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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

रखनेवाले वृत्तान्त हों, वे सब राजाको बतावे ॥ गीतनृत्ताधिकारेषु सम्मतेषु महीपतेः । कर्तव्यं करणीयं वै वैश्वदेवबलिस्तथा ॥ राजाको प्रिय लगनेवाले जो गीत और नृत्यसम्बन्धी कार्य हों, उनमें करनेयोग्य कर्तव्यका पुरोहित निर्देश करे, बलिवैश्वदेवकर्मका सम्पादन करे ॥ नक्षत्रस्यानुकूल्येन यः संजातो नरेश्वरः । राजशास्त्रविनीतश्च श्रेयान् राज्ञः पुरोहितः ॥ जो राजा अनुकूल नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है तथा राजशास्त्रकी पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर चुका है, उससे भी श्रेष्ठ उसका पुरोहित होना चाहिये ॥ अथान्यानां निमित्तानामुत्पातानामथार्थवित् ॥ शत्रुपक्षक्षयज्ञश्च श्रेयान् सज्ञः पुरोहितः ।) जो भिन्न-भिन्न प्रकारके निमित्तों और उत्पातोंका रहस्य जानता हो तथा शत्रुपक्षके विनाशकी प्रणालीका भी जानकार हो, ऐसा श्रेष्ठतम पुरुष राजाका पुरोहित होना चाहिये ॥ उभौ प्रजा वर्धयतो देवान् सर्वान् सुतान् पितॄन् । भवेयातां स्थितौ धर्मे श्रद्धेयौ सुतपस्विनौ ॥ ३ ॥ परस्परस्य सुहृदौ विहितौ समचेतसौ । ब्रह्मक्षत्रस्य सम्मानात् प्रजा सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ यदि राजा और पुरोहित धर्मनिष्ठ, श्रद्धेय तथा तपस्वी हों, एक-दूसरेके प्रति सौहार्द रखते हों और समान हृदयवाले हों तो वे दोनों मिलकर प्रजाकी वृद्धि करते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं एवं पितरोंको तृप्त करके पुत्र और प्रजावर्गको भी अभ्युदयशील बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण (पुरोहित) और क्षत्रिय (राजा) का सम्मान करनेसे प्रजाको सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ३-४ ॥ विमाननात् तयोरेव प्रजा नश्येयुरेव हि । ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वेषां वर्णानां मूलमुच्यते ॥ ५ ॥ उन दोनोंका अनादर करनेसे प्रजाका विनाश ही होता है, क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय सभी वर्णोंके मूल कहे जाते हैं ॥ ५ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऐलकश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ६ ॥ इस विषयमें राजा पुरूरवा और महर्षि कश्यपके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। युधिष्ठिर! तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥

ऐल उवाच

यदा हि ब्रह्म प्रजहाति क्षत्रं

क्षत्रं यदा वा प्रजहाति ब्रह्म । अन्वग्बलं कतमेऽस्मिन् भजन्ते तथा वर्णाः कतमेऽस्मिन् ध्रियन्ते ॥ ७ ॥ पुरूरवाने पूछा—महर्षे! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों साथ रहकर ही सबल होते हैं; परंतु जब ब्राह्मण (पुरोहित) किसी कारणसे क्षत्रियको छोड़ देता है अथवा जब राजा ब्राह्मणका परित्याग कर देता है, तब अन्य वर्णके लोग इन दोनोंमेंसे किसका आश्रय ग्रहण करते हैं? तथा दोनोंमेंसे कौन सबको आश्रय देता है? ॥

कश्यप उवाच

विद्धं राष्ट्रं क्षत्रियस्य भवति ब्रह्म क्षत्रं यत्र विरुद्ध्यतीह । अन्वग्बलं दस्यवस्तद् भजन्ते तथा वर्णं तत्र विदन्ति सन्तः ॥ ८ ॥ कश्यपने कहा—राजन्! श्रेष्ठ पुरुष इस बातको जानते हैं कि संसारमें जहाँ ब्राह्मण क्षत्रियसे विरोध करता है, वहाँ क्षत्रियका राज्य छिन्न-भिन्न हो जाता है और लुटेरे दल-बलके साथ आकर उसपर अधिकार जमा लेते हैं तथा वहाँ निवास करनेवाले सभी वर्णके लोगोंको अपने अधीन कर लेते हैं ॥ ८ ॥

नैषां ब्रह्म च वर्धते नोत पुत्रा न गर्गरो मथ्यते नो यजन्ते । नैषां पुत्रा वेदमधीयते च यदा ब्रह्म क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥ ९ ॥ जब क्षत्रिय ब्राह्मणको त्याग देते हैं, तब उनका वेदाध्ययन आगे नहीं बढ़ता, उनके पुत्रोंकी भी वृद्धि नहीं होती, उनके यहाँ दही-दूधका मटका नहीं मथा जाता और न वे यज्ञ ही कर पाते हैं। इतना ही नहीं, उन ब्राह्मणोंके पुत्रोंका वेदाध्ययन भी नहीं हो पाता ॥ ९ ॥

नैषामर्थो वर्धते जातु गेहे नाधीयते सुप्रजा नो यजन्ते । अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति ये ब्राह्मणान् क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥ १० ॥ जो क्षत्रिय ब्राह्मणोंको त्याग देते हैं, उनके घरमें कभी धनकी वृद्धि नहीं होती। उनकी संतानें न तो पढ़ती हैं और न यज्ञ ही करती हैं। वे पदभ्रष्ट होकर डाकुओंकी भाँति लूटपाट करने लगते हैं ॥ १० ॥

एतौ हि नित्यं संयुक्तावितरेतरधारणे । क्षत्रं वै ब्रह्मणो योनिर्योनिः क्षत्रस्य वै द्विजाः ॥ ११ ॥

वे दोनों ब्राह्मण और क्षत्रिय सदा एक-दूसरेसे मिलकर रहें, तभी वे एक-दूसरेकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं। ब्राह्मणकी उन्नतिका आधार क्षत्रिय होता है और क्षत्रियकी उन्नतिका आधार ब्राह्मण ॥ ११ ॥

उभावेतौ नित्यमभिप्रपन्नौ
सम्प्राप्तुमर्हतीं सम्प्रतिष्ठाम् ।
तयोः संधिर्भिद्यते चेत् पुराण-
स्ततः सर्वं भवति हि सम्प्रमूढम् ॥ १२ ॥
ये दोनों जातियाँ जब सदा एक-दूसरेके आश्रित होकर रहती हैं, तब बड़ी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त करती हैं और यदि इनकी प्राचीन कालसे चली आती हुई मैत्री टूट जाती है, तो सारा जगत् मोहग्रस्त एवं किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है ॥ १२ ॥

