महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
षष्ठोऽध्यायः
युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शाप
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा देवर्षिर्विरराम स नारदः ।
युधिष्ठिरस्तु राजर्षिर्दध्यौ शोकपरिप्लुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इतना कहकर देवर्षि नारद तो चुप हो गये, किंतु राजर्षि युधिष्ठिर शोकमग्न हो चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥
तं दीनममनसं वीरं शोकोपहतमातुरम् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं पर्यश्रुनयनं तथा ॥ २ ॥
कुन्ती शोकपरीताङ्गी दुःखोपहतचेतना ।
अब्रवीन्मधुराभाषा काले वचनमर्थवत् ॥ ३ ॥
उनका मन बहुत दुखी हो गया। वे शोकके मारे व्याकुल हो सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे। उनकी आँखोंसे आँसू बहने लगा। वीर युधिष्ठिरकी ऐसी अवस्था देख कुन्तीके सारे अंगोंमें शोक व्याप्त हो गया। वे दुःखसे अचेत-सी हो गयीं और मधुर वाणीमें समयके अनुसार अर्थभरी बात कहने लगीं— ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ।
जहि शोकं महाप्राज्ञ शृणु चेदं वचो मम ॥ ४ ॥
‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें कर्णके लिये शोक नहीं करना चाहिये। महामते! शोक छोड़ो और मेरी यह बात सुनो ॥ ४ ॥
यातितः स मया पूर्वं भ्रात्र्यं ज्ञापयितुं तव ।
भास्करेण च देवेन पित्रा धर्मभृतां वर ॥ ५ ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैंने पहले कर्णको यह बतानेका प्रयत्न किया था कि पाण्डव तुम्हारे भाई हैं। उसके पिता भगवान् भास्करने भी ऐसी ही चेष्टा की ॥ ५ ॥
यद्वाच्यं हितकामेन सुहृदा हितमिच्छता ।
तथा दिवाकरेणोक्तः स्वप्नान्ते मम चाग्रतः ॥ ६ ॥
‘हितकी इच्छा रखनेवाले एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वही भगवान् सूर्यने उससे स्वप्नमें और मेरे सामने भी कहा ॥ ६ ॥
न चैनमशकद् भानुरहं वा स्नेहकारणैः ।
पुरा प्रत्यनुनेतुं वा नेतुं वाप्येकतां त्वया ॥ ७ ॥
'परंतु भगवान् सूर्य एवं मैं दोनों ही स्नेहके कारण दिखाकर अपने पक्षमें करने या तुमलोगोंसे एकता (मेल) करानेमें सफल न हो सके ॥ ७ ॥
ततः कालपरीत: स वैरस्योद्धरणे रतः ।
प्रतीपकारी युष्माकमिति चोपेक्षितो मया ॥ ८ ॥
'तदनन्तर वह कालके वशीभूत हो वैरका बदला लेनेमें लग गया और तुमलोगोंके विपरीत ही सारे कार्य करने लगा; यह देखकर मैंने उसकी उपेक्षा कर दी' ॥ ८ ॥
इत्युक्तो धर्मराजस्तु मात्रा बाष्पाकुलेक्षणः ।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा शोकव्याकुलितेन्द्रियः ॥ ९ ॥
भवत्या गूढमन्त्रत्वात् पीडितोऽस्मीत्युवाच ताम् ॥ १० ॥
माताके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरके नेत्रोंमें आँसू भर आया, शोकसे उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे धर्मात्मा नरेश उनसे इस प्रकार बोले—'माँ! आपने इस गोपनीय बातको गुप्त रखकर मुझे बड़ा कष्ट दिया' ॥ ९-१० ॥
