महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ११६ १/३ श्लोक हैं।)
* मत्त, उन्मत्त आदि दस प्रकारके अपराधियोंके नाम इस प्रकार हैं—१-मत्त, २-उन्मत्त, ३-दस्यु, ४-तस्कर, ५-प्रतारक, ६-शठ, ७-लम्पट, ८-जुआरी, ९-कृत्रिम लेखक (जालिया) और १०-घूसखोर।
१. काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—इन छः आन्तरिक शत्रुओंके समुदायको षड्वर्ग कहते हैं। इनको पूर्णरूपसे जीत लेनेवाला नरेश ही सर्वत्र विजयी होता है।
२. श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण—इन पाँच इन्द्रियोंके समूहको ही पञ्चवर्ग कहते हैं। इन सबको क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंमें आसक्त न होने देना ही इनपर विजय पाना है।
३. आखेट, जूआ, दिनमें सोना, दूसरोंकी निन्दा करना, स्त्रियोंमें आसक्त होना, मद्य पीना, नाचना, गाना, बाजा बजाना और व्यर्थ घूमना—से कामजनित दस दोष हैं, जिनपर राजाको विजय पाना चाहिये। इनको सर्वथा त्याग देना ही इनपर विजय पाना है।
४. चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, दोषदर्शन, अर्थदूषण, वाणीकी कठोरता और दण्डकी कठोरता—ये क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले आठ दोष राजाके लिए त्याज्य हैं।
५. धर्म, अर्थ और कामको अथवा उत्साहशक्ति, प्रभुशक्ति और मन्त्रशक्तिको त्रिवर्ग कहते हैं।
६. मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, कोष और दण्ड—ये पाँच ही अपने और शत्रुवर्गके मिलाकर दस वर्ग कहलाते हैं। इनकी पूरी जानकारी रखनेपर राजाको अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका पूर्ण ज्ञान होता है।