नात्र पारं लभते पारगामी
महागाधे नौरिव सम्प्रपन्ना ।
चातुर्वर्ण्यं भवति हि सम्प्रमूढं
प्रजास्ततः क्षयसंस्था भवन्ति ॥ १३ ॥
जैसे महान् एवं अगाध समुद्रमें टूटी हुई नौका पार नहीं पहुँच पाती, उसी प्रकार उस अवस्थामें मनुष्य अपनी जीवनयात्राको कुशलपूर्वक पूर्ण नहीं कर पाते हैं। चारों वर्णोंकी प्रजापर मोह छा जाता है और वह नष्ट होने लगती है ॥ १३ ॥

ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति ।
अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापं च वर्षति ॥ १४ ॥
ब्राह्मणरूपी वृक्षकी यदि रक्षा की जाती है तो वह मधुर सुख और सुवर्णकी वर्षा करता है और यदि उसकी रक्षा नहीं की गयी तो उससे निरन्तर दुःखके आँसुओं और पापकी वृष्टि होती है ॥ १४ ॥

न ब्रह्मचारी चरणादपेतो
यदा ब्रह्म ब्रह्मणि त्राणमिच्छेत् ।
आश्चर्यतो वर्षति तत्र देव-
स्तत्राभीक्ष्णं दुःसहाश्चाविशन्ति ॥ १५ ॥
जहाँ ब्रह्मचारी ब्राह्मण लुटेरोंके उपद्रवसे विवश हो वेदकी शाखाके स्वाध्यायसे वञ्चित होता है और उसके लिये अपनी रक्षा चाहता है, वहाँ इन्द्रदेव यदि पानी बरसावें तो आश्चर्यकी ही बात है (वहाँ प्रायः वर्षा नहीं होती है) तथा महामारी और दुर्भिक्ष आदि दुःसह उपद्रव आ पहुँचते हैं ॥ १५ ॥

स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणं वापि पापः
सभायां यत्र लभतेऽनुवादम् ।
राज्ञः सकाशे न बिभेति चापि

ततो भयं विद्यते क्षत्रियस्य ॥ १६ ॥ जब पापात्मा मनुष्य किसी स्त्री अथवा ब्राह्मणकी हत्या करके लोगोंकी सभामें साधुवाद या प्रशंसा पाता है तथा राजाके निकट भी पापसे भय नहीं मानता, उस समय क्षत्रिय राजाके लिये बड़ा भारी भय उपस्थित होता है ॥ १६ ॥

पापैः पापे क्रियमाणे हि चैव ततो रुद्रो जायते देव एषः । पापैः पापाः संजनयन्ति रुद्रं ततः सर्वान् साध्वसाधून् हिनस्ति ॥ १७ ॥ इलानन्दन! जब बहुत-से पापी पापाचार करने लगते हैं, तब ये संहारकारी रुद्रदेव प्रकट हो जाते हैं। पापात्मा पुरुष अपने पापोंद्वारा ही रुद्रको प्रकट करते हैं; फिर वे रुद्रदेव साधु और असाधु सब लोगोंका संहार कर डालते हैं ॥ १७ ॥

ऐल उवाच

कुतो रुद्रः कीदृशो वापि रुद्रः सत्त्वैः सत्त्वं दृश्यते वध्यमानम् । एतत् सर्वं कश्यप मे प्रचक्ष्व कुतो रुद्रो जायते देव एषः ॥ १८ ॥ पुरूरवाने पूछा—कश्यपजी! ये रुद्रदेव कहाँसे आते हैं और कैसे हैं? इस जगत्में तो प्राणियोंद्वारा ही प्राणियोंका वध होता देखा जाता है; फिर ये रुद्रदेव किससे उत्पन्न होते हैं? ये सब बातें मुझे बताइये ॥ १८ ॥

कश्यप उवाच

आत्मा रुद्रो हृदये मानवानां स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति । वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहु- र्देवैर्जीमूतैः सदृशं रूपमस्य ॥ १९ ॥ कश्यपने कहा—राजन्! ये रुद्रदेव मनुष्योंके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं और समय आनेपर अपने तथा दूसरेके शरीरोंका नाश करते हैं। विद्वान् पुरुष रुद्रको उत्पात-वायु (तूफानी हवा) के समान वेगवान् कहते हैं और उनका रूप बादलोंके समान बताते हैं ॥ १९ ॥

ऐल उवाच

न वै वातः परिवृणोति कश्चि- न्न जीमूतो वर्षति नापि देवः ।

तथायुक्तो दृश्यते मानुषेषु
कामद्वेषाद् बध्यते मुह्यते च ॥ २० ॥
पुरूरवाने कहा— कोई भी हवा किसीको आवृत नहीं करती है, न अकेले मेघ ही पानी बरसाता है, रुद्रदेव भी वर्षा नहीं करते हैं। जैसे वायु और बादलको आकाशमें संयुक्त देखा जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंमें आत्मा मन, इन्द्रिय आदिसे संयुक्त ही देखा जाता है और वह राग द्वेषके कारण मोहग्रस्त होता है तथा मारा जाता है ॥ २० ॥

कश्यप उवाच

यथैकगेहे जातवेदाः प्रदीप्तः
कृत्स्नं ग्रामं दहते चत्वरं वा ।
विमोहनं कुरुते देव एष
ततः सर्वं स्पृश्यते पुण्यपापैः ॥ २१ ॥
कश्यपने कहा— जैसे एक घरमें लगी हुई आग प्रज्वलित हो आँगन तथा सारे गाँवको जला देती है, उसी प्रकार ये रुद्रदेव किसी एक प्राणीके भीतर विशेषरूपसे प्रकट हो दूसरोंके मनमें भी मोह उत्पन्न करते हैं; फिर सारे जगत्का पुण्य और पापसे सम्बन्ध हो जाता है ॥ २१ ॥

ऐल उवाच

यदि दण्डः स्पृशतेऽपुण्यपापं
पापैः पापे क्रियमाणे विशेषात् ।
कस्य हेतोः सुकृतं नाम कुर्याद्
दुष्कृतं वा कस्य हेतोर्न कुर्यात् ॥ २२ ॥
पुरूरवाने पूछा— यदि पापियोंद्वारा विशेषरूपसे पाप और पुण्यात्माओंद्वारा विशेषरूपसे पुण्य किये जानेपर पुण्य-पापसे रहित आत्माको भी दण्ड भोगना पड़ता है, तब किसलिये कोई पुण्य करे और किसलिये पाप न करे? ॥ २२ ॥