शशाप च महातेजाः सर्वलोकेषु योषितः ।
न गुह्यं धारयिष्यन्तीत्येवं दुःखसमन्वितः ॥ ११ ॥
फिर महातेजस्वी युधिष्ठिरने अत्यन्त दुखी होकर सारे संसारकी स्त्रियोंको यह शाप दे दिया कि 'आजसे स्त्रियाँ अपने मनमें कोई गोपनीय बात नहीं छिपा सकेंगी' ॥ ११ ॥
स राजा पुत्रपौत्राणां सम्बन्धिसुहृदां तदा ।
स्मरन्नुद्विग्नहृदयो बभूवोद्विग्नचेतनः ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिरका हृदय अपने पुत्रों, पौत्रों, सम्बन्धियों तथा सुहृदोंको याद करके उद्विग्न हो उठा। उनके मनमें व्याकुलता छा गयी ॥ १२ ॥
ततः शोकपरीतात्मा सधूम इव पावकः ।
निर्वेदमगमद् धीमान् राजा संतापपीडितः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् शोकसे व्याकुलचित्त हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर संतापसे पीड़ित हो धूमयुक्त अग्निके समान धीरे-धीरे जलने लगे तथा राज्य और जीवनसे विरक्त हो उठे ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि स्त्रीशापे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शापविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा शोकव्याकुलचेतनः ।
शुशोच दुःखसंतप्तः स्मृत्वा कर्णं महारथम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका चित्त शोकसे व्याकुल हो उठा था। वे महारथी कर्णको याद करके दुःखसे संतप्त हो शोकमें डूब गये ॥ १ ॥
आविष्टो दुःखशोकाभ्यां निःश्वसंश्च पुनः पुनः ।
दृष्ट्वार्जुनमुवाचेदं वचनं शोककर्शितः ॥ २ ॥
दुःख और शोकसे आविष्ट हो वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे और अर्जुनको देखकर शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार बोले ॥ २ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यद्भैक्ष्यमाचरिष्याम वृष्ण्यन्धकपुरे वयम् ।
ज्ञातीन् निष्पुरुषान् कृत्वा नेमां प्राप्स्याम दुर्गतिम् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**अर्जुन! यदि हमलोग वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रियोंकी नगरी द्वारकामें जाकर भीख माँगते हुए अपना जीवन-निर्वाह कर लेते तो आज अपने कुटुम्बको निर्वंश करके हम इस दुर्दशाको प्राप्त नहीं होते ॥
अमित्रा नः समृद्धार्था वृत्तार्थाः कुरवः किल ।
आत्मानमात्मना हत्वा किं धर्मफलमाप्नुमः ॥ ४ ॥
हमारे शत्रुओंका मनोरथ पूर्ण हुआ (क्योंकि वे हमारे कुलका विनाश देखकर प्रसन्न होंगे)। कौरवोंका प्रयोजन तो उनके जीवनके साथ ही समाप्त हो गया। आत्मीय जनोंको मारकर स्वयं ही अपनी हत्या करके हम कौन-सा धर्मका फल प्राप्त करेंगे? ॥ ४ ॥
धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम् ।
धिगस्त्वमर्षं येनेमामापदं गमिता वयम् ॥ ५ ॥
क्षत्रियोंके आचार, बल, पुरुषार्थ और अमर्षको धिक्कार है! जिनके कारण हम ऐसी विपत्तिमें पड़ गये ॥ ५ ॥
साधु क्षमा दमः शौचं वैराग्यं चाप्यमत्सरः ।
