महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि राजा दण्डनीतिका उत्तम रीतिसे प्रयोग करे तो वह चारों वर्णोंको अपने-अपने धर्ममें बलपूर्वक लगाती है और उन्हें अधर्मकी ओर जानेसे रोक देती है ।। चातुर्वर्ण्ये स्वकर्मस्थे मर्यादानामसंकरे । दण्डनीतिकृते क्षेमे प्रजानामकुतोभये ।। ७७ ।। स्वाम्ये प्रयत्नं कुर्वन्ति त्रयो वर्णा यथाविधि । तस्मादेव मनुष्याणां सुखं विद्धि समाहितम् ।। ७८ ।। इस प्रकार दण्डनीतिके प्रभावसे जब चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने कर्मोंमें संलग्न रहते हैं, धर्ममर्यादामें संकीर्णता नहीं आने पाती और प्रजा सब ओरसे निर्भय एवं कुशलपूर्वक रहने लगती है, तब तीनों वर्णोंके लोग विधिपूर्वक स्वास्थ्य-रक्षाका प्रयत्न करते हैं। युधिष्ठिर! इसीमें मनुष्योंका सुख निहित है, यह तुम्हें ज्ञात होना चाहिये ।। ७७-७८ ।। कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् । इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ।। ७९ ।। काल राजाका कारण है अथवा राजा कालका, ऐसा संशय तुम्हें नहीं होना चाहिये। यह निश्चित है कि राजा ही कालका कारण होता है ।। ७९ ।। दण्डनीत्यां यदा राजा सम्यक् कार्त्स्न्येन वर्तते । तदा कृतयुगं नाम कालसृष्टं प्रवर्तते ।। ८० ।। जिस समय राजा दण्डनीतिका पूरा-पूरा एवं ठीक प्रयोग करता है, उस समय पृथ्वीपर पूर्णरूपसे सत्ययुगका आरम्भ हो जाता है। राजासे प्रभावित हुआ समय ही सत्ययुगकी सृष्टि कर देता है ।। ८० ।। ततः कृतयुगे धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां नाधर्मे रमते मनः ।। ८१ ।। उस सत्ययुगमें धर्म-ही-धर्म रहता है, अधर्मका कहीं नाम-निशान भी नहीं दिखायी देता तथा किसी भी वर्णकी अधर्ममें रुचि नहीं होती ।। ८१ ।। योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः । वैदिकानि च सर्वाणि भवन्त्यपि गुणान्युत ।। ८२ ।। उस समय प्रजाके योगक्षेम स्वतः सिद्ध होते रहते हैं तथा सर्वत्र वैदिक गुणोंका विस्तार हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है ।। ८२ ।। ऋतवश्च सुखाः सर्वे भवन्त्युत निरामयाः । प्रसीदन्ति नराणां च स्वरवर्णमनांसि च ।। ८३ ।। सभी ऋतुएँ सुखदायिनी और आरोग्य बढ़ानेवाली होती हैं। मनुष्योंके स्वर, वर्ण और मन स्वच्छ एवं प्रसन्न होते हैं ।। ८३ ।। व्याधयो न भवन्त्यत्र नाल्पायुर्दृश्यते नरः । विधवा न भवन्त्यत्र कृपणो न तु जायते ।। ८४ ।।