महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन बुद्धिं परिगृह्णीत स्त्रीणां मूर्खजनस्य च । दैवोपहतबुद्धीनां ये च वेदैर्विवर्जिताः ।। न तेषां शृणुयाद् राजा बुद्धिस्तेषां पराङ्मुखी । राजा कभी स्त्रियों और मूर्खोंसे सलाह न ले। जिनकी बुद्धि दैवसे मारी गयी है तथा जो वेदोंके ज्ञानसे शून्य हैं, उनकी बात राजा कभी न सुने; क्योंकि उन लोगोंकी बुद्धि नीतिसे विमुख होती है ।।
स्त्रीप्रधानानि राज्यानि विद्वद्भिर्वर्जितानि च ।। मूर्खामात्यप्रतप्तानि शुष्यन्ते जलबिन्दुवत् । जिन राज्योंमें स्त्रियोंकी प्रधानता हो और जिन्हें विद्वानोंने छोड़ रखा हो; वे राज्य मूर्ख मन्त्रियोंसे संतप्त होकर पानीकी बूँदके समान सूख जाते हैं ।।
विद्वांसः प्रथिता ये च ये चाप्ताः सर्वकर्मसु ।। युद्धेषु दृष्टकर्माणस्तेषां च शृणुयान्नृपः । जो अपनी विद्वत्ताके लिये विख्यात हों, सभी कार्योंमें विश्वासके योग्य हों तथा युद्धके अवसरोंपर जिनके कार्य देखे गये हों, ऐसे मन्त्रियोंकी ही बात राजाको सुननी चाहिये ।।
दैवं पुरुषकारं च त्रिवर्गं च समाश्रितः ।। दैवतानि च विप्रांश्च प्रणम्य विजयी भवेत् ।) दैव, पुरुषार्थ और त्रिवर्गका आश्रय ले देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके युद्धकी यात्रा करनेवाला राजा विजयी होता है ।।
युधिष्ठिर उवाच
दण्डनीतिश्च राजा च समस्तौ तावुभावपि । कस्य किं कुर्वतः सिद्ध्येत् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ७४ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! दण्डनीति तथा राजा दोनों मिलकर ही कार्य करते हैं। इनमेंसे किसके क्या करनेसे कार्य-सिद्धि होती है? यह मुझे बताइये ॥ ७४ ॥
भीष्म उवाच
महाभाग्यं दण्डनीत्याः सिद्धैः शब्दैः सहेतुकैः । शृणु मे शंसतो राजन् यथावदिह भारत ॥ ७५ ॥ भीष्मजी बोले—राजन्! भरतनन्दन! दण्डनीतिसे राजा और प्रजाके जिस महान् सौभाग्यका उदय होता है, उसका मैं लोकप्रसिद्ध एवं युक्तियुक्त शब्दोंद्वारा वर्णन करता हूँ, तुम यथावत् रूपसे यहाँ उसे सुनो ॥ ७५ ॥
दण्डनीतिः स्वधर्मेभ्यश्चातुर्वर्ण्यं नियच्छति । प्रयुक्ता स्वामिना सम्यगधर्मेभ्यो नियच्छति ॥ ७६ ॥