अहिंसा सत्यवचनं नित्यानि वनचारिणाम् ॥ ६ ॥
क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम, बाहर-भीतरकी शुद्धि, वैराग्य, ईर्ष्याका अभाव, अहिंसा और सत्यभाषण—ये वनवासियोंके नित्य धर्म ही श्रेष्ठ हैं ।। ६ ।।
वयं तु लोभान्मोहाच्च दम्भं मानं च संश्रिताः ।
इमामवस्थां सम्प्राप्ता राज्यलाभबुभुत्सया ।। ७ ।।
हमलोग तो लोभ और मोहके कारण राज्यलाभके सुखका अनुभव करनेकी इच्छासे दम्भ और अभिमानका आश्रय लेकर इस दुर्दशामें फँस गये हैं ।। ७ ।।
त्रैलोक्यस्यापि राज्येन नास्मान् कश्चित् प्रहर्षयेत् ।
बान्धवान् निहतान् दृष्ट्वा पृथिव्यां विजयैषिणः ।। ८ ।।
जब हमने पृथ्वीपर विजयकी इच्छा रखनेवाले अपने बन्धु-बान्धवोंको मारा गया देख लिया, तब हमें इस समय तीनों लोकोंका राज्य देकर भी कोई प्रसन्न नहीं कर सकता ।। ८ ।।
ते वयं पृथिवीहेतोरवध्यान् पृथिवीश्वरान् ।
सम्परित्यज्य जीवामो हीनार्था हतबान्धवाः ।। ९ ।।
हाय! हमलोगोंने इस तुच्छ पृथ्वीके लिये अवध्य राजाओंकी भी हत्या की और अब उन्हें छोड़कर बन्धु-बान्धवोंसे हीन हो अर्थ-भ्रष्टकी भाँति जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।। ९ ।।
आमिषे गृध्यमानानामशुभं वै शुनामिव ।
आमिषं चैव नो हीष्टमामिषस्य विसर्जनम् ।। १० ।।
जैसे मांसके लोभी कुत्तोंको अशुभकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार राज्यमें आसक्त हुए हमलोगोंको भी अनिष्ट प्राप्त हुआ है। अतः हमारे लिये मांस-तुल्य राज्यको पाना अभीष्ट नहीं है, उसका परित्याग ही अभीष्ट होना चाहिये ।। १० ।।
न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभिः ।
न गवाश्वेन सर्वेण ते त्याज्या य इमे हताः ।। ११ ।।
ये जो हमारे सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, इनका परित्याग तो हमें समस्त पृथ्वी, राशि-राशि सुवर्ण और समूचे गाय-घोड़े पाकर भी नहीं करना चाहिये था ।। ११ ।।
काममन्युपरीतास्ते क्रोधहर्षसमन्विताः ।
मृत्युयानं समारुह्य गता वैवस्वतक्षयम् ।। १२ ।।
वे काम और क्रोधके वशीभूत थे, हर्ष और रोषसे भरे हुए थे, अतः मृत्युरूपी रथपर सवार हो यमलोकमें चले गये ।। १२ ।।
बहुकल्याणसंयुक्तानिच्छन्ति पितरः सुतान् ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च तितिक्षया ।। १३ ।।
सभी पिता तपस्या, ब्रह्मचर्य-पालन, सत्यभाषण तथा तितिक्षा आदि साधनोंद्वारा अनेक कल्याणमय गुणोंसे युक्त बहुत-से पुत्र पाना चाहते हैं ।। १३ ।।
उपवासैस्तथेज्याभिर्व्रतकौतुकमङ्गलैः ।
लभन्ते मातरो गर्भान् मासान् दश च बिभ्रति ॥ १४ ॥
यदि स्वस्ति प्रजायन्ते जाता जीवन्ति वा यदि ।
सम्भाविता जातबलास्ते दद्युर्यदि नः सुखम् ॥ १५ ॥
इह चामुत्र चैवेति कृपणाः फलहेतवः ।