कश्यप उवाच

असंत्यागात् पापकृतामपापां-
स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् ।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा-
न्न मिश्रः स्यात् पापकृद्भिः कथंचित् ॥ २३ ॥
कश्यपने कहा— पापाचारियोंके संसर्गका त्याग न करनेसे पापहीन-धर्मात्मा पुरुषोंको भी उनसे मेल-जोल रखनेके कारण उनके समान ही दण्ड भोगना पड़ता है। ठीक उसी तरह, जैसे सूखी लकड़ियोंके साथ मिली होनेसे गीली लकड़ी भी जल जाती है। अतः

विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह पापियोंके साथ किसी तरह भी सम्पर्क न स्थापित करे ।। २३ ।।

ऐल उवाच

साध्वसाधून् धारयतीह भूमिः साध्वसाधूंस्तापयतीह सूर्यः । साध्वसाधूंश्चापि वातीह वायु- रापस्तथा साध्वसाधून् पुनन्ति ॥ २४ ॥ पुरूरवा बोले—इस जगत्में पृथिवी तो पापियों और पुण्यात्माओंको समान रूपसे धारण करती है। सूर्य भी भले-बुरोंको एक-सा ही संताप देते हैं। वायु साधु और दुष्ट दोनोंका स्पर्श करती है और जल पापी एवं पुण्यात्मा दोनोंको पवित्र करता है ।। २४ ।।

कश्यप उवाच

एवमस्मिन् वर्तते लोक एव नामुत्रैवं वर्तते राजपुत्र । प्रेत्यैतयोरन्तरावान् विशेषो यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम् ॥ २५ ॥ कश्यपने कहा—राजकुमार! इस लोकमें ही ऐसी बात देखी जाती है, परलोकमें इस प्रकारका बर्ताव नहीं है। जो पुण्य करता है वह और जो पाप करता है वह—दोनों जब मृत्युके पश्चात् परलोकमें जाते हैं तो वहाँ उन दोनोंकी स्थितिमें बड़ा भारी अन्तर हो जाता है ।। २५ ।।

पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चि- र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः । तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥ २६ ॥ पुण्यात्माका लोक मधुरतम सुखसे भरा होता है। वहाँ घीके चिराग जलते हैं। उसमें सुवर्णके समान प्रकाश फैला रहता है। वहाँ अमृतका केन्द्र होता है। उस लोकमें न तो मृत्यु है, न बुढ़ापा है और न दूसरा ही कोई दुःख है। ब्रह्मचारी पुरुष मृत्युके पश्चात् उसी स्वर्गादि लोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करता है ।। २६ ।।

पापस्य लोको निरयोऽप्रकाशो नित्यं दुःखं शोकभूयिष्ठमेव । तत्रात्मानं शोचति पापकर्म बह्वीः समाः प्रतपन्नप्रतिष्ठः ॥ २७ ॥

पापीका लोक नरक है, जहाँ सदा अँधेरा छाया रहता है। वहाँ प्रतिदिन दुःख तथा अधिक-से-अधिक शोक होता है। पापात्मा पुरुष वहाँ बहुत वर्षोंतक कष्ट भोगता हुआ कभी एक स्थानपर स्थिर नहीं रहता और निरन्तर अपने लिये शोक करता रहता है॥ २७॥

मिथोभेदाद् ब्राह्मणक्षत्रियाणां प्रजा दुःखं दुःसहं चाविशन्ति। एवं ज्ञात्वा कार्य एवेह नित्यं पुरोहितो नैकविद्यो नृपेण॥ २८॥

ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें परस्पर फूट होनेसे प्रजाको दुःसह दुःख उठाना पड़ता है। इन सब बातोंको समझ-बूझकर राजाको चाहिये कि वह सदाके लिये एक सदाचारी बहुज्ञ पुरोहित बना ही ले॥ २८॥

तं चैवान्वभिषिच्येत तथा धर्मो विधीयते। अग्र्यो हि ब्राह्मणः प्रोक्तः सर्वस्यैवेह धर्मतः॥ २९॥

राजा पहले पुरोहितका वरण कर ले। उसके बाद अपना अभिषेक करावे। ऐसा करनेसे ही धर्मका पालन होता है; क्योंकि धर्मके अनुसार ब्राह्मण यहाँ सबसे श्रेष्ठ बताया गया है॥ २९॥

पूर्वं हि ब्रह्मणः सृष्टिरिति ब्रह्मविदो विदुः। ज्येष्ठेनाभिजनेनास्य प्राप्तं पूर्वं यदुत्तरम्॥ ३०॥

वेदवेत्ता विद्वानोंका यह मत है कि सबसे पहले ब्राह्मणकी ही सृष्टि हुई है; अतः ज्येष्ठ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेके कारण प्रत्येक उत्कृष्ट वस्तुपर सबसे पहले ब्राह्मणका ही अधिकार होता है॥ ३०॥

तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक्। सर्वं श्रेष्ठं विशिष्टं च निवेद्यं तस्य धर्मतः॥ ३१॥ अवश्यमेव कर्तव्यं राज्ञा बलवतापि हि।

इसलिये ब्राह्मण सब वर्णोंका सम्माननीय और पूजनीय है। वही भोजनके लिये प्रस्तुत की हुई सब वस्तुओंको सबसे पहले भोगनेका अधिकारी है। सभी श्रेष्ठ और उत्तम पदार्थोंको धर्मके अनुसार पहले ब्राह्मणकी सेवामें ही निवेदित करना चाहिये। बलवान् राजाको भी अवश्य ऐसा ही करना चाहिये॥ ३१ १/२॥

ब्रह्म वर्धयति क्षत्रं क्षत्रतो ब्रह्म वर्धते। एवं राज्ञा विशेषेण पूज्या वै ब्राह्मणाः सदा॥ ३२॥ (राज्ञः सर्वस्य चान्यस्य स्वामी राजपुरोहितः।)

ब्राह्मण क्षत्रियको बढ़ाता है और क्षत्रियसे ब्राह्मणकी उन्नति होती है। अतः राजाको विशेषरूपसे सदा ही ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि राजपुरोहित राजाका तथा

अन्य सब लोगोंका भी स्वामी है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऐलकश्यपसंवादे
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें पुरूरवा और कश्यपका संवादविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं।)

ब्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे लाभका प्रतिपादन करनेवाला मुचुकुन्दका उपाख्यान

