भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 486

द्वापरका प्रसार करनेसे वह अपने पुण्यके अनुसार कुछ कालतक स्वर्गका सुख भोगता है; परंतु कलियुगकी सृष्टि करनेसे राजाको अत्यन्त पापका भागी होना पड़ता है॥ १००॥

ततो वसति दुष्कर्मा नरके शाश्वतीः समाः।
प्रजानां कल्मषे मग्नोऽकीर्तिं पापं च विन्दति॥ १०१॥

तदनन्तर वह दुराचारी राजा उस पापके कारण बहुत वर्षोंतक नरकमें निवास करता है। प्रजाके पापमें डूबकर वह अपयश और पापके फलस्वरूप दुःखका ही भागी होता है॥ १०१॥

दण्डनीतिं पुरस्कृत्य विजानन् क्षत्रियः सदा।
अनवाप्तं च लिप्सैत लब्धं च परिपालयेत्॥ १०२॥

अतः विज्ञ क्षत्रियनरेशको चाहिये कि वह सदा दण्डनीतिको सामने रखकर उसके द्वारा अप्राप्त वस्तुको पानेकी इच्छा करे और प्राप्त हुई वस्तुकी रक्षा करे। इसके द्वारा प्रजाके योगक्षेम सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है॥
(योगक्षेमाः प्रवर्तन्ते प्रजानां नात्र संशयः।)

लोकस्य सीमन्तकरी मर्यादा लोकभाविनी।
सम्यङ्नीता दण्डनीतिर्यथा माता यथा पिता॥ १०३॥

यदि दण्डनीतिका ठीक-ठीक प्रयोग किया जाय तो वह बालककी रक्षा करनेवाले माता-पिताके समान लोककी सुन्दर व्यवस्था करनेवाली और धर्ममर्यादा तथा जगत्की रक्षामें समर्थ होती है॥ १०३॥

यस्यां भवन्ति भूतानि तद् विद्धि मनुजर्षभ।
एष एव परो धर्मो यद् राजा दण्डनीतिमान्॥ १०४॥

नरश्रेष्ठ! तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिये कि समस्त प्राणी दण्डनीतिके आधारपर ही टिके हुए हैं। राजा दण्डनीतिसे युक्त हो उसीके अनुसार चले—यही उसका सबसे बड़ा धर्म है॥ १०४॥

तस्मात् कौरव्य धर्मेण प्रजाः पालय नीतिमान्।
एवं वृत्तः प्रजा रक्षन् स्वर्गं जेतासि दुर्जयम्॥ १०५॥

अतः कुरुनन्दन! तुम दण्डनीतिका आश्रय ले धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। यदि नीतियुक्त व्यवहारसे रहकर प्रजाकी रक्षा करोगे तो दुर्जय स्वर्गको जीत लोगे॥ १०५॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६९॥

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व · पृष्ठ 486, कुल 2450 में से · BharatKosha