इसी प्रकार सभी माताएँ उपवास, यज्ञ, व्रत, कौतुक और मंगलमय कृत्योंद्वारा उत्तम पुत्रकी इच्छा रखकर दस महीनोंतक अपने गर्भोका भरण-पोषण करती हैं। उन सबका यही उद्देश्य होता है कि यदि कुशलपूर्वक बच्चे पैदा होंगे, पैदा होनेपर यदि जीवित रहेंगे तथा बलवान् होकर यदि अच्छे गुणोंसे सम्पन्न होंगे तो हमें इहलोक और परलोकमें सुख देंगे। इस प्रकार वे दीन माताएँ फलकी आकांक्षा रखती हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥
तासामयं समुद्योगो निर्वृत्तः केवलोऽफलः ॥ १६ ॥
यदासां निहताः पुत्रा युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
अभुक्त्वा पार्थिवान् भोगानृणान्यनपहाय च ॥ १७ ॥
पितृभ्यो देवताभ्यश्च गता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥
परंतु उनका यह उद्योग सर्वथा निष्फल हो गया; क्योंकि हमलोगोंने उन सब माताओंके नवयुवक पुत्रोंको, जो विशुद्ध सुवर्णमय कुण्डलोंसे अलंकृत थे, मार डाला है। वे इस भूलोकके भोगोंके उपभोगका अवसर न पाकर देवताओं और पितरोंका ऋण उतारे बिना ही यमलोकमें चले गये ॥ १६—१८ ॥
यदैशामम्ब पितरौ जातकामावुभावपि ।
संजातधनरत्नेषु तदैव निहता नृपाः ॥ १९ ॥
माँ! इन राजाओंके माता-पिता जब इनके द्वारा उपार्जित धन और रत्न आदिके उपभोगकी आशा करने लगे, तभी ये मारे गये ॥ १९ ॥
संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षाममञ्जसाः ।
न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥ २० ॥
जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ॥ २० ॥
पञ्चालानां कुरूणां च हता एव हि ये हताः ।
न चेत् सर्वानयं लोकः पश्येत् स्वेनैव कर्मणा ॥ २१ ॥
पांचालों और कौरवोंके जो वीर मारे गये, वे तो मर ही गये; नहीं तो आज यह संसार देखता कि वे सब अपने ही पुरुषार्थसे कैसी ऊँची स्थितिमें पहुँच गये हैं ॥ २१ ॥
वयमेवास्य लोकस्य विनाशे कारणं स्मृताः ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेषु तत् सर्वं प्रतिपत्स्यति ॥ २२ ॥
हमलोग ही इस जगत्के विनाशमें कारण माने गये हैं; परंतु इसका सारा उत्तरदायित्व धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर ही पड़ेगा ॥ २२ ॥
सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा मायोपजीवनः । मिथ्याविनीतः सततमस्मास्वनपकारिषु ॥ २३ ॥ हमलोगोंने कभी कोई बुराई नहीं की थी तो भी राजा धृतराष्ट्र सदा हमसे द्वेष रखते थे। उनकी बुद्धि निरन्तर हमें ठगनेकी ही बात सोचा करती थी। वे मायाका आश्रय लेनेवाले थे और झूठे ही विनय अथवा नम्रता दिखाया करते थे ॥ २३ ॥
न सकामा वयं ते च न चास्माभिर्न तैर्जितम् । न तैर्भुक्तेयमवनिर्न नार्यो गीतवादितम् ॥ २४ ॥ इस युद्धसे न तो हमारी कामना सफल हुई और न वे कौरव ही सफलमनोरथ हुए। न हमारी जीत हुई, न उनकी। उन्होंने न तो इस पृथ्वीका उपभोग किया, न स्त्रियोंका सुख देखा और न गीतवाद्यका ही आनन्द लिया ॥ २४ ॥
नामात्यसुहृदां वाक्यं न च श्रुतवतां श्रुतम् । न रत्नानि परार्घ्यानि न भूर्न द्रविणागमः ॥ २५ ॥ मन्त्रियों, सुहृदों तथा वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता विद्वानोंकी भी बातें वे नहीं सुन सके। बहुमूल्य रत्न, पृथ्वीके राज्य तथा धनकी आयका भी सुख भोगनेका उन्हें अवसर नहीं मिला ॥ २५ ॥
