।।

किं तस्य तपसा राज्ञः किं च तस्याध्वरैरपि ।
सुपालितप्रजो यः स्यात् सर्वधर्मविदेव सः ।। ७३ ।।
‘जिस राजाने अपनी प्रजाका अच्छी तरह पालन किया है, उसे तपस्यासे क्या लेना है? उसे यज्ञोंका भी अनुष्ठान करनेकी क्या आवयकता है? वह तो स्वयं ही सम्पूर्ण धर्मोंका ज्ञाता है’ ।। ७३ ।।

(श्लोकाञ्छोशनसा गीतास्तान् निबोध युधिष्ठिर ।
दण्डनीतेश्च यन्मूलं त्रिवर्गस्य च भूपते ।।
भार्गवाङ्गिरसं कर्म षोडशाङ्गं च यद् बलम् ।
विषं माया च दैवं च पौरुषं चार्थसिद्धये ।।
प्रागुदक्प्रवणं दुर्गं समासाद्य महीपतिः ।
त्रिवर्गतत्रयसम्पूर्णमुपादाय तमुद्वहेत् ।।
युधिष्ठिर! इस विषयमें शुक्राचार्यके कहे हुए कुछ श्लोक हैं, उन्हें सुनो। राजन्! उन श्लोकोंमें जो भाव है, वह दण्डनीति तथा त्रिवर्गका मूल है। भार्गवाङ्गि-रसकर्म, षोडशाङ्ग बल, विष, माया, दैव और पुरुषार्थ—ये सभी वस्तुएँ राजाकी अर्थसिद्धिके कारण हैं। राजाको चाहिये, जिसमें पूर्व और उत्तर दिशाकी भूमि नीची हो तथा जो तीनों प्रकारके त्रिवर्गोंसे परिपूर्ण हो उस दुर्गका आश्रय ले राज्यकार्यका भार वहन करे ।।

षट् पञ्च च विनिर्जित्य दश चाष्टौ च भूपतिः ।
त्रिवर्गैर्दशभिर्युक्तः सुरैरपि न जीयते ।।
षड्वर्ग<sup></sup>, पञ्चवर्ग<sup></sup>, दस दोष<sup></sup> और आठ दोष<sup></sup>—इन सबको जीतकर त्रिवर्गयुक्त<sup></sup> एवं दस वर्गोंके<sup></sup> ज्ञानसे सम्पन्न हुआ राजा देवताओंद्वारा भी जीता नहीं जा सकता ।।