महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः
युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शाप
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा देवर्षिर्विरराम स नारदः ।
युधिष्ठिरस्तु राजर्षिर्दध्यौ शोकपरिप्लुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इतना कहकर देवर्षि नारद तो चुप हो गये, किंतु राजर्षि युधिष्ठिर शोकमग्न हो चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥
तं दीनममनसं वीरं शोकोपहतमातुरम् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं पर्यश्रुनयनं तथा ॥ २ ॥
कुन्ती शोकपरीताङ्गी दुःखोपहतचेतना ।
अब्रवीन्मधुराभाषा काले वचनमर्थवत् ॥ ३ ॥
उनका मन बहुत दुखी हो गया। वे शोकके मारे व्याकुल हो सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे। उनकी आँखोंसे आँसू बहने लगा। वीर युधिष्ठिरकी ऐसी अवस्था देख कुन्तीके सारे अंगोंमें शोक व्याप्त हो गया। वे दुःखसे अचेत-सी हो गयीं और मधुर वाणीमें समयके अनुसार अर्थभरी बात कहने लगीं— ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ।
जहि शोकं महाप्राज्ञ शृणु चेदं वचो मम ॥ ४ ॥
‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें कर्णके लिये शोक नहीं करना चाहिये। महामते! शोक छोड़ो और मेरी यह बात सुनो ॥ ४ ॥
यातितः स मया पूर्वं भ्रात्र्यं ज्ञापयितुं तव ।
भास्करेण च देवेन पित्रा धर्मभृतां वर ॥ ५ ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैंने पहले कर्णको यह बतानेका प्रयत्न किया था कि पाण्डव तुम्हारे भाई हैं। उसके पिता भगवान् भास्करने भी ऐसी ही चेष्टा की ॥ ५ ॥
यद्वाच्यं हितकामेन सुहृदा हितमिच्छता ।
तथा दिवाकरेणोक्तः स्वप्नान्ते मम चाग्रतः ॥ ६ ॥
‘हितकी इच्छा रखनेवाले एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वही भगवान् सूर्यने उससे स्वप्नमें और मेरे सामने भी कहा ॥ ६ ॥
न चैनमशकद् भानुरहं वा स्नेहकारणैः ।
पुरा प्रत्यनुनेतुं वा नेतुं वाप्येकतां त्वया ॥ ७ ॥