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

ब्राह्मण और क्षत्रियके मेलसे लाभका प्रतिपादन करनेवाला मुचुकुन्दका उपाख्यान

भीष्म उवाच

योगक्षेमो हि राष्ट्रस्य राजन्यायत्त उच्यते ।
योगक्षेमो हि राज्ञो हि समायत्ततः पुरोहिते ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! राष्ट्रका योगक्षेम राजाके अधीन बताया जाता है; परंतु राजाका योगक्षेम पुरोहितके अधीन है ॥ १ ॥

यत्रादृष्टं भयं ब्रह्म प्रजानां शमयत्युत ।
दृष्टं च राजा बाहुभ्यां तद् राज्यं सुखमेधते ॥ २ ॥
जहाँ ब्राह्मण अपने तेजसे प्रजाके अदृष्ट भयका निवारण करता है और राजा अपने बाहुबलसे दृष्ट भयको दूर करता है, वह राज्य-सुखसे उत्तरोत्तर उन्नति करता है ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मुचुकुन्दस्य संवादं राज्ञो वैश्रवणस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें विज्ञ पुरुष मुचुकुन्द और राजा कुबेरके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

मुचुकुन्दो विजित्येमां पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
जिज्ञासमानः स्वबलमभ्ययादलकाधिपम् ॥ ४ ॥
कहते हैं, पृथिवीपति राजा मुचुकुन्दने इस पृथिवीको जीतकर अपने बलकी परीक्षा लेनेके लिये अलकापति कुबेरपर चढ़ाई की ॥ ४ ॥

ततो वैश्रवणो राजा राक्षसानसृजत् तदा ।
ते बलान्यवमृद्नन्त मुचुकुन्दस्य नैर्ऋताः ॥ ५ ॥
तब राजा कुबेरने उनका सामना करनेके लिये राक्षसोंकी सेना भेजी। उन राक्षसोंने मुचुकुन्दकी सेनाओंको कुचलना आरम्भ किया ॥ ५ ॥

स हन्यमाने सैन्ये स्वे मुचुकुन्दो नराधिपः ।
गर्हयामास विद्वांसं पुरोहितमरिंदमः ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी सेनाको मारी जाती देखकर शत्रुदमन राजा मुचुकुन्दने अपने विद्वान् पुरोहित वसिष्ठजीको इसके लिये उलाहना दिया ॥ ६ ॥

तत उग्रं तपस्तप्त्वा वसिष्ठो धर्मवित्तमः ।
रक्षांस्युपावधीत् तस्य पन्थानं चाप्यविन्दत ॥ ७ ॥

तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठजीने घोर तपस्या करके उन राक्षसोंका विनाश कर डाला और राजाके लिये विजय पानेका मार्ग प्राप्त कर लिया ॥ ७ ॥ ततो वैश्रवणो राजा मुचुकुन्दमदर्शयत् । वध्यमानेषु सैन्येषु वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ८ ॥ इसके बाद राजा कुबेरने, अपनी सेनाको मरते देखकर राजा मुचुकुन्दको दर्शन दिया और इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥

धनद उवाच

बलवन्तस्त्वया पूर्वे राजानः सपुरोहिताः । न चैवं समवर्तन्त यथा त्वमिह वर्तसे ॥ ९ ॥ **कुबेर बोले—**राजन्! पहले भी तुम्हारे समान बलवान् राजा हो चुके हैं और उन्हें भी पुरोहितोंकी सहायता प्राप्त थी, परंतु मेरे साथ यहाँ तुम जैसा बर्ताव कर रहे हो, वैसा किसीने नहीं किया था ॥ ९ ॥ ते खल्वपि कृतास्त्राश्च बलवन्तश्च भूमियाः । आगम्य पर्युपासन्ते मामीशं सुखदुःखयोः ॥ १० ॥ वे भूपाल भी अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा बलवान् थे और मुझे सुख एवं दुःख देनेमें समर्थ ईश्वर मानकर मेरे पास आते और मेरी उपासना करते थे ॥ १० ॥ यद्यस्ति बाहुवीर्यं ते तद् दर्शयितुमर्हसि । किं ब्राह्मणबलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्त्तसे ॥ ११ ॥ महाराज! यदि तुम्हारी भुजाओंमें कुछ बल है तो उसे दिखाओ। ब्राह्मणके बलपर इतना घमण्ड क्यों कर रहे हो? ॥ ११ ॥ मुचुकुन्दस्ततः क्रुद्धः प्रत्युवाच धनेश्वरम् । न्यायपूर्वमसंरब्धमसम्भ्रान्तमिदं वचः ॥ १२ ॥ यह सुनकर मुचुकुन्द कुपित हो उठे और धनाध्यक्ष कुबेरसे यह न्याययुक्त, रोषरहित तथा सम्भ्रमशून्य वचन बोले— ॥ १२ ॥ ब्रह्मक्षत्रमिदं सृष्टमेकयोनि स्वयम्भुवा । पृथग्बलविधानं तन्न लोकं परिपालयेत् ॥ १३ ॥ 'राजराज! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंकी उत्पत्तिका स्थान एक ही है। दोनोंको स्वयम्भू ब्रह्माजीने ही पैदा किया है। यदि उनका बल और प्रयत्न अलग-अलग हो जाय तो वे संसारकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ १३ ॥ तपो मन्त्रबलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् । अस्त्रबाहुबलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥ १४ ॥

‘ब्राह्मणोंमें सदा तप और मन्त्रका बल उपस्थित होता है और क्षत्रियोंमें अस्त्र तथा भुजाओंका ।। १४ ।।
ताभ्यां सम्भूय कर्तव्यं प्रजानां परिपालनम् ।
तथा च मां प्रवर्तन्तं किं गर्हस्यलकाधिप ।। १५ ।।
‘अलकापते! अतः ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको एक साथ मिलकर ही प्रजाका पालन करना चाहिये। मैं भी इसी नीतिके अनुसार कार्य कर रहा हूँ; फिर आप मेरी निन्दा क्यों करते हैं? ।। १५ ।।
ततोऽब्रवीद् वैश्रवणो राजानं सपुरोहितम् ।
नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद् विदधाम्युत ।। १६ ।।
नाच्छिन्दे चाप्यनिर्दिष्टमिति जानीहि पार्थिव ।
प्रशाधि पृथिवीं कृत्स्नां मद्दत्तामखिलामिमाम् ।
एवमुक्तः प्रत्युवाच मुचुकुन्दो महीपतिः ।। १७ ।।
तब कुबेरने पुरोहितसहित राजा मुचुकुन्दसे कहा—‘पृथ्वीपते! मैं ईश्वरकी आज्ञाके बिना न तो किसीको राज्य देता हूँ और न भगवान्‌की अनुमतिके बिना दूसरेका राज्य छीनता ही हूँ। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। यद्यपि ऐसी ही बात है तो भी आज मैं तुम्हें इस सारी पृथ्वीका राज्य दे रहा हूँ। तुम मेरी दी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करो’। उनके ऐसा कहनेपर राजा मुचुकुन्दने इस प्रकार उत्तर दिया ।। १६-१७ ।।

