महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंरखनेवाले वृत्तान्त हों, वे सब राजाको बतावे ॥ गीतनृत्ताधिकारेषु सम्मतेषु महीपतेः । कर्तव्यं करणीयं वै वैश्वदेवबलिस्तथा ॥ राजाको प्रिय लगनेवाले जो गीत और नृत्यसम्बन्धी कार्य हों, उनमें करनेयोग्य कर्तव्यका पुरोहित निर्देश करे, बलिवैश्वदेवकर्मका सम्पादन करे ॥ नक्षत्रस्यानुकूल्येन यः संजातो नरेश्वरः । राजशास्त्रविनीतश्च श्रेयान् राज्ञः पुरोहितः ॥ जो राजा अनुकूल नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है तथा राजशास्त्रकी पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर चुका है, उससे भी श्रेष्ठ उसका पुरोहित होना चाहिये ॥ अथान्यानां निमित्तानामुत्पातानामथार्थवित् ॥ शत्रुपक्षक्षयज्ञश्च श्रेयान् सज्ञः पुरोहितः ।) जो भिन्न-भिन्न प्रकारके निमित्तों और उत्पातोंका रहस्य जानता हो तथा शत्रुपक्षके विनाशकी प्रणालीका भी जानकार हो, ऐसा श्रेष्ठतम पुरुष राजाका पुरोहित होना चाहिये ॥ उभौ प्रजा वर्धयतो देवान् सर्वान् सुतान् पितॄन् । भवेयातां स्थितौ धर्मे श्रद्धेयौ सुतपस्विनौ ॥ ३ ॥ परस्परस्य सुहृदौ विहितौ समचेतसौ । ब्रह्मक्षत्रस्य सम्मानात् प्रजा सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ यदि राजा और पुरोहित धर्मनिष्ठ, श्रद्धेय तथा तपस्वी हों, एक-दूसरेके प्रति सौहार्द रखते हों और समान हृदयवाले हों तो वे दोनों मिलकर प्रजाकी वृद्धि करते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं एवं पितरोंको तृप्त करके पुत्र और प्रजावर्गको भी अभ्युदयशील बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण (पुरोहित) और क्षत्रिय (राजा) का सम्मान करनेसे प्रजाको सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ३-४ ॥ विमाननात् तयोरेव प्रजा नश्येयुरेव हि । ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वेषां वर्णानां मूलमुच्यते ॥ ५ ॥ उन दोनोंका अनादर करनेसे प्रजाका विनाश ही होता है, क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय सभी वर्णोंके मूल कहे जाते हैं ॥ ५ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऐलकश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ६ ॥ इस विषयमें राजा पुरूरवा और महर्षि कश्यपके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। युधिष्ठिर! तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥
ऐल उवाच
यदा हि ब्रह्म प्रजहाति क्षत्रं