अस्मद्वेषेण संतप्तः सुखं न स्मेह विन्दति । ऋद्धिमस्मासु तां दृष्ट्वा विवर्णो हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ दुर्योधन हमसे द्वेष रखनेके कारण सदा संतप्त रहकर कभी यहाँ सुख नहीं पाता था। हमलोगोंके पास वैसी समृद्धि देखकर उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वह चिन्तासे सूखकर पीला और दुर्बल हो गया था ॥
धृतराष्ट्रश्च नृपतिः सौबलेन निवेदितः । तं पिता पुत्रगृद्धित्वादनुमेनेऽनये स्थितः ॥ २७ ॥ अनपेक्ष्यैव पितरं गाङ्गेयं विदुरं तथा । सुबलपुत्र शकुनिने राजा धृतराष्ट्रको दुर्योधनकी यह अवस्था सूचित की। पुत्रके प्रति अधिक आसक्त होनेके कारण पिता धृतराष्ट्रने अन्यायमें स्थित हो उसकी इच्छाका अनुमोदन किया। इस विषयमें उन्होंने अपने पिता (ताऊ) गंगानन्दन भीष्म तथा भाई विदुरसे राय लेनेकी भी इच्छा नहीं की ॥ २७ १/२ ॥
असंशयं क्षयं राजा यथैवाहं तथा गतः ॥ २८ ॥ उनकी इसी दुर्नीतिके कारण निःसंदेह राजा धृतराष्ट्रको भी वैसा ही विनाश प्राप्त हुआ है, जैसा कि मुझे ॥ २८ ॥
अनियम्याशुचिं लुब्धं पुत्रं कामवशानुगम् । यशसः पतितो दीप्ताद् घातयित्वा सहोदरान् ॥ २९ ॥
वे अपने अपवित्र आचार-विचारवाले, लोभी एवं कामासक्त पुत्रको काबूमें न रखनेके कारण उसका तथा उसके सहोदर भाइयोंका वध करवाकर स्वयं भी उज्ज्वल यशसे भ्रष्ट हो गये ॥ २९ ॥ इमौ हि वृद्धौ शोकाग्नौ प्रक्षिप्य स सुयोधनः । अस्मत्प्रद्वेषसंयुक्तः पापबुद्धिः सदैव ह ॥ ३० ॥ हमलोगोंके प्रति सदा द्वेष रखनेवाला पापबुद्धि दुर्योधन इन दोनों वृद्धोंको शोककी आगमें झोंककर चला गया ॥ ३० ॥ को हि बन्धुः कुलीनः संस्तथा ब्रूयात् सुहृज्जने । यथासाववदद् वाक्यं युयुत्सुः कृष्णसंनिधौ ॥ ३१ ॥ संधिके लिये गये हुए श्रीकृष्णके समीप युद्धकी इच्छावाले दुर्योधनने जैसी बात कही थी, वैसी कौन भाई-बन्धु कुलीन होकर भी अपने सुहृदोंके लिये कह सकता है? ॥ ३१ ॥ आत्मनो हि वयं दोषाद् विनष्टाः शाश्वतीः समाः । प्रदहन्तो दिशः सर्वा भास्वरा इव तेजसा ॥ ३२ ॥ हमलोगोंने तेजसे प्रकाशित होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें मानो आग लगा दी और अपने ही दोषसे सदाके लिये नष्ट हो गये ॥ ३२ ॥ सोऽस्माकं वैरपुरुषो दुर्मतिः प्रग्रहं गतः । दुर्योधनकृते ह्येतत् कुलं नो विनिपातितम् ॥ ३३ ॥ हमारे प्रति शत्रुताका मूर्तिमान् स्वरूप वह दुर्बुद्धि दुर्योधन पूर्णतः बन्धनमें बँध गया। दुर्योधनके कारण ही हमारे इस कुलका पतन हो गया ॥ ३३ ॥ अवध्यानां वधं कृत्वा लोके प्राप्ताः स्म वाच्यताम् । कुलस्यास्यान्तकरणं दुर्मतिं पापपूरुषम् ॥ ३४ ॥ राजा राष्ट्रेश्वरं कृत्वा धृतराष्ट्रोऽद्य शोचति । हमलोग अवध्य नरेशोंका वध करके संसारमें निन्दाके पात्र हो गये। राजा धृतराष्ट्र इस कुलका विनाश करनेवाले दुर्बुद्धि एवं पापात्मा दुर्योधनको इस राष्ट्रका स्वामी बनाकर आज शोककी आगमें जल रहे हैं ॥ ३४ १/२ ॥ हताः शूराः कृतं पापं विषयः स्वो विनाशितः ॥ ३५ ॥ हत्वा नो विगतो मन्युः शोको मां रुन्धयत्ययम् । हमने शूरवीरोंको मारा, पाप किया और अपने ही देशका विनाश कर डाला। शत्रुओंको मारकर हमारा क्रोध तो दूर हो गया, परंतु यह शोक मुझे निरन्तर घेरे रहता है ॥ ३५ १/२ ॥ धनंजय कृतं पापं कल्याणेनोपहन्यते ॥ ३६ ॥ ख्यापनेनानुतापेन दानेन तपसापि वा । धनंजय! किया हुआ पाप कहनेसे, शुभ कर्म करनेसे, पछतानेसे, दान करनेसे और तपस्यासे भी नष्ट होता है ॥ ३६ १/२ ॥
निवृत्त्या तीर्थगमनाच्छ्रुतिस्मृतिजपेन वा ॥ ३७ ॥ त्यागवांश्च पुनः पापं नालंकर्तुमिति श्रुतिः । त्यागवाञ्जन्ममरणे नाप्नोतीति श्रुतिर्यदा ॥ ३८ ॥ निवृत्तिपरायण होने, तीर्थयात्रा करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय एवं जप करनेसे भी पाप दूर होता है। श्रुतिका कथन है कि त्यागी पुरुष पाप नहीं कर सकता तथा वह जन्म और मरणके बन्धनमें भी नहीं पड़ता ।।
प्राप्तवर्त्मा कृतमतिर्ब्रह्म सम्पद्यते तदा । स धनंजय निर्द्वन्द्वो मुनिर्ज्ञानसमन्वितः ॥ ३९ ॥ धनंजय! उसे मोक्षका मार्ग मिल जाता है और वह ज्ञानी एवं स्थिर-बुद्धि मुनि द्वन्द्वरहित होकर तत्काल ब्रह्म-साक्षात्कार कर लेता है ॥ ३९ ॥
वनमामन्त्र्य वः सर्वान् गमिष्यामि परंतप । न हि कृत्स्नतमो धर्मः शक्यः प्राप्तुमिति श्रुतिः ॥ ४० ॥ परिग्रहवता तन्मे प्रत्यक्षमरिसूदन । शत्रुओंको तपानेवाले अर्जुन! मैं तुम सब लोगोंसे बिदा लेकर वनमें चला जाऊँगा। शत्रुसूदन! श्रुति कहती है कि 'संग्रह-परिग्रहमें फँसा हुआ मनुष्य पूर्णतम धर्म (परमात्माका दर्शन) नहीं प्राप्त कर सकता।' इसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है ॥ ४० १/२ ॥
मया निसृष्टं पापं हि परिग्रहमभीप्सता ॥ ४१ ॥ जन्मक्षयनिमित्तं च प्राप्तुं शक्यमिति श्रुतिः । मैंने परिग्रह (राज्य और धनके संग्रह) की इच्छा रखकर केवल पाप बटोरा है, जो जन्म और मृत्युका मुख्य कारण है। श्रुतिका कथन है कि 'परिग्रहसे पाप ही प्राप्त हो सकता है' ॥ ४१ १/२ ॥
स परिग्रहमुत्सृज्य कृत्स्नं राज्यं सुखानि च ॥ ४२ ॥ गमिष्यामि विनिर्मुक्तो विशोको निर्ममः क्वचित् । अतः मैं परिग्रह छोड़कर सारे राज्य और इसके सुखोंको लात मारकर बन्धनमुक्त हो शोक और ममतासे ऊपर उठकर, कहीं वनमें चला जाऊँगा ॥ ४२ १/२ ॥
प्रशाधि त्वमिमामुर्वीं क्षेमां निहतकण्टकाम् ॥ ४३ ॥ न ममार्थोऽस्ति राज्येन भोगैर्वा कुरुनन्दन । कुरुनन्दन! तुम इस निष्कण्टक एवं कुशल-क्षेमसे युक्त पृथ्वीका शासन करो। मुझे राज्य और भोगोंसे कोई मतलब नहीं है ॥ ४३ १/२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं कुरुराजो युधिष्ठिरः । उपारमत् ततः पार्थः कनीयानभ्यभाषत ॥ ४४ ॥ इतना कहकर कुरुराज युधिष्ठिर चुप हो गये। तब कुन्तीके सबसे छोटे पुत्र अर्जुनने भाषण देना आरम्भ किया ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरपरिदेवनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका खेदपूर्ण उद्गार नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अर्जुनका युधिष्ठिरके मतका निराकरण करते हुए उन्हें धनकी महत्ता बताना और राजधर्मके पालनके लिये जोर देते हुए यज्ञानुष्ठानके लिये प्रेरित करना