मुचुकुन्द उवाच
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव ।
बाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीयामिति कामये ।। १८ ।।
मुचुकुन्द बोले—राजाधिराज! मैं आपके दिये हुए राज्यको नहीं भोगना चाहता। मेरी तो यही इच्छा है कि मैं अपने बाहुबलसे उपार्जित राज्यका उपभोग करूँ ।। १८ ।।

भीष्म उवाच
ततो वैश्रवणो राजा विस्मयं परमं ययौ ।
क्षत्रधर्मे स्थितं दृष्ट्वा मुचुकुन्दमसम्भ्रमम् ।। १९ ।।
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजा मुचुकुन्दको बिना किसी घबराहटके इस प्रकार क्षत्रियधर्ममें स्थित हुआ देख कुबेरको बड़ा विस्मय हुआ ।। १९ ।।
ततो राजा मुचुकुन्दः सोऽन्वशासद् वसुन्धराम् ।
बाहुवीर्यार्जितां सम्यक्क्षत्रधर्ममनुव्रतः ।। २० ।।
तदनन्तर क्षत्रियधर्मका ठीक-ठीक पालन करनेवाले राजा मुचुकुन्दने अपने बाहुबलसे प्राप्त की हुई इस वसुधाका शासन किया ।। २० ।।
एवं यो धर्मविद् राजा ब्रह्मपूर्वं प्रवर्तते ।

जयत्यविजितामुर्वी यशश्च महदश्नुते ॥ २१ ॥
इस प्रकार जो धर्मज्ञ राजा पहले ब्राह्मणका आश्रय लेकर उसकी सहायतासे राज्यकार्यमें प्रवृत्त होता है, वह बिना जीती हुई पृथ्वीको भी जीतकर महान् यशका भागी होता है ॥ २१ ॥
नित्योदकी ब्राह्मणःस्यान्नित्यशस्त्रश्च क्षत्रियः ।
तयोर्हि सर्वमायत्तं यत् किञ्चिज्जगतीगतम् ॥ २२ ॥
ब्राह्मणको प्रतिदिन स्नान करके जलसम्बन्धी कृत्य—संध्या-वन्दन, तर्पण आदि कर्म करने चाहिये और क्षत्रियको सदा शस्त्रविद्याका अभ्यास बढ़ाना चाहिये। इस भूतलपर जो कोई भी वस्तु है, वह सब इन्हीं दोनोंके अधीन है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि मुचुकुन्दोपाख्याने
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मुचुकुन्दका
उपाख्यानविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुनः राज्यकी महिमा सुनाना

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

राजाके कर्तव्यका वर्णन, युधिष्ठिरका राज्यसे विरक्त होना एवं भीष्मजीका पुनः राज्यकी महिमा सुनाना

युधिष्ठिर उवाच

यया वृत्त्या महीपालो विवर्धयति मानवान् ।
पुण्यांश्च लोकान् जयति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! राजा जिस वृत्तिसे रहनेपर अपने प्रजाजनोंकी उन्नति करता है और स्वयं भी विशुद्ध लोकोंपर विजय प्राप्त कर लेता है, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

दानशीलो भवेद् राजा यज्ञशीलश्च भारत ।
उपवासतपःशीलः प्रजानां पालने रतः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! राजाको सदा ही दानशील, यज्ञशील, उपवास और तपस्यामें तत्पर एवं प्रजा-पालनमें संलग्न रहना चाहिये ॥ २ ॥

सर्वांश्चैव प्रजा नित्यं राजा धर्मेण पालयन् ।
उत्थानेन प्रदानेन पूजयेच्चापि धार्मिकान् ॥ ३ ॥
समस्त प्रजाओंका सदा धर्मपूर्वक पालन करनेवाले राजाको घरपर आये हुए धर्मात्मा पुरुषोंका खड़ा होकर स्वागत करना चाहिये और उत्तम वस्तुएँ देकर उनका आदर-सत्कार करना चाहिये ॥ ३ ॥

राज्ञा हि पूजितो धर्मस्ततः सर्वत्र पूज्यते ।
यद् यदाचरते राजा तत् प्रजानां स्म रोचते ॥ ४ ॥
राजाद्वारा जब जिस धर्मका आदर किया जाता है उसका फिर सर्वत्र आदर होने लगता है; क्योंकि राजा जो-जो कार्य करता है, प्रजावर्गको वही करना अच्छा लगता है ॥ ४ ॥

नित्यमुद्यतदण्डश्च भवेन्मृत्युर्िवारिषु ।
निहन्यात् सर्वतो दस्यून् न कामात् कस्यचित् क्षमेत् ॥ ५ ॥
राजाको चाहिये कि वह शत्रुओंको यमराजकी भाँति सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहे। वह डाकुओं और लुटेरोंको सब ओरसे पकड़कर मार डाले। स्वार्थवश किसी दुष्टके अपराधको क्षमा न करे ॥ ५ ॥

यं हि धर्मं चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः ।
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भारत विन्दति ॥ ६ ॥

भारत! राजाद्वारा सुरक्षित हुई प्रजा यहाँ जिस धर्मका आचरण करती है, उसका चौथा भाग राजाको भी मिल जाता है ॥ ६ ॥

यदधीते यद् ददाति यज्जुहोति यदर्चति । राजा चतुर्थभाक् तस्य प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ७ ॥ प्रजा जो स्वाध्याय, जो दान, जो होम और जो पूजन करती है, उन पुण्य कर्मोंका एक चौथाई भाग उस प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करनेवाला नरेश प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥

यद् राष्ट्रेऽकुशलं किञ्चिद् राज्ञोऽरक्षयतः प्रजाः । चतुर्थं तस्य पापस्य राजा भारत विन्दति ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! यदि राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता तो उसके राज्यमें प्रजा जो कुछ भी अशुभ कार्य करती है, उस पापकर्मका एक चौथाई भाग राजाको भोगना पड़ता है ॥ ८ ॥

अप्याहुः सर्वमेवेति भूयोऽर्धमिति निश्चयः । कर्मणः पृथिवीपाल नृशंसोऽनृतवागपि ॥ ९ ॥ पृथ्वीपते! कुछ लोगोंका मत है कि उपर्युक्त अवस्थामें राजाको पूरे पापका भागी होना पड़ता है, और कुछ लोगोंका यह निश्चय है कि उसको आधा पाप लगता है। ऐसा राजा क्रूर और मिथ्यावादी समझा जाता है ॥ ९ ॥

