महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 484, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस जगत्में उस समय रोग नहीं होते, कोई भी मनुष्य अल्पायु नहीं दिखायी देता, स्त्रियाँ विधवा नहीं होती हैं तथा कोई भी मनुष्य दीन-दुखी नहीं होता है ।। अकृष्टपच्या पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा । त्वक्पत्रफलमूलानि वीर्यवन्ति भवन्ति च ।। ८५ ।। पृथ्वीपर बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा होता है, ओषधियाँ भी स्वतः उत्पन्न होती हैं; उनकी छाल, पत्ते, फल और मूल सभी शक्तिशाली होते हैं ।। ८५ ।। नाधर्मो विद्यते तत्र धर्म एव तु केवलम् । इति कार्तयुगानेतान् धर्मान् विद्धि युधिष्ठिर ।। ८६ ।। सत्ययुगमें अधर्मका सर्वथा अभाव हो जाता है। उस समय केवल धर्म-ही-धर्म रहता है। युधिष्ठिर! इन सबको सत्ययुगके धर्म समझो ।। ८६ ।। दण्डनीत्यां यदा राजा त्रीनंशाननुवर्तते । चतुर्थमंशमुत्सृज्य तदा त्रेता प्रवर्तते ।। ८७ ।। अशुभस्य चतुर्थांशस्त्रीनंशाननुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवन्त्योषधयस्तथा ।। ८८ ।। जब राजा दण्डनीतिके एक चौथाई अंशको छोड़कर केवल तीन अंशोंका अनुसरण करता है, तब त्रेतायुग प्रारम्भ हो जाता है। उस समय अशुभका चौथा अंश पुण्यके तीन अंशोंके पीछे लगा रहता है। उस अवस्थामें पृथ्वीपर जोतने-बोनेसे ही अन्न पैदा होता है। ओषधियाँ भी उसी तरह पैदा होती हैं ।। ८७-८८ ।। अर्धं त्यक्त्वा यदा राजा नीत्यर्धमनुवर्तते । ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्तते ।। ८९ ।। जब राजा दण्डनीतिके आधे भागको त्यागकर आधेका अनुसरण करता है, तब द्वापर नामक युगका आरम्भ हो जाता है ।। ८९ ।। अशुभस्य यदा त्वर्धं द्वावंशावनुवर्तते । कृष्टपच्यैव पृथिवी भवत्यर्धफला तथा ।। ९० ।। उस समय पापके दो भाग पुण्यके दो भागोंका अनुसरण करते हैं। पृथ्वीपर जोतने-बोनेसे ही अनाज पैदा होता है; परंतु आधी फसलमें ही फल लगते हैं, आधी मारी जाती है ।। ९० ।। दण्डनीतिं परित्यज्य यदा कात्स्न्र्येन भूमिपः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन प्रवर्तेत तदा कलिः ।। ९१ ।। जब राजा समूची दण्डनीतिका परित्याग करके अयोग्य उपायोंद्वारा प्रजाको कष्ट देने लगता है, तब कलियुगका आरम्भ हो जाता है ।। ९१ ।। कलावधर्मो भूयिष्ठं धर्मो भवति न क्वचित् । सर्वेषामेव वर्णानां स्वधर्माच्च्यवते मनः ।। ९२ ।।