वैशम्पायन उवाच
अथार्जुन उवाचेदमधिक्षिप्त इवाक्षमी ।
अभिनीततरं वाक्यं दृढवादपराक्रमः ॥ १ ॥
दर्शयन्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः ।
स्मयमानो महातेजाः सृक्किणी परिसंलिहन् ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर अर्जुन इस प्रकार असहिष्णु हो उठे, मानो उनपर कोई आक्षेप किया गया हो। वे बातचीत करने या पराक्रम दिखानेमें किसीसे दबनेवाले नहीं थे। उनका पराक्रम बड़ा भयंकर था। वे महातेजस्वी इन्द्रकुमार अपने उग्ररूपका परिचय देते और दोनों गलफरोंको चाटते हुए मुसकराकर इस तरह गर्वयुक्त वचन बोलने लगे, जैसे नाटकके रंगमंचपर अभिनय कर रहे हों ॥ १-२ ॥
अर्जुन उवाच
अहो दुःखमहो कृच्छ्रमहो वैक्लव्यमुत्तमम् ।
यत् कृत्वामानुषं कर्म त्यजेथाः श्रियमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
**अर्जुनने कहा—**राजन्! यह तो बड़े भारी दुःख और महान् कष्टकी बात है। आपकी विह्वलता तो पराकाष्ठाको पहुँच गयी। आश्चर्य है कि आप अलौकिक पराक्रम करके प्राप्त की हुई इस उत्तम राजलक्ष्मीका परित्याग कर रहे हैं ॥ ३ ॥
शत्रून् हत्वा महीं लब्ध्वा स्वधर्मेणोपपादिताम् ।
एवंविधं कथं सर्वं त्यजेथा बुद्धिलाघवात् ॥ ४ ॥
आपने शत्रुओंका संहार करके इस पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया है। यह राज्यलक्ष्मी आपको अपने धर्मके अनुसार प्राप्त हुई है। इस प्रकार जो यह सब कुछ आपके हाथमें आया है, इसे आप अपनी अल्पबुद्धिके कारण क्यों छोड़ रहे हैं? ॥ ४ ॥
क्लीबस्य हि कुतो राज्यं दीर्घसूत्रस्य वा पुनः ।
किमर्थं च महीपालानवधीः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ५ ॥
किसी कायर या आलसीको कैसे राज्य प्राप्त हो सकता है? यदि आपको यही करना था तो किसलिये क्रोधसे विकल होकर इतने राजाओंका वध किया और कराया? ॥ ५ ॥
यो ह्याजिजीविषेद् भैक्ष्यं कर्मणा नैव कस्यचित् । समारम्भान् बुभूषेत हतस्वस्तिरकिंचनः । सर्वलोकेषु विख्यातो न पुत्रपशुसंहितः ॥ ६ ॥ जिसके कल्याणका साधन नष्ट हो गया है, जो निरा दरिद्र है, जिसकी संसारमें कोई ख्याति नहीं है, जो स्त्री-पुत्र और पशु आदिसे सम्पन्न नहीं है तथा जो असमर्थतावश अपने पराक्रमसे किसीके राज्य या धनको लेनेकी इच्छा नहीं कर सकता, उसी मनुष्यको भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करनेकी अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ६ ॥ कापालीं नृप पापिष्ठां वृत्तिमासाद्य जीवतः । संत्यज्य राज्यमृद्धं ते लोकोऽयं किं वदिष्यति ॥ ७ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
शोकाकुल युधिष्ठिरकी देवर्षि नारदके द्वारा सान्त्वना