तादृशात् किल्बिषाद् राजा शृणु येन प्रमुच्यते । प्रत्याहर्तुमशक्यं स्याद् धनं चोरैर्हृतं यदि । तत् स्वकोशात् प्रदेयं स्यादशक्तेनोपजीवतः ॥ १० ॥ ऐसे पापसे राजाको किस उपायसे छुटकारा मिलता है, वह बताता हूँ, सुनो। चोरों या लुटेरोंने यदि किसीके धनका अपहरण कर लिया हो और राजा पता लगाकर उस धनको लौटा न सके तो उस असमर्थ नरेशको चाहिये कि वह अपने आश्रयमें रहनेवाले उस मनुष्यको उतना ही धन राजकीय खजानेसे दे दे ॥ १० ॥

सर्ववर्णैः सदा रक्ष्यं ब्रह्मस्वं ब्राह्मणा यथा । न स्थेयं विषये तेन योऽपकुर्याद् द्विजातिषु ॥ ११ ॥ सभी वर्णके लोगोंको ब्राह्मणोंके धनकी भी रक्षा उसी प्रकार करनी चाहिये जिस प्रकार स्वयं ब्राह्मणोंकी। जो ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचाता हो, उसे राजाको अपने राज्यमें नहीं रहने देना चाहिये ॥ ११ ॥

ब्रह्मस्वे रक्ष्यमाणे तु सर्वं भवति रक्षितम् । तस्मात् तेषां प्रसादेन कृतकृत्यो भवेन्नृपः ॥ १२ ॥ ब्राह्मणके धनकी रक्षा की जानेपर ही सब कुछ रक्षित हो जाता है; क्योंकि उन ब्राह्मणोंकी कृपासे राजा कृतार्थ हो जाता है ॥ १२ ॥

पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः । नरास्तमुपजीवन्ति नृपं सर्वार्थसाधकम् ॥ १३ ॥

जैसे सब प्राणी मेघोंके और पक्षी वृक्षोंके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार सब मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाले राजाके आश्रित होकर जीवनयापन करते हैं॥ १३ ॥ न हि कामात्मना राज्ञा सततं कामबुद्धिना । नृशंसेनातिलुब्धेन शक्यं पालयितुं प्रजाः ॥ १४ ॥ जो राजा कामासक्त हो सदा कामका ही चिन्तन करनेवाला, क्रूर और अत्यन्त लोभी होता है, वह प्रजाका पालन नहीं कर सकता ॥ १४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

नाहं राज्यसुखान्वेषी राज्यमिच्छाम्यपि क्षणम् । धर्मार्थं रोचये राज्यं धर्मश्चात्र न विद्यते ॥ १५ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! मैं राज्यसे सुख मिलनेकी आशा रखकर कभी एक क्षणके लिये भी राज्य करनेकी इच्छा नहीं करता। मैं तो धर्मके लिये ही राज्यको पसंद करता था; परंतु मालूम होता है कि इसमें धर्म नहीं है ॥ १५ ॥ तदलं मम राज्येन यत्र धर्मो न विद्यते । वनमेव गमिष्यामि तस्माद् धर्मचिकीर्षया ॥ १६ ॥ जिसमें धर्म ही नहीं है, उस राज्यसे मुझे क्या लेना है? अतः अब मैं धर्म करनेकी इच्छासे वनमें ही चला जाऊँगा ॥ १६ ॥ तत्र मेध्येष्वरण्येषु न्यस्तदण्डो जितेन्द्रियः । धर्ममाराधयिष्यामि मुनिर्मूलफलाशनः ॥ १७ ॥ वहाँ वनके पावन प्रदेशोंमें हिंसाका सर्वथा त्याग कर दूँगा और जितेन्द्रिय हो मुनिवृत्तिसे रहकर फल-मूलका आहार करते हुए धर्मकी आराधना करूँगा ॥ १७ ॥

भीष्म उवाच

वेदाहं तव या बुद्धिरानृशंस्यगुणैव सा । न च शुद्धानृशंस्येन शक्यं राज्यमुपासितुम् ॥ १८ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बुद्धिमें दया और कोमलतारूपी गुण ही भरा है; परंतु केवल दया एवं कोमलतासे ही राज्यका शासन नहीं किया जा सकता ॥ १८ ॥ अपि तु त्वां मृदुप्रज्ञमत्यार्यमतिधार्मिकम् । क्लीबं धर्मघृणायुक्तं न लोको बहु मन्यते ॥ १९ ॥ तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त कोमल है। तुम बड़े सज्जन और बड़े धर्मात्मा हो। धर्मके प्रति तुम्हारा महान् अनुग्रह है। यह सब होनेपर भी संसारके लोग तुम्हें कायर समझकर अधिक आदर नहीं देंगे ॥ १९ ॥

वृत्तं तु स्वमपेक्षस्व पितृपैतामहोचितम् । नैव राज्ञां तथा वृत्तं यथा त्वं स्थातुमिच्छसि ॥ २० ॥ तुम्हारे बाप-दादोंने जिस आचार-व्यवहारको अपनाया था, उसे ही प्राप्त करनेकी तुम भी इच्छा रखो। तुम जिस तरह रहना चाहते हो, वह राजाओंका आचरण नहीं है ॥ २० ॥

न हि वैक्लव्यसंसृष्टमानृशंस्यमिहास्थितः । प्रजापालनसम्भूतमाप्ता धर्मफलं ह्यसि ॥ २१ ॥ इस प्रकार व्याकुलताजनित कोमलताका आश्रय लेकर तुम यहाँ प्रजापालनसे सुलभ होनेवाले धर्मके फलको नहीं पा सकोगे ॥ २१ ॥

न ह्येतामाशिषं पाण्डुर्न च कुन्ती त्वयाचत । तथैतत् प्रज्ञया तात यथाऽऽचरसि मेधया ॥ २२ ॥ तात! तुम अपनी बुद्धि और विचारसे जैसा आचरण करते हो, तुम्हारे विषयमें ऐसी आशा न तो पाण्डुने की थी और न कुन्तीने ही ऐसी आशा की थी ॥

शौर्यं बलं च सत्यं च पिता तव सदाब्रवीत् । माहात्म्यं च महौदार्यं भवतः कुन्त्ययाचत ॥ २३ ॥ तुम्हारे पिता पाण्डु तुम्हारे लिये सदा कहा करते थे कि मेरे पुत्रमें शूरता, बल और सत्यकी वृद्धि हो। तुम्हारी माता कुन्ती भी यही इच्छा किया करती थी कि तुम्हारी महत्ता और उदारता बढ़े ॥ २३ ॥

