भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 488

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सप्ततितमोऽध्यायः

राजाको इहलोक और परलोकमें सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

केन वृत्तेन वृत्तज्ञ वर्तमानो महीपतिः ।
सुखेनाथान् सुखोदर्कानिह च प्रेत्य चाप्नुयात् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**आचारके ज्ञाता पितामह! किस प्रकारका आचरण करनेसे राजा इहलोक और परलोकमें भी भविष्यमें सुख देनेवाले पदार्थोंको सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अयं गुणानां षट्त्रिंशत्षट्त्रिंशद्गुणसंयुतः ।
यान् गुणांस्तु गुणोपेतः कुर्वन् गुणमवाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दया और उदारता आदि गुणोंसे युक्त राजा जिन गुणोंको आचरणमें लाकर उत्कर्ष लाभ कर सकता है, वे छत्तीस प्रकारके गुण हैं। राजाको चाहिये कि वह इन छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे ॥ २ ॥
चरेद् धर्मानकटुको मुञ्चेत् स्नेहं न चास्तिकः ।
अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत् काममनुद्धतः ॥ ३ ॥
(अब मैं क्रमशः उन गुणोंका वर्णन करता हूँ) १-धर्मका आचरण करे, किंतु कटुता न आने दे। २-आस्तिक रहते हुए दूसरोंके साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े। ३-क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही अर्थ-संग्रह करे। ४-मर्यादाका अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे ॥ ३ ॥
प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः ।
दाता नापात्रवर्षी स्यात् प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ॥ ४ ॥
५-दीनता न लाते हुए ही प्रिय भाषण करे। ६-शूरवीर बने, किंतु बढ़-बढ़कर बातें न बनावे। ७-दान दे, परंतु अपात्रको नहीं। ८-साहसी हो, किंतु निष्ठुर न हो ॥
संदधीत न चानार्यैर्विगृह्णीयान्न बन्धुभिः ।
नाभक्तं चारयेच्चारं कुर्यात् कार्यमपीडया ॥ ५ ॥
९-दुष्टोंके साथ मेल न करे। १०-बन्धुओंके साथ लड़ाई-झगड़ा न ठाने। ११-जो राजभक्त न हो, ऐसे गुप्तचरसे काम न ले। १२-किसीको कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे ॥ ५ ॥