महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 489, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थं ब्रूयान्न चासत्सु गुणान् ब्रूयान्न चात्मनः । आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत् ॥ ६ ॥ १३-दुष्टोंसे अपना अभीष्ट कार्य न कहे। १४-अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे। १५-श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका धन न छीने। १६-नीच पुरुषोंका आश्रय न ले ॥
नापरीक्ष्य नयेद् दण्डं न च मन्त्रं प्रकाशयेत् । विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु ॥ ७ ॥ १७-अपराधकी अच्छी तरह जाँच पड़ताल किये बिना ही किसीको दण्ड न दे। १८-गुप्त मन्त्रणाको प्रकट न करे। १९-लोभियोंको धन न दे। २०-जिन्होंने कभी अपकार किया हो, उनपर विश्वास न करे ॥ ७ ॥
अनीर्षुर्गूप्तदारः स्याच्चोक्षः स्यादघृणी नृपः । स्त्रियः सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुञ्जीत नाहितम् ॥ ८ ॥ २१-ईर्ष्यारहित होकर अपनी स्त्रीकी रक्षा करे। २२-राजा शुद्ध रहे; किंतु किसीसे घृणा न करे। २३-स्त्रियोंका अधिक सेवन न करे। २४-शुद्ध और स्वादिष्ट भोजन करे, परंतु अहितकर भोजन न करे ॥ ८ ॥
अस्तब्धः पूजयेन्मान्यान् गुरून् सेवेदमायया । अर्चैद् देवानदम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम् ॥ ९ ॥ २५-उद्दण्डता छोड़कर विनीतभावसे माननीय पुरुषोंका आदर-सत्कार करे। २६-निष्कपटभावसे गुरु-जनोंकी सेवा करे। २७-दम्भहीन होकर देवताओंकी पूजा करे। २८-अनिन्दित उपायसे धन-सम्पत्ति पानेकी इच्छा करे ॥ ९ ॥
सेवेत प्रणयं हित्वा दक्षः स्यान्न त्वकालवित् । सान्त्वयेन्न च मोक्षाय अनुगृह्णन्न चाक्षिपेत् ॥ १० ॥ २९-हठ छोड़कर प्रीतिका पालन करे। ३०-कार्य-कुशल हो, किंतु अवसरके ज्ञानसे शून्य न हो। ३१-केवल पिण्ड छुड़ानेके लिये किसीको सान्त्वना या भरोसा न दे। ३२-किसीपर कृपा करते समय आक्षेप न करे ॥ १० ॥
प्रहरेन्न त्वविज्ञाय हत्वा शत्रून् न शोचयेत् । क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु ॥ ११ ॥ ३३-बिना जाने किसीपर प्रहार न करे। ३४-शत्रुओंको मारकर शोक न करे। ३५-अकस्मात् किसीपर क्रोध न करे तथा ३६-कोमल हो, परंतु अपकार करनेवालोंके लिये नहीं ॥ ११ ॥
एवं चरस्व राज्यस्थो यदि श्रेय इहेच्छसि । अतोऽन्यथा नरपतिर्भयमृच्छत्यनुत्तमम् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! यदि इस लोकमें कल्याण चाहते हो तो राज्यपर स्थित रहकर ऐसा ही बर्ताव करो; क्योंकि इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा बड़ी भारी विपत्ति या भयमें पड़