नित्यं स्वाहा स्वधा नित्यं चोभे मानुषदैवते । पुत्रेष्वाशासते नित्यं पितरो दैवतानि च ॥ २४ ॥ प्रतिदिन यज्ञ और श्राद्ध—ये दोनों कर्म क्रमशः देवताओं तथा मानव-पितरोंको आनन्दित करनेवाले हैं। देवता और पितर अपनी संतानोंसे सदा इन्हीं कर्मोंकी आशा रखते हैं ॥ २४ ॥

दानमध्ययनं यज्ञं प्रजानां परिपालनम् । धर्ममेतदधर्मं वा जन्मनैवाभ्यजायथाः ॥ २५ ॥ दान, वेदाध्ययन, यज्ञ तथा प्रजाका पालन—ये धर्मरूप हों या अधर्मरूप। तुम्हारा जन्म इन्हीं कर्मोंको करनेके लिये हुआ है ॥ २५ ॥

काले धुरि च युक्तानां वहतां भारमाहितम् । सीदतामपि कौन्तेय न कीर्तिरवसीदति ॥ २६ ॥ कुन्तीनन्दन! यथासमय भार वहन करनेमें लगाये गये पुरुषोंपर जो राज्य आदिका भार रख दिया जाता है, उसे वहन करते समय यद्यपि कष्ट उठाना पड़ता है तथापि उससे उन पुरुषोंकी कीर्ति चिरस्थायी होती है, उसका कभी क्षय नहीं होता ॥ २६ ॥

समन्ततो विनियतो वहत्यस्खलितो हि यः । निर्दोषः कर्मवचनात् सिद्धिः कर्मण एव सा ॥ २७ ॥

जो मनुष्य सब ओरसे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर अपने ऊपर रखे हुए कार्यभारको पूर्णरूपसे वहन करता है और कभी लड़खड़ाता नहीं है, उसे कोई दोष नहीं प्राप्त होता; क्योंकि शास्त्रमें कर्म करनेका कथन है; अतः राजाको कर्म करनेसे ही वह सिद्धि प्राप्त हो जाती है (जिसे तुम वनवास और तपस्यासे पाना चाहते हो) ॥ २७ ॥

नैकान्तविनिपातेन विचारेह कश्चन । धर्मी गृही वा राजा वा ब्रह्मचारी यथा पुनः ॥ २८ ॥ कोई धर्मनिष्ठ हो, गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो या राजा हो, पूर्णतया धर्मका आचरण नहीं कर सकता (कुछ-न-कुछ अधर्मका मिश्रण हो ही जाता है) ॥ २८ ॥

अल्पं हि सारभूयिष्ठं यत् कर्मोदारमेव तत् । कृतमेवाकृताच्छ्रेयो न पापीयोऽस्त्यकर्मणः ॥ २९ ॥ कोई काम देखनेमें छोटा होनेपर भी यदि उसमें सार अधिक हो तो वह महान् ही है। न करनेकी अपेक्षा कुछ करना ही अच्छा है; क्योंकि कर्तव्य-कर्म न करनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई पापी नहीं है ॥ २९ ॥

यदा कुलीनो धर्मज्ञः प्राप्नोत्यैश्वर्यमुत्तमम् । योगक्षेमस्तदा राज्ञः कुशलायैव कल्प्यते ॥ ३० ॥ जब धर्मज्ञ एवं कुलीन मनुष्य राजाके यहाँ उत्तम ईश्वरभावको अर्थात् मन्त्री आदिके उच्च अधिकारको पाता है, तभी राजाका योग और क्षेम सिद्ध होता है, जो उसके कुशल-मङ्गलका साधक है ॥ ३० ॥

दानेनान्यं बलेनान्यमन्यं सूनृतया गिरा । सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् राज्यं प्राप्येह धार्मिकः ॥ ३१ ॥ धर्मात्मा राजा राज्य पानेके अनन्तर किसीको दानसे, किसीको बलसे और किसीको मधुर वाणीद्वारा सब ओरसे अपने वशमें कर ले ॥ ३१ ॥

यं हि वैद्याः कुले जाता ह्यवृत्तिभयपीडिताः । प्राप्य तृप्ताः प्रतिष्ठन्ति धर्मःकोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३२ ॥ जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेके कारण जो भयसे पीड़ित रहते हैं, ऐसे कुलीन एवं विद्वान् पुरुष जिस राजाका आश्रय लेकर संतुष्ट हो प्रतिष्ठापूर्वक रहने लगते हैं, उस राजाके लिये इससे बढ़कर धर्मकी बात और क्या होगी? ॥ ३२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं तात परमं स्वर्ग्यं का ततः प्रीतिरुत्तमा । किं ततः परमैश्वर्यं ब्रूहि मे यदि पश्यसि ॥ ३३ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—तात! स्वर्ग-प्राप्तिका उत्तम साधन क्या है? उससे कौन-सी उत्तम प्रसन्नता प्राप्त होती है? तथा उसकी अपेक्षा महान् ऐश्वर्य क्या है? यदि आप इन बातोंको

जानते हैं तो मुझे बताइये ॥ ३३ ॥

भीष्म उवाच

यस्मिन् भयार्दितः सम्यक् क्षेमं विन्दत्यपि क्षणम् ।
स स्वर्गजित्तमोऽस्माकं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! भयसे डरा हुआ मनुष्य जिसके पास जाकर एक क्षणके लिये भी भलीभाँति शान्ति पा लेता है, वही हमलोगोंमें स्वर्गलोककी प्राप्तिका सबसे बड़ा अधिकारी है, यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३४ ॥

त्वमेव प्रीतिमांस्तस्मात् कुरूणां कुरुसत्तम ।
भव राजा जय स्वर्गं सतो रक्षासतो जहि ॥ ३५ ॥
इसलिये कुरुश्रेष्ठ! तुम्हीं प्रसन्नतापूर्वक कुरुदेशकी प्रजाके राजा बनो। सत्पुरुषोंकी रक्षा तथा दुष्टोंका संहार करो और इस प्रकार अपने कर्तव्यका पालन करके स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लो ॥ ३५ ॥

अनु त्वां तात जीवन्तु सुहृदः साधुभिः सह ।
पर्जन्यमिव भूतानि स्वादुद्रुममिव द्विजाः ॥ ३६ ॥
तात! जैसे सब प्राणी मेघके और पक्षी स्वादिष्ट फलवाले वृक्षके सहारे जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार साधु पुरुषोंसहित समस्त सुहृद्गण तुम्हारे आश्रयमें रहकर अपनी जीविका चलावें ॥ ३६ ॥

