भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस—ये सबके सब यज्ञका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं; परंतु जहाँ कोई राजा नहीं है, उस राज्यमें यज्ञ नहीं होता है ॥ २० १/२ ॥

इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा ॥ २१ ॥
राजन्यैवास्य धर्मस्य योगक्षेमः प्रतिष्ठितः ।
देवता और पितर भी इस मर्त्यलोकसे ही दिये गये यज्ञ और श्राद्धसे जीवन यापन करते हैं। अतः इस धर्मका योगक्षेम राजापर ही अवलम्बित है ॥ २१ १/२ ॥

छायायामप्सु वायौ च सुखमुष्णेऽधिगच्छति ॥ २२ ॥
अग्नौ वाससि सूर्ये च सुखं शीतेऽधिगच्छति ।
जब गर्मी पड़ती है, उस समय मनुष्य छायामें, जलमें और वायुमें सुखका अनुभव करता है। इसी प्रकार सर्दी पड़नेपर अग्नि और सूर्यके तापसे तथा कपड़ा ओढ़नेसे उसे सुख मिलता है (परंतु अराजकताका भय उपस्थित होनेपर मनुष्यको कहीं किसी वस्तुसे भी सुख प्राप्त नहीं होता है) ॥ २२ १/२ ॥

शब्दे स्पर्शे रसे रूपे गन्धे च रमते मनः ॥ २३ ॥
तेषु भोगेषु सर्वेषु न भीतो लभते सुखम् ।
अभयस्य हि यो दाता तस्यैव सुमहत् फलम् ।
न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २४ ॥
साधारण अवस्थामें प्रत्येक मनुष्यका मन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धमें आनन्दका अनुभव करता है; परंतु भयभीत मनुष्यको उन सभी भोगोंमें कोई सुख नहीं मिलता है, इसलिये जो अभयदान करनेवाला है, उसीको महान् फलकी प्राप्ति होती है; क्योंकि तीनों लोकोंमें प्राणदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है ॥

इन्द्रो राजा यमो राजा धर्मो राजा तथैव च ।
राजा बिभर्ति रूपाणि राज्ञा सर्वमिदं धृतम् ॥ २५ ॥
राजा इन्द्र है, राजा यमराज है तथा राजा ही धर्मराज है। राजा अनेक रूप धारण करता है और राजाने ही इस सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥


* यस्या म्रियते कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ (मनु० ९।६९)