गीताप्रेस, गोरखपुर
महाभारतकी समाप्तिपर महाराज युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें प्रवेश
गीताप्रेस, गोरखपुर
कपोतके द्वारा व्याधका आतिथ्य-सत्कार
गीताप्रेस, गोरखपुर
कौशिक ब्राह्मणको सावित्रीदेवीका प्रत्यक्ष दर्शन
गीताप्रेस, गोरखपुर
वैश्य तुलाधारके द्वारा मुनि जाजलिका सत्कार
गीताप्रेस, गोरखपुर
नारदजीको भगवान्के विश्वरूपका दर्शन
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् हयग्रीव वेदोंको रसातलसे लाकर ब्रह्माजीको लौटा रहे हैं
गीताप्रेस, गोरखपुर
इन्द्रकी ब्राह्मणवेषमें दैत्यराज प्रह्लादसे भेंट
नरेश्वर! जब आप यह समृद्धिशाली राज्य छोड़कर हाथमें खपड़ा लिये घर-घर भीख माँगनेकी नीचातिनीच वृत्तिका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करने लगेंगे, तब लोग आपको क्या कहेंगे? ।। ७ ।।
सर्वारम्भान् समुत्सृज्य हतस्वस्तिरकिंचनः ।
कस्मादाशंससे भैक्ष्यं कर्तुं प्राकृतवत् प्रभो ॥ ८ ॥
प्रभो! आप सारे उद्योग छोड़कर कल्याणके साधनोंसे हीन और अकिंचन हुए साधारण पुरुषोंके समान भीख माँगनेकी इच्छा क्यों करते हैं? ।। ८ ।।
अस्मिन् राजकुले जातो जित्वा कृत्स्नां वसुंधराम् ।
धर्मार्थावखिलौ हित्वा वनं मौढ्यात् प्रतिष्ठसे ॥ ९ ॥
इस राजकुलमें जन्म लेकर सारे भूमण्डलपर विजय प्राप्त करके अब सम्पूर्ण धर्म और अर्थ दोनोंको छोड़कर आप मोहके कारण ही वनमें जानेको उद्यत हुए हैं ।। ९ ।।
यदिमानि हवींषीह विमथिष्यन्त्यसाधवः ।
भवता विप्रहीणानि प्राप्तं त्वामेव किल्बिषम् ॥ १० ॥
यदि आपके त्याग देनेपर यज्ञकी इन संचित सामग्रियोंको दुष्ट लोग नष्ट कर देंगे तो इसका पाप आपको ही लगेगा (अर्थात् आपने यज्ञ-याग छोड़ दिये हैं, अतः आपको आदर्श मानकर दूसरे लोग भी इस कर्मसे उदासीन हो जायँगे, उस दशामें इस धर्मकृत्यका उच्छेद हो जायगा और इसका दोष आपके सिर ही लगेगा) ।। १० ।।
आकिंचन्यं मुनीनां च इति वै नहुषोऽब्रवीत् ।
कृत्वा नृशंसं ह्यधने धिगस्त्वधनतामिह ॥ ११ ॥
राजा नहुषने निर्धनावस्थामें क्रूरतापूर्ण कर्म करके यह दुःखपूर्ण उद्गार प्रकट किया था कि 'इस जगत्में निर्धनताको धिक्कार है! सर्वस्व त्यागकर निर्धन या अकिंचन हो जाना यह मुनियोंका ही धर्म है, राजाओंका नहीं' ।।
अश्वस्तनमृषीणां हि विद्यते वेद तद् भवान् ।
यं त्विमं धर्ममित्याहुर्धनादेष प्रवर्तते ॥ १२ ॥
आप भी इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि दूसरे दिनके लिये संग्रह न करके प्रतिदिन माँगकर खाना यह ऋषि-मुनियोंका ही धर्म है। जिसे राजाओंका धर्म कहा गया है, वह तो धनसे ही सम्पन्न होता है ।। १२ ।।
धर्मं संहरते तस्य धनं हरति यस्य सः ।
ह्रियमाणे धने राजन् वयं कस्य क्षमेमहि ॥ १३ ॥
राजन्! जो मनुष्य जिसका धन हर लेता है, वह उसके धर्मका भी संहार कर देता है। यदि हमारे धनका अपहरण होने लगे तो हम किसको और कैसे क्षमा कर सकते हैं? ।। १३ ।।
अभिशस्तं प्रपश्यन्ति दरिद्रं पार्श्वतः स्थितम् ।