धृष्टं शूरं प्रहर्तारमनृशंसं जितेन्द्रियम् ।
वत्सलं संविभक्तारमुपजीवन्ति तं नराः ॥ ३७ ॥
जो राजा निर्भय, शूरवीर, प्रहार करनेमें कुशल, दयालु, जितेन्द्रिय, प्रजावत्सल और दानी होता है, उसीका आश्रय लेकर मनुष्य जीवन-निर्वाह करते हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 520)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

उत्तम-अधम ब्राह्मणोंके साथ राजाका बर्ताव

युधिष्ठिर उवाच

स्वकर्मण्यपरे युक्तास्तथैवान्ये विकर्मणि ।
तेषां विशेषमाचक्ष्व ब्राह्मणानां पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! कुछ ब्राह्मण अपने वर्णोचित कर्मोंमें लगे रहते हैं तथा दूसरे बहुत-से ब्राह्मण अपने वर्णके विपरीत कर्ममें प्रवृत्त हो जाते हैं। उन सभी ब्राह्मणोंमें क्या अन्तर है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

विद्यालक्षणसम्पन्नाः सर्वत्र समदर्शिनः ।
एते ब्रह्मसमा राजन् ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! जो विद्वान् उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाले हैं, ऐसे ब्राह्मण ब्रह्माजीके समान कहे गये हैं ॥ २ ॥
ऋग्यजुःसामसम्पन्नाः स्वेषु कर्मस्ववस्थिताः ।
एते देवसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ॥ ३ ॥
नरेश्वर! जो ऋग्, यजुः और सामवेदका अध्ययन करके अपने वर्णोचित कर्मोंमें लगे हुए हैं, वे ब्राह्मणोंमें देवताके समान समझे जाते हैं ॥ ३ ॥
जन्मकर्मविहीना ये कदर्या ब्रह्मबान्धवाः ।
एते शूद्रसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ॥ ४ ॥
राजन्! जो अपने जातीय कर्मसे हीन हो कुत्सित कर्मोंमें लगकर ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुके हैं, ऐसे लोग ब्राह्मणोंमें शूद्रके तुल्य होते हैं ॥ ४ ॥
अश्रोत्रियाः सर्व एव सर्वे चानाहिताग्नयः ।
तान् सर्वान् धार्मिको राजा बलिं विष्टिं च कारयेत् ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे शून्य हैं तथा जो अग्निहोत्र नहीं करते हैं, वे सभी शूद्रतुल्य हैं। धर्मात्मा राजाको चाहिये कि इन सब लोगोंसे कर ले और बेगार करावे ॥ ५ ॥
आह्वायका देवलका नाक्षत्रा ग्रामयाजकाः ।
एते ब्राह्मणचाण्डाला महापथिकपञ्चमाः ॥ ६ ॥
न्यायालयमें या कहीं भी लोगोंको बुलाकर लानेका काम करनेवाले, वेतन लेकर देवमन्दिरमें पूजा करनेवाले, नक्षत्र-विद्याद्वारा जीविका चलानेवाले, ग्रामपुरोहित तथा

पाँचवें महापथिक (दूर देशके यात्री या समुद्र—यात्रा करनेवाले) ब्राह्मण चाण्डालके तुल्य माने जाते हैं ।। ६ ।।

(म्लेच्छदेशास्तु ये केचित् पापैरेध्युषिता नरैः ।
गत्वा तु ब्राह्मणस्तांश्च चाण्डालः प्रेत्य चेह च ।।
जो कोई म्लेच्छ देश हैं और जहाँ पापी मनुष्य निवास करते हैं, वहाँ जाकर ब्राह्मण इहलोकमें चाण्डालके तुल्य हो जाता है, और मृत्युके बाद अधोगतिको प्राप्त होता है ।।
व्रात्यान् म्लेच्छांश्च शूद्रांश्च याजयित्वा द्विजाधमः ।
अकीर्तिमिह सम्प्राप्य नरकं प्रतिपद्यते ।।
संस्कारभ्रष्ट, म्लेच्छ तथा शूद्रोंका यज्ञ कराकर पतित हुआ अधम ब्राह्मण इस संसारमें अपयश पाता और मरनेके बाद नरकमें गिरता है ।।
ब्राह्मणो ऋग्यजुःसाम्नां मूढः कृत्वा तु विप्लवम् ।
कल्पमेकं कृमिःसोऽथ नानाविष्ठासु जायते ।।)
जो मूर्ख ब्राह्मण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंका विप्लव करता है, वह एक कल्पतक नाना प्राणियोंकी विष्ठाओंका कीड़ा होता है ।।

ऋत्विक् पुरोहितो मन्त्री दूतो वार्तानुकर्षकः ।
एते क्षत्रसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ।। ७ ।।
राजन्! ब्राह्मणोंमेंसे जो ऋत्विज्, राजपुरोहित, मन्त्री, राजदूत अथवा संदेशवाहक हों, वे क्षत्रियके समान माने जाते हैं ।। ७ ।।

अश्वारोहा गजारोहा रथिनोऽथ पदातयः ।
एते वैश्यसमा राजन् ब्राह्मणानां भवन्त्युत ।। ८ ।।
नरेश्वर! घुड़सवार, हाथीसवार, रथी और पैदल सिपाहीका काम करनेवाले ब्राह्मणोंको वैश्यके समान समझा जाता है ।। ८ ।।

एतेभ्यो बलिमादद्याद्धीनकोशो महीपतिः ।
ऋते ब्रह्मसमेभ्यश्च देवकल्पेभ्य एव च ।। ९ ।।
यदि राजाके खजानेमें कमी हो तो वह इन ब्राह्मणोंसे कर ले सकता है। केवल उन ब्राह्मणोंसे, जो ब्रह्माजी तथा देवताओंके समान बताये गये हैं, कर नहीं लेना चाहिये ।।

अब्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् ।
ब्राह्मणानां च ये केचिद् विकर्मस्था भवन्त्युत ।। १० ।।
राजा ब्राह्मणके सिवा अन्य सब वर्णोंके धनका स्वामी होता है, यही वैदिक सिद्धान्त है। ब्राह्मणोंमेंसे जो कोई अपने वर्णके विपरीत कर्म करनेवाले हैं, उनके धनपर भी राजाका ही अधिकार है ।। १० ।।

विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथंचन ।
नियम्याः संविभज्याश्च धर्मानुग्रहकारणात् ।। ११ ।।